चक्का जाम को लेकर किसान संगठनों में था मतभेद! मुश्किल से बनी तीन घंटे पर सहमति
राकेश टिकैत को लेकर दूसरे संगठन खुश नहीं हैं। वे अब खुद को किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा समझने लगे हैं। आने वाले दिनों में उनका यह रवैया दूसरे संगठनों से उन्हें दूर ले जा सकता है...
राकेश टिकैत को लेकर दूसरे संगठन खुश नहीं हैं। वे अब खुद को किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा समझने लगे हैं। आने वाले दिनों में उनका यह रवैया दूसरे संगठनों से उन्हें दूर ले जा सकता है...
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संयुक्त किसान मोर्चा ने छह फरवरी को देश में चक्का जाम करने का एलान कर दिया। मुश्किल से तीन घंटे के चक्का जाम पर सहमति बन सकी। अपनी मांगों के समर्थन में विरोध के इस तरीके को लेकर किसान संगठनों में एक राय नहीं थी। इन्हीं संगठनों से जुड़े लोगों का कहना था कि 26 जनवरी के उपद्रव के बाद देशभर में चक्का जाम करने से किसानों की छवि पर असर पड़ सकता है।
इसके बाद पंजाब से जुड़े एक किसान संगठन, जो सरकार के साथ वार्ता के 11वें दौर तक साथ रहा है, उसके नेताओं में इस बात को लेकर असंतोष था कि चक्का जाम का फैसला मुट्ठीभर नेता क्यों कर रहे हैं। यूपी, दिल्ली और उत्तराखंड को चक्का जाम में शामिल नहीं करने का निर्णय अकेले राकेश टिकैत का था।
किसान संगठन के कुछ नेताओं का कहना था कि गणतंत्र दिवस पर लालकिले में जो कुछ हुआ, उससे आंदोलन की छवि पर असर पड़ा है। बहुत से लोगों में किसान आंदोलन के प्रति गलत संदेश चला गया है। यही वजह थी कि किसान नेता दिल्ली की बाहरी सीमाओं पर शांतिपूर्वक तरीके से विरोध प्रदर्शन करना चाहते थे। वे चक्का जाम जैसी पहल करने के खिलाफ थे।
उनका तर्क था कि इससे आम लोगों में किसानों के प्रति अच्छे भाव नहीं रहेंगे। आम जनता पहले से ही आंदोलन के चलते परेशान है। वहीं संगठन से जुड़े कुछ नेताओं का तर्क था कि चक्का जाम जरूरी है। अगर अब ये नहीं होता है तो सरकार के पास यह संदेश जा सकता है कि गणतंत्र दिवस की घटना के बाद किसान आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। इससे पहले किसान संगठन एक फरवरी को संसद पर प्रदर्शन करने का एलान वापस ले चुके हैं।
किसान संगठनों के बीच इन सभी बातों को लेकर एक राय नहीं बन सकी थी। पंजाब के किसान संगठन चाहते थे कि चक्का जाम हो और यह पूरे दिन रखा जाए। इस पर टिकैत भी सहमत थे। हालांकि उन्होंने अपनी मर्जी से उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड को चक्का जाम से बाहर रखने की बात कह दी। योगेंद्र यादव और दर्शनपाल जैसे नेताओं ने इन्हें समझाकर तीन घंटे का चक्का जाम करने पर राजी कर लिया।
इन नेताओं का कहना था कि मौजूदा परिस्थितियों में किसान आंदोलन जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, उसमें कोई भी सख्त कदम उठाने से पहले कई बार सोचना होगा। कोई ऐसा गलत कदम न उठ जाए, जिससे कि आंदोलन को लेकर लोगों में गलत संदेश चला जाए। कई दौर की बैठकों के बाद ये तय हुआ कि अभी तीन घंटे का प्रतीकात्मक चक्का जाम किया जाए।
अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी ने कहा, राकेश टिकैत को लेकर दूसरे संगठन खुश नहीं हैं। जाहिर सी बात है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश को चक्का जाम से बाहर क्यों रखा, यह सवाल बहुत अहम है। वे अब खुद को किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा समझने लगे हैं। आने वाले दिनों में उनका यह रवैया दूसरे संगठनों से उन्हें दूर ले जा सकता है। किसान नेता मंजीत सिंह राय ने कहा, चक्का जाम सफल हुआ है। इसे लेकर किसान संगठनों के बीच कोई मतभेद नहीं रहा। टिकैत ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चक्का जाम न करने का फैसला लिया था।