फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Farmer Leader Rakesh Tikait should be cautious, BJP can take advantage of him

राकेश टिकैत को सावधानी से रखना होगा कदम, 'कमजोर कड़ी' का टैग हटाना है जरूरी

Thu, 04 Feb 2021 06:04 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 04 Feb 2021 06:04 PM IST
सार

चौधरी चरण सिंह परिवार के अजीत सिंह और जयंत चौधरी की राजनीति को झटका देने में टिकैत परिवार ने भाजपा की मदद की है। मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक किसान आंदोलन को लेकर केंद्र को आंख दिखा चुके हैं...

विज्ञापन
Farmer Leader Rakesh Tikait should be cautious, BJP can take advantage of him
Rakesh Tikait - फोटो : PTI

विस्तार

किसान आंदोलन में जब बाजी पलटी तो राकेश टिकैत के सिर पर ताज आ गया। वे आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन बैठे। दो माह से चल रहे आंदोलन का स्वरूप बदल गया। पंजाब मॉडल खत्म और टिकैत मॉडल शुरू। टिकैत के मंच पर जिस तरह से राजनेताओं की भीड़ जुट रही है, उससे कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी भी ऐसी शंका जता रहे हैं। वे कहते हैं, राकेश टिकैत को सावधानी से कदम रखना होगा। उन पर लगा कमजोर कड़ी का टैग हटना बहुत जरूरी है। उन्हें शतरंज की इस बिसात पर साबित करना पड़ेगा कि वे राजा की मेहरबानी पर आगे नहीं बढ़ रहे हैं।

विज्ञापन


किसान आंदोलन में शामिल कई संगठनों ने जिस तरह से हाथ पीछे खींचा है, उनसे टिकैत को तालमेल करना होगा। हरियाणा में आरक्षण आंदोलन के बाद यशपाल मलिक की जो छवि बनी थी, राकेश टिकैत के लिए उससे बाहर निकलना आवश्यक है। यह अलग बात है कि वे जिस पार्टी के खिलाफ किसान आंदोलन की अगुआई कर रहे हैं, उसे आंदोलन कैश करने में खासी महारत हासिल है।
विज्ञापन

जानकारों के मुताबिक भाजपा को बड़े आंदोलनों का अच्छे से फायदा उठाना आता है। अन्ना हजारे का आंदोलन हो या हरियाणा का जाट आरक्षण आंदोलन, भाजपा ने इनका फायदा उठाने में चूक नहीं की।
विज्ञापन
विज्ञापन


गणतंत्र दिवस की घटना के बाद राकेश टिकैत का एकाएक मुख्य फ्रेम में आना, यूपी न जाकर हरियाणा पहुंचना, दिल्ली पुलिस की गिरफ्तारी से बचना व केंद्र सरकार और टिकैत का एक दूसरे को लेकर शिथिलता का भाव, ये सब बातें कहीं न कहीं संदेह पैदा करती हुई नजर आती हैं। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी के मुताबिक, राकेश टिकैत को राजनीतिक साजिशों से खुद को बचाना होगा। दरअसल, उनके लिए अभी यही बड़ी चुनौती है।

ये बात सब जानते हैं कि पंजाब के ज्यादातर किसान संगठनों को तोड़ना आसान नहीं था। आंदोलन में शामिल अधिकांश सिख चेहरे, तीनों कानूनों को रद्द करने से कम किसी भी प्रस्ताव पर राजी नहीं हो रहे थे। सरकार यह चाहती थी कि किसी तरह इनमें अलगाव की स्थिति बन जाए। गणतंत्र दिवस पर लालकिला में हुए उपद्रव ने सरकार को यह अवसर भी दे दिया। उसके बाद ही राकेश टिकैत पूरे मंच पर काबिज हो गए।

बतौर दीपक राठी, गाजीपुर में अब टिकैत समर्थकों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। उनके भाई नरेश टिकैत ने पश्चिमी यूपी की कमान संभाल ली है। राकेश टिकैत, हरियाणा में निकल पड़े हैं। हो सकता है कि वे पंजाब और राजस्थान भी जाएं। देखने वाली बात यह भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा के पास कोई बड़ा जाट नेता नहीं है। आंदोलनों की बात करें तो अधिकांश नेता किसी न किसी पार्टी से जुड़कर ही खुद की छवि को बरकरार रख सके हैं। टिकैत परिवार भी इन्हीं में से एक है।

वहां चौधरी चरण सिंह परिवार के अजीत सिंह और जयंत चौधरी की राजनीति को झटका देने में टिकैत परिवार ने भाजपा की मदद की है। मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक किसान आंदोलन को लेकर केंद्र को आंख दिखा चुके हैं। मलिक के बयान से भाजपा और केंद्र सरकार असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। सत्यपाल सिंह और संजीव बालियान भी राजनीतिक मैदान में कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा, राजनीतिक पटल पर टिकैत परिवार को आगे ला सकती है।

अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष का कहना है कि हरियाणा के जाटों ने यशपाल मलिक को समर्थन दिया था, लेकिन वे सरकार के मोहरे निकले। बतौर राठी, मैंने यह बात जाट आरक्षण आंदोलन से पहले ही कह दी थी कि मलिक कमजोर कड़ी साबित होगा। वह जाट समुदाय के मान सम्मान को ठेस पहुंचाएगा। इस बयान का उन्हें ख़ासा विरोध झेलना पड़ा था।

वही हुआ, अब यशपाल मलिक कहां है, कोई बता दे। भाजपा ने उसे मोहरा बनाकर चुनाव जीत लिया। टिकैत को लेकर हम दूसरे किसान नेताओं के साथ बातचीत कर रहे हैं। जोगेंद्र उग्राह, दर्शनपाल और बलबीर राजेवाल आदि नेताओं से संपर्क किया जा रहा है। उन्हें कमजोर कड़ी की सच्चाई की बताई जाएगी। सरदार वीएम सिंह, भानू गुट और रामपाल जाट जैसे नेता इस आंदोलन से अलग हो चुके हैं। उन्हें मालूम था कि कौन नेता इस आंदोलन की कमजोर कड़ी बनेगा। टिकैत को कैसे मालूम है कि ये आंदोलन लंबा चलेगा। वे एक झटके में कह देते हैं कि हम तो अक्तूबर तक बैठ जाएंगे। पहले टिकैत कह रहे थे कि लाल किला उपद्रव में हमारे आदमी शामिल नहीं थे। अब कहते हैं कि दिल्ली पुलिस उन्हें रिहा करे, तभी बातचीत शुरू होगी।


दीपक राठी का कहना है कि केंद्र सरकार ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर जो भी रणनीति तैयार की है, उसमें टिकैत की कथित भूमिका संभव है। इसी आधार पर केंद्र सरकार टिकैत को बातचीत के लिए बुला सकती है। चूंकि ये अन्नदाता का आंदोलन है, टिकैत को भरोसा नहीं तोड़ना चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed