चिंताजनक: दुनिया जोखिमों के मुहाने पर पहुंची, विलुप्त होते जीव-जंतु, पेड़-पौधों के अलावा घटता भूजल परेशानी
जलवायु विज्ञान में टिपिंग प्वाइंट एक महत्वपूर्ण सीमा है, जिसे पार करने पर जलवायु प्रणाली में बड़े और अक्सर अपरिवर्तनीय परिवर्तन होते हैं। यदि निर्णायक बिंदुओं को पार कर लिया जाता है तो उनका मानव समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है।
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दुनिया छह परस्पर जुड़े जोखिम टिपिंग बिंदुओं के करीब पहुंच रही है, जो दुनियाभर में तत्काल और बढ़ते जोखिमों का वर्णन करते हैं। यानी वह समय जब किसी परिवर्तन या प्रभाव को रोका नहीं जा सकता। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय-पर्यावरण और मानव सुरक्षा संस्थान (यूएनयू-ईएचएस) की नई रिपोर्ट के अनुसार, जोखिम के छह बिंदुओं में विलुप्त होना, घटता भूजल, पिघलते पर्वतीय ग्लेशियर, अंतरिक्ष मलबा, असहनीय गर्मी और बीमा न किया जा सकने वाला भविष्य शामिल हैं।
जलवायु विज्ञान में टिपिंग प्वाइंट एक महत्वपूर्ण सीमा है, जिसे पार करने पर जलवायु प्रणाली में बड़े और अक्सर अपरिवर्तनीय परिवर्तन होते हैं। यदि निर्णायक बिंदुओं को पार कर लिया जाता है तो उनका मानव समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यूएनयू-ईएचएस के प्रमुख लेखक और वरिष्ठ विशेषज्ञ जैक ओकॉनर कहते हैं कि जैसे-जैसे हम इन निर्णायक बिंदुओं के करीब पहुंचेंगे पहले से ही इनके प्रभावों का अनुभव करना शुरू कर देंगे। इस रिपोर्ट में जोखिमों और उनसे बचने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का वर्णन किया गया है।
अंतरिक्ष का मलबा भी बड़ी समस्या
अंतरिक्ष मलबे में पेंट के छोटे-छोटे टुकड़े और धातु के बड़े टुकड़े जैसी वस्तुएं शामिल हैं, जिन्हें रिपोर्ट में चिह्नित किया गया है। पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली 34,260 वस्तुओं में से केवल 25 प्रतिशत ही कार्यशील उपग्रह हैं बाकी कबाड़ हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चूंकि ये वस्तुएं 25,000 किमी प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार में घूम रही हैं इसलिए सबसे छोटा मलबा भी भारी नुकसान पहुंचा सकता है। इस खतरे में कार्यशील उपग्रहों के बीच टकराव भी शामिल है।
मानवीय गतिविधियों ने बढ़ाया संकट
रिपोर्ट के अनुसार, विलुप्ति पृथ्वी की प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा रही है, लेकिन भूमि उपयोग परिवर्तन, अतिदोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और आक्रामक प्रजातियों की शुरुआत जैसी मानवीय गतिविधियों ने विलुप्त होने की गति बढ़ा दी है। उदाहरण के लिए पिछले 100 वर्षों में 400 से अधिक कशेरुकी प्रजातियां नष्ट हो गई हैं और 10 लाख पौधों और जानवरों की प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसके साथ ही 2010 और 2015 के बीच लगभग 3 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर वन नष्ट हो गए।
गंभीर स्थिति में जलभृत
रिपोर्ट के मुताबिक, भूजल संग्रहित करने वाले जलभृत (एक्विफर) गंभीर स्थिति में हैं। दो अरब लोग मीठे पानी के लिए इसी पर निर्भर हैं। साथ ही 70% पानी का उपयोग खेती के लिए किया जाता है। दुनिया के 37 सबसे बड़े जलभृतों में से 21 में उनकी पूर्ति की तुलना में कमी आ रही है।
तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर
ग्लोबल वार्मिंग के कारण, ग्लेशियर पिछले दो दशकों में दोगुनी गति से पिघल रहे हैं, जिससे 1.9 अरब लोगों को खतरा है। 2000 और 2019 के बीच, ग्लेशियरों ने प्रति वर्ष 267 गीगाटन बर्फ खो दी है, जो गुजर के लगभग के 46,500 महान पिरामिडों के द्रव्यमान के बराबर है।