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Farmers Protest: क्या फिर सरकार को झुकाने में कामयाब होंगे किसान? अग्निपथ से नाराज युवाओं को साथ लेकर बड़े आंदोलन की तैयारी

Thu, 14 Jul 2022 01:03 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 14 Jul 2022 01:03 PM IST
सार

आंदोलन के नेताओं द्वारा इस बार यह बात बताने की कोशिश की जाएगी कि केंद्र सरकार का हर बदलाव किसानों और उनके परिवार पर भारी पड़ रहा है। तीन कृषि कानूनों के जरिए पहले किसानों की जमीन छीनने की कोशिश की गई थी, तो अब अग्निपथ योजना के जरिए किसानों के बच्चों को दी जा रही नौकरी को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है...

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Farmers are preparing for the movement again, the angry youth will pressurize the central government to withdraw the Agneepath scheme through this Protest
अग्निपथ योजना का विरोध - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

विस्तार

केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर चुके किसान दोबारा आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। इसकी शुरूआत 31 जुलाई को पंजाब के सुनाम में बड़ी पंचायत से की जाएगी। इसके अलावा देश के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों को बंद करने के साथ आंदोलन किया जाएगा। अगस्त में देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर 75 स्थानों पर एक सप्ताह का प्रदर्शन कर केंद्र से सभी कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करने, लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के आरोपी मंत्री को सजा दिलाने की मांग की जाएगी। 22 अगस्त को जंतर-मंतर पर विशाल प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। किसानों के लश्कर में इस बार अग्निपथ योजना के विरोधी युवाओं का दस्ता भी मौजूद होगा। नाराज युवा इस आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार पर अग्निपथ योजना को वापस लेने का दबाव बनाएंगे। यदि किसानों के आंदोलन को  युवाओं का साथ मिला तो 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भारी मुश्किल खड़ी हो सकती है।

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किसान संगठनों में पड़ गई फूट

हालांकि, किसानों का ये आंदोलन उनकी आपसी फूट के बीच शुरू होने जा रहा है, जिससे इसकी सफलता को लेकर पहले दिन से संदेह खड़े किये जा रहे हैं। मंगलवार को किसान नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस में यह स्वीकार किया कि संयुक्त किसान मोर्चा के बीच अनेक किसान संगठन आंदोलन वापसी की रूपरेखा से सहमत नहीं थे। किसान आंदोलन की वापसी की चर्चा के बीच ही कुछ किसान नेताओं ने सरकार से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत शुरू कर दी थी, इसके लिए सरकार को पत्र लिखे जा रहे थे। साथ ही कई किसान संगठन पांच राज्यों के चुनावों में उतरने के लिए योजना बना रहे थे, जबकि संयुक्त किसान मोर्चा के ज्यादातर संगठनों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। इससे किसान एकता को खतरा पैदा हो गया था।  

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इस बार संयुक्त किसान मोर्चा की अगुवाई में शुरू होने जा रहे इस आंदोलन से उन किसान संगठनों को बाहर कर दिया गया है, जिन्होंने पिछली बार आंदोलन समाप्त करने में एकतरफा जल्दबाजी दिखाई और अपने टेंट उखाड़कर चलते बने। इससे मजबूर होकर दूसरे किसान संगठनों को भी आंदोलन वापसी की घोषणा करनी पड़ी। यह किसानों की उस योजना के पूरे विरोध में था, जिसमें एमएसपी पर कानून बनाए बिना पूर्ण वापसी न करने का निर्णय लिया गया था। संयुक्त किसान मोर्चा से निष्कासित किए गए किसान संगठनों में सबसे ज्यादा पंजाब से हैं जिन्होंने आंदोलन को ‘भटकाने’ का कार्य किया था।

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मोदी सरकार का हर बदलाव किसान परिवार पर भारी

आंदोलन के नेताओं द्वारा इस बार यह बात बताने की कोशिश की जाएगी कि केंद्र सरकार का हर बदलाव किसानों और उनके परिवार पर भारी पड़ रहा है। तीन कृषि कानूनों के जरिए पहले किसानों की जमीन छीनने की कोशिश की गई थी, तो अब अग्निपथ योजना के जरिए किसानों के बच्चों को दी जा रही नौकरी को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। सेनाओं के निचले स्तर पर सबसे ज्यादा किसान परिवारों के बच्चे ही नौकरी करते थे, जबकि इसी वर्ग को अग्निपथ योजना के अंतर्गत लाकर उनकी नौकरी का सबसे बड़ा जरिया खत्म कर दिया गया है। इस योजना का असली असर भी किसान परिवारों पर ही पड़ने वाला है।


माना जा रहा है कि यदि पिछली बार की तरह अग्निपथ योजना के विरोध में युवाओं का साथ मिला तो केंद्र सरकार के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। हालांकि, यह आंदोलन ऐसे दौर में शुरू किया जा रहा है, जब वायु सेना और थल सेना ने अग्निपथ योजना के अंतर्गत भर्तियां शुरू कर दी हैं और इसमें रिकॉर्ड संख्या में युवा शामिल होने के लिए सामने भी आ रहे हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य हमारी सबसे प्रमुख मांग

किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों से सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के लिए एक कमेटी का गठन कर इस पर जल्द से जल्द निर्णय लेने की बात कही थी, लेकिन इस मामले में अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है। यही कारण है कि किसान एक बार फिर सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य हो रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा किसानों पर सभी मुकदमों की वापसी, लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के आरोपी भाजपा नेता को सजा दिलाने की मांग सबसे प्रमुख रहेगी। साथ ही किसान चाहते हैं कि सरकार विश्व व्यापार संगठनों के दबाव में आकर फसलों के बारे में गलत निर्णय न ले।

किसान आंदोलन शुरू करने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने मंगलवार को दिल्ली में एक बैठक की। किसानों ने जो बयान जारी किया, उसमें प्रमुख बातें इस प्रकार कही गईं-

  • कृषि कानूनों के खिलाफ 26 नवंबर 2020 को आंदोलन शुरू हुआ था। उनका आंदोलन सफल रहा और केंद्र सरकार को कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन आंदोलन के स्थगित होने के बाद कुछ किसान नेता राजनीति में प्रवेश कर गए, जिससे संयुक्त किसान मोर्चा की साख को झटका लगा।
  • किसान नेताओं ने बताया कि संयुक्त किसान मोर्चा को विश्वास में लिए बिना आंदोलन के दौरान कुछ नेताओं द्वारा सरकार को चिट्ठी लिखकर किसानों के विश्वास को तोड़ने का काम किया गया। इन चिट्ठियों में एक कानून वापस लेने, एक को राज्यों पर छोड़ने और एक पर कमेटी बनाने की बात कही जा रही थी। लेकिन इसके बारे में संयुक्त किसान मोर्चा को कोई जानकारी नहीं दी जा रही थी। एक वरिष्ठ किसान नेता ने पंजाब की 16 संगठनों की बैठक में चिट्ठी के सवाल को उठाया। किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने बताया कि अलग-अलग स्तर पर सरकार से बातचीत चल रही है, जिसमें मुख्य तौर पर उनके साथ किसान नेता हरमीत कदियां, बूटा सिंह बृजगिल और कुलवंत संधू शामिल हैं।
  • चिट्ठी लिखने की पुष्टि करते हुए योगेंद्र यादव ने 30 नवंबर को कोआर्डिनेशन कमेटी की बैठक में बताया था कि 13 सितंबर को किसान नेता बलबीर राजेवाल के फ्लैट पर एक मीटिंग बुलाई गई थी, जिसमें 21 व्यक्तियों को शामिल किया गया था। अलग-अलग स्तर पर केंद्र सरकार के साथ जारी बातचीत के बारे में 21 व्यक्तियों को अवगत कराया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि 13 सितंबर को सरकार को चिट्ठी भेजी गई।

 

चुनाव लड़ने वाले किसान नेताओं को मोर्चा में वापस लेने का मुद्दा

आंदोलन 11 दिसंबर को स्थगित होने के बाद कुछ किसान नेताओं ने चुनाव लड़ा, जिसमें जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया। उनके चुनाव लड़ने के फैसले से संयुक्त किसान मोर्चा की साख पर एक बहुत गहरा धब्बा लगा। पंजाब में चुनाव लड़ने वाले किसान नेताओं में से छह को बिना संयुक्त किसान मोर्चा की सर्वसम्मति के तीन जुलाई की संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में वापस ले लिया गया, जिससे आम किसानों में काफी नाराजगी है।

इन दोनों मुद्दों पर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के 35 से अधिक संगठनों की बैठक हरियाणा के रतिया में चार जून को और बठिंडा में 25 जून को आयोजित की गई। इसमें तय किया गया कि संयुक्त किसान मोर्चा की आगामी बैठक में चिट्ठी लिखने के आरोपियों को न बुलाया जाए और चिट्ठी लिखने के मुद्दे पर चर्चा की जाए। यदि मीटिंग में उन्हें बुलाया भी जाता है, तो विस्तृत चर्चा के बाद जिन लोगों पर चिट्ठी लिखने का दोष साबित हो जाए, उन्हें फिर फैसला लेते समय वोट डालने का अधिकार न दिया जाए। आगामी बैठक में लखीमपुर खीरी वाले प्रकरण पर कोई बड़ा फैसला लिया जाए।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए पहले 20 जून और फिर 28 जून को एक चिट्ठी संयुक्त किसान मोर्चा की कोआर्डिनेशन कमेटी को भेजी गई, लेकिन उस कमेटी ने इन मुद्दों को अनसुना कर दिया। 20 और 28 जून को लिखे गए दोनों पत्रों का जवाब देने की बजाय डॉ. दर्शनपाल ने 28 जून की चिट्ठी को पब्लिक में वायरल कर मोर्चे की एकता को तोड़ने का प्रयास किया और एक तुगलकी फरमान जारी करते हुए एक सोची-समझी रणनीति के तहत कहा कि आगामी बैठक में राष्ट्रीय संगठनों के हर राज्य से एक व्यक्ति को बुलाया जाएगा और पंजाब के नए संगठनों को मीटिंग में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

किसान नेताओं का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा था, ताकि मीटिंग में उनका बहुमत बन सके और वे बहुमत के आधार पर सरकार को चिट्ठी लिखे जाने के मुद्दे को दबा सकें और चुनाव लड़ने वाले नेताओं का दोबारा संयुक्त किसान मोर्चा में प्रवेश करा सकें। हमने इन नए नियमों पर सख्त एतराज जताया। हमने तीन जुलाई के बाद भी एक सप्ताह तक हमारी चिट्ठी का जवाब आने का इंतजार किया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया तो आज हम मीटिंग के बाद प्रेस के माध्यम से देश के सभी किसान भाइयों तक ये बातें पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

किसान नेताओं की इस आपसी खींचतान और सियासत के बीच जब 19 नवम्बर को देश के प्रधानमंत्री ने टीवी पर घोषणा की कि वे तीनों कृषि कानून वापस ले रहे हैं, उसके बाद सरकार को चोरी-छुपे चिट्ठी लिखने में शामिल किसान नेताओं ने जल्द से जल्द आंदोलन समाप्त करने का प्रयास करते हुए अपने-अपने संगठनों की ट्रॉलियों को वापस भेजने लगे। उन्होंने बिना सलाह-मशविरा किए अपने तंबू उखाड़ना शुरू कर दिया। बयान में कहा गया है कि साथियों ने MSP के मुद्दे पर आंदोलन जारी रखने का आह्वान किया, लेकिन मोर्चा की एकता को बनाये रखने के लिए बड़े भारी मन से हमें यह निर्णय लेना पड़ा कि आंदोलन स्थगित किया जाए।



अब यह तय किया गया है कि 31 जुलाई को पंजाब के सुनाम में शहीद उधम सिंह जी के शहीदी दिवस पर पंजाब के सुनाम में विशाल पंचायत आयोजित की जाएगी। 22 अगस्त को जंतर-मंतर पर बड़ी पंचायत आयोजित की जाएगी। 23 अगस्त को संयुक्त किसान मोर्चा की अगली बैठक आयोजित की जाएगी।

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