सीट का समीकरण: भाजपा ने बहराइच में खत्म किया वकार शाह का दबदबा; 2017 में पत्नी फिर 2022 में बेटे को मिली मात
बहराइच विधानसभा सीट 1967 के विधानसभा चुनाव के वक्त अस्तित्व में आई। भारतीय जनसंघ, कांग्रेस और भाजपा शुरुआती चुनावों में यहां से जीते। 1993 से 2012 तक इस सीट पर सपा के कद्दावर नेता वकार अहमद शाह का दबदबा रहा। बीते दो चुनाव से बहराइच सीट पर भाजपा की अनुपमा जायसवाल ने कब्जा जमाया है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो रही है। यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अभी से चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। आने वाले चुनाव में जहां भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। पक्ष और विपक्ष दोनों मतदाताओं को लुभाने में लग गए हैं। इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा सीट के इतिहास, सामाजिक ताने-बाने और उसके राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज चर्चा बहराइच जिले की बहराइच विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
पहले जानते हैं बहराइच विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला बहराइच है। जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं। इनमें- बलहा, नानपारा, मटेरा, महसी, बहराइच, पयागपुर और कैसरगंज शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम बहराइच विधानसभा सीट की बात करेंगे। बहराइच विधानसभा सीट पहले आम चुनाव के समय से ही अस्तित्व में है, हालांकि इस दौरान यह अपने वर्तमान रूप में नहीं थी।
बहराइच विधानसभा सीट का 1952 से 1967 तक का इतिहास थोड़ा अलग रहा है, क्योंकि शुरुआती चुनावों में यह सीट आज की तरह एकल विधानसभा क्षेत्र नहीं थी। 1952 के चुनाव में यहां से 'बहराइच पूर्व' और 'बहराइच पश्चिम' के रूप में दो सीटें थीं। इसके बाद 1957 और 1962 में इसे 'बहराइच उत्तर' और 'बहराइच दक्षिण' के रूप में बांटा गया था। हालांकि 1967 के परिसीमन के बाद यह एक एकीकृत और एकल 'बहराइच' विधानसभा सीट बनी।
1967: जब जनसंघ के दर्ज की जीत
1967 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहराइच जिले की बहराइच विधानसभा सीट पर भारतीय जनसंघ (BJS) के के. बी. मिश्रा विजयी हुए। उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) के एस. जेड. हैदर को 9,105 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में के. बी. मिश्रा को 25,992 वोट मिले, जबकि एस. जेड. हैदर को 16,887 वोट मिले।
1967 के बाद 1969 में फिर से मध्यावधि चुनाव कराए गए। दरअसल, 1967 में बनी राज्य की पहली गैर-कांग्रेसी 'संविद सरकार' विधायकों के दल-बदल और आपसी खींचतान के कारण अल्पमत में आ गई थी। इसके चलते अप्रैल 1968 में विधानसभा भंग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और 1969 में दोबारा चुनाव कराने पड़े।
1969 के विधानसभा चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के केदार नाथ विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ (BJS) के कृष्ण बहादुर को 3,343 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में केदार नाथ को 29,104 वोट मिले, जबकि कृष्ण बहादुर को 25,761 वोट मिले।
1974: कांग्रेस ने दोहराई जीत
इस विधानसभा चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर कांग्रेस के केदार नाथ अग्रवाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के कृष्ण बहादुर मिश्रा को 7,023 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में केदार नाथ अग्रवाल को 34,948 वोट मिले, जबकि कृष्ण बहादुर मिश्रा को 27,925 वोट मिले।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर जनता पार्टी (JNP) के खान मोहम्मद आतिफ खान विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के केदार नाथ अग्रवाल को 2,924 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में खान मोहम्मद आतिफ खान को 23,139 वोट मिले, जबकि केदार नाथ अग्रवाल को 20,215 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के धर्मपाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई) के केदार नाथ अग्रवाल को महज 410 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में धर्मपाल को 23,315 वोट मिले, जबकि केदार नाथ अग्रवाल को 22,905 वोट मिले।
1985: बहराइच सीट पर कांग्रेस की हुई वापसी
1985 के चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर कांग्रेस के महारन नाथ कौल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के हरि नारायण उर्फ रज्जो भैया को 11,654 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में महारन नाथ कौल को 19,990 वोट मिले, जबकि हरि नारायण उर्फ रज्जो भैया को 8,336 वोट मिले। वहीं 1989 के चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर कांग्रेस के धर्मपाल विजयी हुए। उन्होंने जनता दल (जेडी) के कुंवर बहादुर सिंह को 2,537 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में धर्मपाल को 23,168 वोट मिले, जबकि कुंवर बहादुर सिंह को 20,631 वोट मिले।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में बहराइच विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991 के चुनाव में बहराइच विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी के बृज राज त्रिपाठी विजयी हुए। उन्होंने जनता दल (जेडी) के फसीउर्रहमान उर्फ मुन्नन खान को 1,746 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बृज राज त्रिपाठी को 28,104 वोट मिले, जबकि फसीउर्रहमान उर्फ मुन्नन खान को 26,358 वोट मिले।
1993 से 2012 तक सपा का एकछत्र राज
हालांकि इस चुनाव के बाद बहराइच विधानसभा सीट पर 1993 से 2012 तक समाजवादी पार्टी का एकछत्र राज रहा। इस दौरान समाजवादी पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ते हुए वकार अहमद शाह लगातार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। 1993 से 2012 के दौरान सभी पार्टियों के पुरजोर प्रयास के बाद भी यह सीट सपा के पास ही रही।
2012 के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में चुनाव हुए। इन चुनावों में राज्य में भाजपा का बोलबाला रहा, क्योंकि राज्य के चुनावी नतीजों में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। इसका असर बहराइच विधानसभा सीट पर भी पड़ा। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अनुपमा जायसवाल विजयी हुईं। उन्होंने समाजवादी पार्टी (सपा) की रुबाब सैयदा को 6,702 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अनुपमा जायसवाल को 87,479 वोट मिले, जबकि रुबाब सैयदा को 80,777 वोट मिले। वहीं बसपा के अजीत प्रताप सिंह 36,181 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। इसके बाद हुए 2022 के चुनाव में भी भाजपा की अनुपमा जायसवाल इसी सीट से विधानसभा पहुंचीं।
2022: भाजपा ने दोहराई जीत
इस चुनाव में बहराइच जिले की बहराइच विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी की अनुपमा जायसवाल लगातार दूसरी बार विजयी हुईं। उन्होंने समाजवादी पार्टी के यासर शाह को 4,078 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अनुपमा जायसवाल को 1,07,628 वोट मिले, जबकि यासर शाह को 1,03,550 वोट मिले। वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के नसीम 10,299 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।