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किसान आंदोलन की अंतर्कथाः अब दिल्ली दाखिल की तैयारी, सरकार नरम लेकिन किसान गरम

Thu, 10 Dec 2020 12:17 AM IST
Amit Mandal हरि वर्मा
हरि वर्मा Published by: Amit Mandal Updated Thu, 10 Dec 2020 12:17 AM IST
सार

  • अमित शाह की कृषि मंत्री तोमर के साथ मंत्रणा, विपक्ष का शिष्टमंडल राष्ट्रपति से मिला
  • किसान संगठनों की तीनों कानून वापसी वाली मांग सरकार को किसी कीमत पर मंजूर नहीं
  • यदि बात नहीं बनी तो हर अगले आंदोलन से पहले क्रमवार आंदोलन की घोषणा की जाती रहेगी

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farmers movement: Now farmers to move to Delhi, government soft but farmers take hard stance
किसानों का प्रदर्शन - फोटो : शुजात आलम/जी पाल

विस्तार

सरकार और किसान संगठनों द्वारा एक-दूसरे के प्रस्ताव को ठुकराने के बाद अब आंदोलन आर-पार की ओर बढ़ चला है। सरकार का लिखित प्रस्ताव किसान संगठनों को नामंजूर है, तो किसान संगठनों की तीनों कानून वापस लेने वाली मांग सरकार को किसी कीमत पर मंजूर नहीं है। हालांकि सरकार ने भेजे गए प्रस्तावों में तीन नए कानूनों को रद्द करने के अलावा अधिकांश उन आपत्तियों पर सकारात्मक और नरम रुख अख्तियार किया है जिनका डर आम किसानों को दिखाया जा रहा है। हालांकि, बाहरी घेरेबंदी के बाद अब आंदोलनकारी किसान जत्थेबंदियों ने दिल्ली दाखिल होने की तैयारी शुरू कर दी है।

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पंजाब से दिल्ली और अब दिल्ली से देश की तैयारी

पिछले दो-ढाई महीने से पंजाब में जिस तर्ज पर आंदोलन चल रहा है, उसे दिल्ली पहुंचकर अब देश भर में विस्तार देने की रणनीति है। 12 और 14 दिसंबर के प्रस्तावित आंदोलन के पीछे की रणनीति और वजह यही है। 12 दिसंबर को दिल्ली-जयपुर हाईवे और दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस-वे जाम करने की घोषणा की गई है। दिल्ली-जयपुर और दिल्ली-आगरा को अवरोध करने के पीछे राजस्थान से मिल रहे किसानों, खापों के समर्थन के साथ-साथ सियासी वजह भी है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। राजस्थान से दिल्ली पहुंचना आसान है। पंजाब से सटे हरियाणा को न चुनने के पीछे एक वजह यह है कि हरियाणा के करीब 20 किसान संगठनों ने अतर सिंह की अगुवाई में कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर से मिलकर सरकार के नए कृषि कानून को समर्थन दे रखा है। इसके बाद 14 दिसंबर को सभी जिला मुख्यालयों में सांकेतिक धरना-प्रदर्शन के जरिए समर्थन जुटाने की रणनीति है, लेकिन दक्षिण में किसान संगठनों के बेमियादी जम जाने की भी तैयारी है। दक्षिण में चुनाव सिर पर हैं।
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पंजाब आंदोलन के अनुभव पर अगले 12-14 दिसंबर के आंदोलन की घोषणा की गई है। पंजाब में भी अब सारे टोल प्लॉजा मुफ्त हैं। यहां एक दिन टोल मुक्त रखने की सांकेतिक शुरुआत की घोषणा की गई है। जहां प्रभाव दिखेगा, वहां आंदोलन लंबा खींच जाए तो कोई संदेह नहीं। पंजाब में भी एक निजी कंपनी के उत्पाद, पेट्रोल पंप और शॉपिंग स्टोर्स बंद हैं। पंजाब में रोजाना किसी न किसी भाजपा नेता, मंत्री के घर घेरे जाते हैं। वहां के अनुभव को किसान जत्थेबंदियां इन दो दिनों 12-14 दिसंबर के आंदोलन में आजमाने जा रही हैं।

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देश से फिर दिल्ली दाखिल होने की बारी

पंजाब की किसान जत्थेबंदियों से जुड़े कार्यकर्ता भी यही कह रहे हैं कि इस बार दिल्ली में ही लोहड़ी मनेगी। राकेश टिकैत पहले ही कह चुके हैं कि दिल्ली में किसान परेड होगी। छह महीने आंदोलन की तैयारी करने वाले जनवरी तक तैयार हैं। इस समय खेत-खलिहानों में भी किसानों की जरूरत नहीं है। पुराने घटनाक्रम को याद करें तो 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत को भी दिल्ली जाने से रोका गया था और टिकैत ने हजारों समर्थक किसानों के साथ बोट क्लब पर कब्जा जमा लिया था। सूत्रों की मानें, तो 12-14 दिसंबर के आंदोलन से पहले सरकार को भी दो दिन सोचने का वक्त मिला है। यदि बात नहीं बनी तो हर अगले आंदोलन से पहले क्रमवार आंदोलन की घोषणा की जाती रहेगी और उस दिशा में कारवां बढ़ता जाएगा।

आगे लंबी लड़ाई के लिए किसान एकजुट
बुधवार को जब सरकार की ओर से लिखित प्रस्ताव आया तो संयुक्त मोर्चा के सात शीर्ष किसान नेताओं डॉ. दर्शनपाल, बलवीर सिंह राजेवाल,जगजीत सिंह धल्लेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी, हन्नान मोल्लाह और शिव कुमार कक्का, योगेंद्र ने मिलकर करीब देश भर की 60 किसान जत्थेबंदियों के नेताओं के साथ मंत्रणा की। इनमें अकेले पंजाब के 40 और दूसरे प्रदेशों खासकर यूपी, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बिहार और हरियाणा के संगठन व नेता शामिल हुए। भाकियू एकता उगराहा के जोगिंदर सिंह ने एक दिन पहले अमित शाह से अनौपचारिक बैठक पर आपत्ति जताई थी, लेकिन उन्होंने भी संयुक्त मोर्चे की बैठक में शिरकत की और अपने संगठन के साथ मोर्चे के फैसले का स्वागत किया। जोगिंदर सिंह उगराहा का कहना था कि हमें अमित शाह की बैठक की जानकारी नहीं दी गई और उस बैठक में किसान नेताओं को नहीं जाना चाहिए था। बूटा सिंह बुर्जगिल बताते हैं कि सभी जत्थेबंदियों की इसी बात पर सहमति है कि जब तक कानून वापस नहीं लिया जाता, तब तक कोई बात नहीं होगी। किसान जत्थेबंदियां आगे लंबी लड़ाई के लिए कमर कस चुकी हैं, वहीं पंजाब ग्राउंड जीरो से यह खबर छनकर आ रही है कि रोजाना वहां की मंडी से बस में आढ़ती दिल्ली आने लगे हैं। किसानों की हर तरह से मदद करने। बठिंडा जिले की मौड़ व रामपुराफूल मंडी से दिल्ली जा रहे आढ़ती कहते हैं कि उनका किसानों से हाड़-मांस का रिश्ता है। वैसे, माना तो यह भी जा रहा है कि पहली बार आढ़ती खुलकर किसान संगठनों के साथ ताल ठोक रहे हैं। उन्हें भी अस्तित्व पर खतरा नजर आ रहा है। पंजाब के कई पेट्रोल पंप संचालकों ने आंदोलन में जाने के लिए मुफ्त डीजल देना शुरू कर दिया है।

टकराव की नौबत क्यों

सरकार की ओर से किसानों को 20 पेज का जो प्रस्ताव दिया गया है, उसे किसान संगठन भ्रामक मानते हैं। किसान जत्थेबंदियों और इनके नेताओं का कहना है कि हमारी पहली ही मांग तीन नए कानूनों को वापस लेने की है, जबकि सरकार ने इसे ही नकार दिया। 20 पेज के इस प्रस्ताव में शुरू के 8 पेज पर नए कानूनों की भूमिका और पृष्ठभूमि है। आखिरी के दो पन्ने पर आंदोलन वापस लेने की अपील और धन्यवाद है। 10 पन्ने पर 10 प्रस्ताव हैं जिनमें बदलाव या संशोधन की पेशकश के साथ आगे के लिए गुंजाइश छोड़ी गई है। पहले ही पन्ने पर साफ कर दिया गया है कि कृषि सुधार कानूनों को निरस्त नहीं किया जाएगा बल्कि जिन प्रावधानों पर आपत्ति हैं, उन पर सरकार खुले मन से विचार करने को तैयार है। यानी इस प्रस्ताव के साथ सरकार ने आगे भी बातचीत का दरवाजा खोला है। सरकार ने प्रस्ताव भेजकर यह संदेश भी दिया कि यदि आपसी सहमति हो और कुछ मामूली बातचीत की गुंजाइश हो, तो बृहस्पतिवार को बैठक में निदान निकाला जा सकता है, लेकिन किसान संगठन अब कानून वापसी से कम किसी और प्रस्ताव पर विचार को तैयार नहीं। ऐसे में बृहस्पतिवार की बैठक की गुंजाइश भी फिलहाल खत्म हो गई। 

सरकार का रुख नरम और सकारात्मक
प्रस्ताव में सरकार सबसे बड़े मसले न्यूनतम समर्थन मूल्य की लिखित गारंटी देने को तैयार है। सरकारी खरीद में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। दूसरा, कांट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर भी सरकार किसानों को सुरक्षा कवच देने को तैयार है। आंदोलनकारियों की ओर से किसानों की जमीन पर कॉरपोरेट के कब्जे का जो अंदेशा जताया गया है, उस पर भी सरकार की ओर से साफ कर दिया गया कि किसानों की न तो जमीन ली जाएगी, न निर्माण पर खरीदार द्वारा कर्ज। किसानों की भूमि कुर्क भी नहीं होगी, न कोई जुर्माना लगेगा बल्कि खरीदार पर 150 फीसदी का जुर्माना होगा। 2020 का नया बिजली कानून पूरी तरह रद्द कर सब्सिडी की राज्य वाली पुरानी व्यवस्था बनी रहेगी। पराली जलाने पर भारी भरकम जुर्माने का समुचित निदान का प्रस्ताव है। बता दें कि एक दिन पहले अमित शाह के साथ बैठक में मौखिक भरोसा मिल चुका है कि कृषि क्षेत्र को प्रदूषण के इस कड़े कानून से राहत मिल जाएगी। विवादित मामलों का एसडीएम से न्यायालीय निपटारे में अधिकार को भी संशोधित करने या किसान ट्रिब्यूनल पर विचार कर लिया गया है। 

व्यापारियों के पंजीकरण और मंडियों को कमजोर करने की शंकाओं का भी निदान कर दिया गया है। इसे राज्य पर छोड़ा गया है। पंजीयन व्यवस्था एसडीएम व राज्य सरकार के अधीन होगी। बिना पंजीयन महज पैन के आधार पर खरीदारी नहीं होगी। केंद्र का सीधा कोई दखल नहीं होगा। किसान जत्थेबंदियां की जिद के बीच गतिरोध के साथ-साथ टकराव की नौबत बनती जा रही है। इस टकराव को टालने के लिए सरकार ने मंत्रणा की। किसान नेताओं द्वारा प्रस्ताव ठुकराने के बाद अमित शाह ने कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर के साथ बैठक की। उधर, विपक्षी दलों का शिष्टमंडल शरद पवार और राहुल गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रपति से मिलकर तीनों नए कृषि कानूनों को रद करने की मांग कर चुका है। ऐसे में अगले दो दिन फिर अहम हैं।

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