हमारे बीच से चला गया एक मशहूर पर्यावरणविद और लेखक
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एक जीवंत और अनुपम नायक हमारे बीच से चला गया। फलदार वृक्ष की तरह हमेशा झुका हुआ। अत्यंत विनम्र। सबके लिए सहज और सुलभ। हमेशा सादगी को लपेटे रहने वाले 68 वर्षीय मशहूर गांधीवादी, पर्यावरणविद और लेखक अनुपम मिश्र हमारे बीच नहीं रहे। समाज अब उनके स्नेह की उंगली भले ही नहीं पकड़ पाएगा, लेकिन 'आज भी खरे हैं तालाब' और 'राजस्थान की रजत बूंदे' जैसी अनुपमकृति राज और समाज को अपना रास्ता दिखाती रहेंगीं।
2013 के अप्रैल महीने में 3 तारीख को उनसे पहली मुलाकात अमर उजाला के जरिए दी जा रही राष्ट्रीय पत्रकारिता फैलोशिप के लिए हुई। साक्षात्कार लेने वालों की कुर्सी पर वे मौजूद थे। उत्तर प्रदेश में गंगा की प्रमुख सहायक घाघरा नदी और हर वर्ष घाघरा क्षेत्र में आने वाली बाढ़ को लेकर बातचीत हुई और सहज रिश्ता बन गया।
उम्र के फासले को पाटते हुए वे अपनी सादगी और व्यक्तित्व के आकर्षण से सभी को जोड़ लेते थे। भाग्यशाली रहा कि उनके मार्गदर्शन में मुझे घाघरा नदी और बाढ़ को लेकर काम करने का मौका मिला। जीवन की अंतिम यात्रा तक वे देश के कोने-कोने में पर्यावरण के लिए काम करने वाले लोगों से वे बिना मोबाइल और किसी गैजेट के लगातार संपर्क में बने रहे। उनके घर पर मौजूद लैंडलाइन नंबर पर घंटियां तो बज रही हैं, लेकिन फोन के उस पार से मधुरभाषी अनुपम की आवाज अब नहीं सुनी जा सकेगी ...जी अनुपम।
जल, थल और नभ को बचाए रखने की चिंता करते-करते अनुपम प्रोस्टेट कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के शिकार हुए। इस बीमारी के बीच भी 4 जून, 2016 को पर्यावरण दिवस को लेकर उनसे बात-चीत हुई। कैंसर का इलाज चल रहा था। इसलिए बात-चीत में उन्हें परेशानी थी। अपनी प्रकृति से विवश होकर बाद में वे बात-चीत के प्रस्ताव को ठुकरा न सके। बात-चीत के लिए राजी हुए और बोले कि हम करीब 2:30 बजे दोपहर में पर्यावरण दिवस को लेकर बातचीत करेंगे। बातचीत शुरू हुई तो उन्हें दवा खाने की चिंता भी न रही। नहीं मालूम था कि इस वर्ष का अंतिम साक्षात्कार यही होगा। 5 जून को अमर उजाला ने इस साक्षात्कार को प्रकाशित किया।
पानी फिल्टर उपकरण बेचते सेलेब्रेटी उनके मन पर गहरी चोट करते थे
साक्षात्कार के दौरान बीमारी के हालात में भी वे पर्यावरण और उसकी चिंता जाहिर करते रहे। करीब 35 मिनट की अंतिम बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं बिना कुछ खाए-पिये ही कैंसर के शिकार हो गया। शहरी जीवन के विस्तार में आज हर चीज में इतने रसयान मिलाए जा रहे हैं कि अब कैंसर के लिए बीड़ी फूंकने की जरूरत नहीं है। साधारण ब्रेड और बिस्किट खाकर भी इस रोग को गले लगा सकते हैं।
वहीं दूसरी तरफ हमारे संपन्न कृषि इलाके में भयानक कीटनाशक और जहरीली खाद के प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब के एक शहर भटिंडा से बीकानेर तक जाने वाली रेल का नाम लोग भूल गए हैं। उसे कैंसर एक्सप्रेस कहते हैं। लोगों के लिए कैंसर का सस्ता उपचार तक सूबों में नहीं है। क्या यही तरक्की है?
उनका छोड़ा हुआ सवाल अब भी अनुत्तरित है। कैंसर से जूझते हुए उन्हें यह भान हो गया था कि जिस वातावरण में हम सांसे ले रहे हैं उसकी गति और दुर्गति यहीं तक जानी है। उन्होंने अपनी बातचीत में कहा कि विनाश की ओर बढ़ रहे पर्यावरण ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अब मनुष्य भी बचेगा या नहीं। बीमारी के साथ अनुपम भीतर ही भीतर इस चिंता तक पहुंच गए थे।
बाजार में बिकते पानी की बोतल और सेल्यूलाइड के जरिए पानी फिल्टर करने वाला उपकरण बेचते सेलेब्रेटी उनके मन पर गहरी चोट करते थे। उन्होंने नई पीढ़ी को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि शस्य श्यामला धरती और सचमुच नीला आकाश इस बीच में हमने कितना गंदा किया है, उसके बारे में क्या तो ऑड और क्या तो ईवन कहेंगे।
हमें यह मजबूरी भी देखनी पड़ेगी कि अक्सर लोगों के पास कोई स्वस्थ विकल्प छूट ही नहीं पाता। साधारण साफ पानी नहीं मिलेगा तो बोतल का पानी खरीदना ही होगा। बड़े-बड़े सितारे और खिलाड़ी आरओ फिल्टर बेचते मिलते हैं। इस आरओ के जरिए अधिकांश कीमती जल नालियों में बह जाता है। इस प्रक्रिया से अगली पीढ़ी को और खारा जल मिलेगा। हम नई पीढ़ी के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रहे। मेरी इस बात से कोई सेलिब्रेटी गुस्सा हो जाए तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
हम अपनी खेती को मानसून के भरोसे नहीं रख सकते
सादगी के साथ व्यवस्था पर तंज कसने वाले अनुपम हमेशा मौजूदा अव्यवस्थाओं और कुप्रबंधन पर निशाना करते थे। उन्होंने बातचीत के दौरान कहा कि देश के विकास में एक दौर ऐसा भी आया जब घमंड से कहा जाता था कि हम अपनी खेती को मानसून के भरोसे नहीं रख सकते।
यह वह दौर था जब भाखड़ा नांगल बांध बन रहा था। कहा जा रहा था कि हम अपने देश में बड़े बांधों का ऐसा जाल बिछा देंगे कि हमें मानसून पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। इसके बाद हमने उन सब इलाकों में भी अकाल देखा है जहां बड़े बांधों की कोई कमी नहीं है।
प्रसंगवश यह भी दोहराना चाहिए कि हमारे देश में अंग्रेजों के आने से पहले न तो कोई सिंचाई विभाग था, न नदी जोड़ो परियोजना थी और न कोई सिविल इंजीनियरिंग सिखाने वाला कॉलेज था, लेकिन सचमुच कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश भर में जल संचय की इतनी सारी स्वावलंबी योजनाएं मिलती थीं जिन्हें हम आज तलाब आदि कहकर उपेक्षित कर देते हैं।
इनमें वर्षा का अतिरिक्त जल समाज संजो कर रख लेता था और अपने भू-जल को भी संरक्षित कर लेता था। आज हमारा भू-जल स्तर कितना गिरा है और राजनीति का स्तर कितना गिरा है इसमें होड़ सी लगी दिखती है।
बेहतर पर्यावरण के लिए संजीदगी से जीवन जीते हुए अनुपम यह सब बातें बताते जा रहे थे। अंत में उन्होंने कहा कि हम फिर मिलकर यह बातें करेंगे....।
चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिये किया था सहयोग
अनुपम मिश्र का परिचय :
अनुपम मिश्र जाने माने गांधीवादी पर्यावरणविद् हैं। पर्यावरण के लिए वह तब से काम कर रहे हैं, जब देश में पर्यावरण का कोई विभाग स्थापित नहीं हुआ था। गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। वे इस प्रतिष्ठान की पत्रिका गाँधी मार्ग के संस्थापक और संपादक भी थे। उन्होंने जल प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्वपूर्ण काम किया। अनुपम 2001 में दिल्ली में स्थापित सेंटर फार एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिये सहयोग किया था। उनकी पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब ब्रेल सहित 13 भाषाओं में प्रकाशित हुई जिसकी 1 लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं।
वे राजेन्द्र सिंह के बनाये तरूण भारत संघ के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे, 2007-2008 में उन्हें मध्यप्रदेश सरकार के चंद्रशेखर आजाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2011 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।