किसान बोले, अगर ढाई प्रदेश का आंदोलन है तो सरकार क्यों नहीं करा देती खत्म, हर बैठक के बाद न दे तारीख
केंद्र सरकार यह बात जानती थी कि देश में केवल छह फीसदी किसानों को एमएसपी का फायदा मिल रहा है तो उसे अपनी व्यवस्था में सुधार करना चाहिए था, ताकि देश के बाकी किसानों को भी पूरा एमएसपी मिले...
केंद्र सरकार यह बात जानती थी कि देश में केवल छह फीसदी किसानों को एमएसपी का फायदा मिल रहा है तो उसे अपनी व्यवस्था में सुधार करना चाहिए था, ताकि देश के बाकी किसानों को भी पूरा एमएसपी मिले...
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इस तरह की खबरें फैलाई जा रही हैं कि ये ढाई प्रदेश का आंदोलन है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं। अगर ये वाकई इन्हीं प्रदेशों के किसानों का आंदोलन है तो मोदी-शाह की ताकतवर सरकार इसे खत्म क्यों नहीं करा देती। हर बैठक के बाद तारीख पर तारीख दे रहे हैं। देश में साठ करोड़ से ज्यादा किसान हैं, जबकि दिल्ली में तो हजारों किसान ही बैठे हैं।
ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के अध्यक्ष सत्यवान कहते हैं, दरअसल सरकार अपने चक्रव्यूह में घिरती जा रही है। आंदोलन को तोड़ने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। ढाई प्रदेश का आंदोलन बताकर किसान संगठनों के बीच फूट डाली जा रही है। दूसरे राज्यों के किसानों को यह कह कर भड़काने का प्रयास किया गया कि इस आंदोलन का सारा फायदा तो ढाई प्रदेश को ही मिलेगा। केंद्र सरकार की मंशा से किसान संगठन वाकिफ हैं। चार जनवरी की बैठक में बहुत कुछ साफ हो जाएगा।
सत्यवान बताते हैं कि तीनों कानून जब तक रद्द नहीं होंगे, तब तक आंदोलन चलता रहेगा। हम सरकार की जिद समझ रहे हैं। जो बात आगे किसानों की बैठक में कही जाएगी, वह बात तो केंद्र के प्रतिनिधि रोजाना बोल रहे हैं। वे ऐसे बयान देकर माहौल बना रहे हैं। वे जनता में संदेश दे रहे हैं कि इन कानूनों को न वापस लिया जा सकता है और न ही इन्हें रद्द किया जा सकता है।
किसान संगठनों की तरफ से अगर संशोधन के सुझाव मिलते हैं तो उसके बारे में सोचा जाएगा। केंद्र सरकार को पहले यह उम्मीद ही नहीं थी कि ये आंदोलन इतना लंबा खिंच सकता है। सरकार ने सोचा था कि पंजाब के किसान आए हैं, दो-चार दिन में वापस लौट जाएंगे। आंदोलन बढ़ता रहा और सरकार उसे तोड़ने के नए नए हथकंडे आजमाती रही।
भारतीय किसान यूनियन राजेवाल के संस्थापक बलबीर सिंह राजेवाल कहते हैं, केंद्र सरकार ने आंदोलन को कमजोर करने का हर संभव प्रयास किया है। जब कोई भी हथकंडा काम नहीं आया तो किसानों को बांटने की साजिश रच दी। एक राष्ट्रीय पार्टी के लोग किसानों के बीच जाकर कह रहे हैं कि सारा एमएसपी पंजाब व हरियाणा के किसान ले जाते हैं। देश में गेहूं और चावल की बड़ी खेप यहीं से आ रही है। ये लड़ाई तो केवल पंजाब के किसानों को फायदा पहुंचाएगी। इस तरह की ओछी हरकतें सरकार की तरफ से देखने को मिल रही हैं।
किसान नेता रामपाल जाट कहते हैं, केंद्र सरकार यह बात जानती थी कि देश में केवल छह फीसदी किसानों को एमएसपी का फायदा मिल रहा है तो उसे अपनी व्यवस्था में सुधार करना चाहिए था, ताकि देश के बाकी किसानों को भी पूरा एमएसपी मिले। लेकिन अब नए कानून में न मंडी रहेगी और न एमएसपी। यह बात अलग है कि सरकार इन दोनों बातों पर आश्वासन दे रही है। किसान इस आश्वासन पर भरोसा नहीं कर रहे हैं।
वजह, सरकार ने जब कानून बनाते समय देश के पांच सौ किसान संगठनों में से किसी एक से भी नहीं पूछा, किसी की सलाह या सुझाव नहीं लिए गए तो अब सरकार की बातों पर भरोसा कैसे कर लें। खैर, चार तारीख की बैठक में कुछ नया देखने को मिलेगा। तब तक किसान संगठन भी अपनी नई रणनीति की घोषणा कर सकते हैं।