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कानों देखी: योगी आदित्यनाथ या अजय सिंह बिष्ट, कौन है मुख्यमंत्री?

Sat, 28 Jul 2018 01:20 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Sat, 28 Jul 2018 01:20 PM IST
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Eyes seen: Yogi Adityanath or Ajay Singh Bisht, who will become Chief Minister?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
यह बात अब भाजपा के आला नेताओं को परेशान कर रही है। वह खुद नहीं समझ पा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन है। योगी आदित्यनाथ या अजय सिंह बिष्ट। हालांकि जिस दिन योगी जी के नाम का ऐलान हुआ था उसी दिन अमित शाह के दफ्तर ने उनकी प्रोफाइल जारी की थी। इस प्रोफाइल में योगी का संक्षिप्त जीवन वृत्त था। इसमें उनका नाम अजय सिंह बिष्ट बताया गया है। जो भी लखनऊ की तरफ से संघ या भाजपा का नेता दिल्ली रुख कर रहा है, उसकी पहली शिकायत योगी सरकार के कामकाज से शुरू हो रही है। पहली शिकायत योगी जी के पहाड़ी प्रेम से है तो दूसरी शिकायत ठकुरा रहे सरकार के मिजाज से है। लेकिन उच्चस्तर के नेताओं की परेशानी यह है कि करें भी तो क्या? संसद भवन के केंद्रीय हाल में अभी एक बड़े नेता ने शिकायत मिलने के दौरान कह ही दिया कि उन्होंने साधु सन्यासी समझ कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की पहल की थी। अब उन्हें क्या पता था कि....।
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अर्जुन मेघवाल जी आए

राजस्थान में सत्ता संग्राम तो दिखता है। महारानी वसुंधरा राजे के मिजाज भी गजब के हैं। खबर है कि केंद्र के जो नेता उन्हें नहीं सुहाते, उन्हें घास तक डालती। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली चाहे जितनी बड़ी तोप हों, लेकिन उन्हें अरुण जेटली कहकर ही बुलाती हैं। पीएम हों या शाह प्रोटोकॉल तक ठीक हैं। इसके बाद जितना कदम वह चलते हैं, उतनी ही महारानी। कोई पूछे कि सरकार में लौटेंगी तो तपाक से जवाब आता है। सरकारें और राजनीति आती-जाती रहती है। नेता आज हैं, कल बदल जाते हैं। बस कुछ कर जाओ कि जनता याद रखे। नखरे इतने कि बीकानेर में डिजिफेस्ट में हिस्सा लेने के लिए केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल जी आए। मंच पर भी बैठ। हुकुम के सम्मान में बैठे भी रहे। राजस्थान सरकार के अधिकारी बोले, किताब के लेखक बोले, मोहनदास पाई बोले, लेकिन मेघवाल जी माइक को छू भी नहीं पाए। किसी बीकानेरी से पूछिए तो कहता छत्तीस का आंकड़ा है। अधिकारियों से पूछिए कि क्या मैडम लौटेंगी तो 10 में से सात ना में गर्दन हिला देते हैं। एक पंचायती राज विभाग के अफसर ने कहा एट पीए, नोसीएम पूरे राजस्थान में प्रचलित है। 
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सिन्हा साहब की दु:खती रग

केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा का दु:ख कोई कम नहीं है। जिस राज्य का मुख्यमंत्री बनना था, आज वहीं उनकी दुश्वारियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। सबसे बड़ी परेशानी तो प्रधानमंत्री की आजमगढ़ की जनसभा में हुई। गाजीपुर के कद्दावर नेता का अपने ही जिले में पोस्टर नहीं दिखाई दिया। यहां तक कि आजमगढ़ भी वह नहीं पहुंचे। गाजीपुर से सटा जिला, वाराणसी मंडल, मनोज सिन्हा के प्रभाव वाला क्षेत्र और उनका यहां नामो निशान गायब। पता करने पर मालूम हुआ कि कुछ योगी जी की माया है। उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री तो यहां तक बताते हैं कि योगी जी गाजीपुर के इस नेता की चर्चा तक पसंद नहीं करते। यही हाल केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शुक्ला जी का है। अपनी सरकार, अपना मुख्यमंत्री, लेकिन संभलकर रहते हैं। बताते हैं योगी जी की पुरानी आदत है। जिससे बनी तो बनती है, नहीं बनी तो फिर मिजाज अपने हिसाब से चलता है। कोई चाहे तो भाजपा के गोरखपुर से संसदीय उपचुनाव के प्रत्याशी रहे उपेन्द्र नाथ शुक्ला के करीबियों से पूछ ले। उन्हें सहजनवां की घटना से लेकर उपचुनाव तक सब याद है।
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ये तो गले ही पड़ गए

Eyes seen: Yogi Adityanath or Ajay Singh Bisht, who will become Chief Minister?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
अविश्वास प्रस्ताव क्या आया कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के गले ही पड़ गए हैं। राफेल डील पर रह-रहकर आंखों में चुभ रहे हैं। प्रसार भारती के चेयरमैन ए. सूर्य प्रकाश से ही पूछ लीजिए। राहुल गांधी की गजब की आलोचना करते हैं। कुछ दिन पहले संसद की लाइब्रेरी बिल्डिंग में पूरा गांधी परिवार का इतिहास ही उड़ेल दे रहे थे। जैसे ही सूर्या हटे एक भाजपा नेता ने उनका परिचय पूछ लिया। परिचय सुनने के बाद सांसद महोदय बोले अब समझ में आया कि सूर्य प्रकाश जी को इतना बड़ा पद कैसे मिला? वहीं भाजपा के तमाम नेता अब दबी जुबान से मानने लगे हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष तो अब गले ही पड़ गए हैं। भाजपा में खामोशी छाई है। वहीं कांग्रेसी खोज-खोजकर मुर्दा उखाड़ रहे हैं। मानो उनमें नई जान आ गई हो। रणदीप सिंह सुरजेवाला को लग रहा है कि चलो कम से कम प्रधानमंत्री मोदी जी पर सवारी करने का मौका तो मिला।

हवलदार तभी सलाम करेगा

कौन जानता था कि ऐसे भी दिन आएंगे, लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने यह दिन आ गए। वह अभी राजस्थान में थे तो पार्टी के नेताओं को समझा रहे थे कि हर हाल में सरकार जरूरी है। संघ के लोग भी कान खोल कर सुन लें। सरकार रहेगी तभी हवलदार सलाम करेगा। अब यह सुनकर भाजपा नेताओं का सिर घूम रहा है। एक तरफ वसुंधरा के चेहरे को लेकर उनका सिर पहले से घूम रहा है, दूसरे अध्यक्ष जी नया सच बता गए। अब अपने अमित भाई भी क्या करें? सब लड़ रहे हैं। जबकि अमित भाई को पता है कि 2014 के आम चुनाव में आठ राज्यों ने ही 280 सीटें दे दी थी। अब 2019 में इतनी कैसे आएंगी। अर्थमैटिक्स और अलजेब्रा दोनों उलझा हुआ है। पाइथागोरस का प्रमेय भी समझ में जरा कम आ रहा है। लिहाजा शाह भाई थोड़ा उदार हुए हैं। नेताओं से मिल रहे हैं। कड़ी मेहनत कर रहे हैं। सम्मानित लोगों से मिल रहे हैं। घर और आफिस के बंद दरवाजे खोल रहे हैं। वहीं भाजपाईयों का एक तबका इनकी विदाई की दुआ भी मांग रहा है।

हाशिए पर हैं

कहते हैं उगते सूरज को दुनिया सलाम करती है, डूब गए को तो बस कभी-कभी कोई अर्घ्य दे देता है। कांग्रेस पार्टी के कई पूर्व महासचिवों का यही हाल है। पिछले साल तक जिनकी तूती बोलती थी, अब उनके हाथ खाली हैं। कहां मिलने वाले समय मांगते थे और वह मिलने आने वालों की राह देख रहे हैं। एक महासचिव ऐसे हैं जिनका स्थान उन्हीं करीबी कहे जाने वाले ने ले लिया है। सुना है अब वह भी अपने पुराने सर का हाल नहीं ले रहे हैं। लेकिन एक उम्मीद की किरण अभी जिंदा है। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने इनमें से एक पूर्व महासचिव का हालचाल पूछ लिया था। यहीं से उम्मीद है कि अगर 2019 में पार्टी सत्ता में आ पाई तो उसे अनुभवी नेता चाहिए होंगे। क्या पता तब कुछ हाथ लग जाए। वरना अब तो हालत भाजपा के मार्ग दर्शक मंडल से भी खराब है।

माया गुल खिलाएंगी

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sonia mayawati
बसपा सुप्रीमों 2019 में गुल खिलाएंगी। उन्हें उम्मीद है कि 15 अगस्त तक बसपा को आगे क्या करना है, इसकी तस्वीर बन जाएगी। शरद पवार और ममता बनर्जी की तरह मायावती भी मानकर चल रही हैं, घी अंगुली में चिपटने से खाने भर का नहीं निकलेगा। थोड़ा सा तो टेढ़ा करना पड़ेगा। मायावती को 2019 का आम चुनाव अस्सी के दशक में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव जैसा लग रहा है। इसलिए यही सही समय है, जो मिल गया सो मिल गया। मायावती यह भी समझती हैं कि ज्यादा ऐंठने पर जो मिलना है, उसके छिटकने का भी खतरा है। इसलिए वह तरीके से बसपा का भाव बनाए हुए हैं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से संपर्क करने में नहीं चूकती। फोन पर हालचाल लेने से आगे की काफी संभावना बनी हुई है। मायावती को पता है कि इतना प्रयास भर से ही भाजपा का रक्तचाप बढ़ जाता है।

सोनिया के नमक पर रीझेंगे साथी

शास्त्र संगत है। खाना खाने के बाद उसका स्वाद और संस्कृति खाने वाले पर असर डाल देती है। देखना है अगस्त में सोनिया गांधी का भोज कितना असर डालता है। यूपीए चेयरपर्सन एक रात्रिभोज देना चाहती हैं। आम तौर पर संसद का सत्र समाप्त होने पर ऐसा किए जाने की संभावना रहती है। यह भोज की तैयारी अभी विचार के स्तर पर है। विचार में यह भी कि भोज में आएगा कौन? यूपीए चेयरपर्सन सुनिश्चित होना चाहती हैं कि इस भोज में दलों के मुख्य नेता आएं। वह अपने साथ पार्टी का दूसरा नेता लाना चाहें तो स्वागत है, लेकिन प्रतिनिधि नहीं। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष की इस बात में काफी दम है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, मिजोरम के विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले सहयोगी दलों के साथ मिलकर विपक्ष की समूची ताकत का संदेश तो जाना ही चाहिए। वैसे भी उनकी एक परेशानी अब धीरे-धीरे कम हो गई है। कई दलों के नेता अब राहुल गांधी को 2019 में प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मानने लगे हैं। ऐसे में सहयोगियों की मौजूदगी चार चांद लगा देगी।
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