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Hindi News ›   India News ›   Explainer: Baba Neem Karoli’s Real Story, Who Was He and Why Did He Become So Famous?

एक्सप्लेनर: क्या है 'हनुमान अंश' वाले बाबा नीम करौली की असली कहानी, कौन थे ये संत और क्यों इतने प्रसिद्ध?

Sun, 06 Sep 2026 06:26 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sun, 06 Sep 2026 06:26 AM IST
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सार
कैंची धाम से लेकर विदेशों तक बाबा नीम करौली का नाम आज भी आस्था और आध्यात्मिकता से जुड़ा है। उनकी सादगी, हनुमान भक्ति, शिक्षाएं और उनसे जुड़ी कहानियां उन्हें दूसरे संतों से अलग पहचान देती हैं। लेकिन आखिर कौन थे बाबा नीम करौली और उनकी लोकप्रियता की वजह क्या थी? आइए जानते हैं।
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Explainer: Baba Neem Karoli’s Real Story, Who Was He and Why Did He Become So Famous?
क्या है बाबा की कहानी? - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

फिल्म हनुमान अंश की सफलता के बीच संत बाबा नीम करौली एक बार फिर चर्चा में हैं। फिल्म के जरिए लोगों की दिलचस्पी उस संत के जीवन को जानने में बढ़ी है, जिनका नाम आज उत्तराखंड के कैंची धाम से लेकर अमेरिका तक लिया जाता है। कंबल ओढ़े रहने वाले बाबा को उनके भक्त प्यार से महाराजजी कहते थे। 



कैंची धाम आज बाबा की सबसे बड़ी पहचान है। उत्तराखंड सरकार के अनुसार, नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित यह एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जहां हर साल 15 जून को बड़ा मेला लगता है और देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। 


ऐसे में आइए जानते हैं कि बाबा नीम करौली कौन थे? उनका बचपन कैसा रहा? उनका नाम नीब करोरी था या नीम करौली? उनसे जुड़ी क्या-क्या कहानियां प्रसिद्ध हैं? बाबा किसलिए प्रसिद्ध हैं? उनके परिवार में कौन-कौन है? 


नीब करोरी या नीम करौली, बाबा का नाम कैसे पड़ा?

बाबा के नाम को लेकर अक्सर सवाल उठता है कि उन्हें नीब करोरी बाबा कहा जाए या नीम करौली बाबा। उनका मूल नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के टुंडला क्षेत्र के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

बाद में वे उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीब करोरी गांव पहुंचे। इसी जगह से उनकी पहचान ‘बाबा नीब करोरी’ के रूप में बनने लगी। बताया जाता है कि उन्होंने इसी गांव में गुफा के भीतर कठिन साधना की थी। स्थानीय लोगों और भक्तों के बीच उनका नाम नीब करोरी बाबा के रूप में प्रचलित हुआ।


समय के साथ 'नीब करोरी' का प्रचलित रूप 'नीम करौली' हो गया और बाबा इसी नाम से ज्यादा प्रसिद्ध होते चले गए। आज दोनों नाम एक ही संत के लिए इस्तेमाल होते हैं।

उनके नाम से जुड़ी एक बेहद लोकप्रिय ट्रेन की कहानी भी है। कहा जाता है कि बाबा एक बार ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में बिना टिकट यात्रा कर रहे थे। टिकट नहीं होने पर उन्हें नीब करोरी गांव के पास ट्रेन से उतार दिया गया। इसके बाद वे पास ही एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए।

कहानी के अनुसार, बाबा के उतरने के बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। इंजन को चलाने की तमाम कोशिशें की गईं, लेकिन ट्रेन वहीं खड़ी रही। दूसरा इंजन लगाने की कोशिश भी काम नहीं आई। आखिरकार रेलवे अधिकारियों और यात्रियों ने बाबा से माफी मांगी और उन्हें वापस ट्रेन में बैठने के लिए कहा। बाबा के वापस ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी। इस कहानी के साथ यह भी कहा जाता है कि बाबा ने वहां रेलवे स्टेशन बनाने और साधुओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने की बात कही थी।

बाबा नीब करोरी
बाबा नीब करोरी - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

कैसा रहा बाबा का बचपन और गृहस्थ जीवन?

बाबा का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ बताया जाता है। उनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा और मां का नाम कौशल्या देवी बताया गया है। उनकी मां का निधन तब हो गया था, जब वे काफी छोटे थे।

बाबा की शादी भी बेहद कम उम्र में हुई थी। उनसे जुड़े विवरणों के अनुसार, करीब 11 साल की उम्र में उनकी शादी राम बेटी शर्मा से हुई। आध्यात्म के प्रति उनका झुकाव कम उम्र से ही था। बताया जाता है कि इसी लगाव के कारण उन्होंने कम उम्र में घर छोड़ दिया और वैराग्य का रास्ता अपनाया।

हालांकि उनका जीवन पूरी तरह परिवार से अलग नहीं हुआ। कई वर्षों तक अलग-अलग जगहों पर रहने और साधना करने के बाद वे वापस परिवार के पास लौटे और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां निभाईं। उनके दो बेटे और एक बेटी हुई।

घर छोड़ने के बाद कहां-कहां की साधना?

घर छोड़ने के बाद बाबा ने कई जगहों की यात्रा की। वे राजस्थान से होते हुए गुजरात के राजकोट पहुंचे। वहां उनकी सेवा और भक्ति से प्रभावित होकर मंदिर के प्रमुख ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा जताई। लेकिन वहां कुछ लोगों के विरोध के बाद उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया। इसके बाद वे गुजरात के बावनिया गांव पहुंचे। यहां तालाब के पास साधना करने के कारण उन्हें ‘तलैया बाबा’ कहा जाने लगा।

इसके बाद उनका जीवन उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीब करोरी गांव से जुड़ा। यहां उन्होंने लंबे समय तक कठिन साधना की। उनके लिए एक भूमिगत गुफा बनाई गई और बाद में इसी गुफा के ऊपर हनुमान मंदिर का निर्माण कराया गया। यहीं से बाबा की साधना और हनुमान भक्ति की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी और लोग उनके पास पहुंचने लगे।

क्या हनुमान जी के अवतार थे बाबा नीब करोरी? 

बाबा नीब करोरी की सबसे बड़ी पहचान उनकी हनुमान भक्ति रही। उनके जीवन से जुड़े स्थानों पर हनुमान मंदिरों की मौजूदगी भी उनकी इसी भक्ति को दर्शाती है। उनके भक्तों के बीच उन्हें हनुमान जी का अंश या अवतार मानने की परंपरा रही है।

बाबा का पहनावा भी उनकी पहचान का हिस्सा बन गया। उनकी तस्वीरों में वे अक्सर कंबल ओढ़े दिखाई देते हैं। कंबल को लेकर अलग-अलग बातें  कही जाती हैं, लेकिन इसका कोई एक प्रमाणित कारण उपलब्ध नहीं है। उनके अनुयायी इसे उनकी सादगी और वैराग्य से जोड़ते हैं।

उनकी शिक्षाओं में 'सब एक' का विचार प्रमुख माना जाता है। इसका भाव यह है कि सभी में एक ही ईश्वर का अंश देखा जाए। वे लोगों को प्रेम, सेवा, ईश्वर को याद करने और सच बोलने की सीख देते थे।

बाबा से जुड़ी चमत्कारों की कई कहानियां

बाबा नीब करोरी के जीवन से जुड़ी कई चमत्कारिक कहानियां भक्तों के बीच प्रचलित हैं। इनमें उन्हें एक ही समय में अलग-अलग जगहों पर दिखाई देने, किसी व्यक्ति की परेशानी पहले से जान लेने और स्पर्श मात्र से किसी की आध्यात्मिक स्थिति बदल देने जैसी बातें कही जाती हैं।

बाबा के बारे में यह भी कहा जाता है कि उनके पास अमीर और गरीब, अलग-अलग धर्मों के लोग और अलग-अलग तरह की परेशानियों से जूझ रहे लोग आते थे। वे लोगों को उनके सामाजिक स्तर के आधार पर अलग नहीं करते थे।

उनसे जुड़े संस्मरणों में यह भी कहा गया है कि वे किसी व्यक्ति को उसकी बुरी आदत छोड़ने के लिए हमेशा सीधे तौर पर मजबूर नहीं करते थे। माना जाता है कि वे समय के साथ व्यक्ति के खुद बदलने में विश्वास रखते थे। बाबा नीब करोरी का निधन सितंबर 1973 में वृंदावन में हुआ।

कैंची धाम
कैंची धाम - फोटो : Amar Ujala

कैंची धाम कैसे बना बाबा की सबसे बड़ी पहचान?

बाबा नीब करोरी की पहचान आज सबसे ज्यादा कैंची धाम से जुड़ी है। उत्तराखंड में नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित कैंची धाम उनके प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में है। 

कैंची धाम का नाम यहां सड़क के दो तीखे मोड़ों के कारण पड़ा बताया जाता है। बाबा के समय यहां हनुमान मंदिर की स्थापना हुई और धीरे-धीरे यह स्थान भजन, कीर्तन, साधना और भंडारे के लिए प्रसिद्ध होता गया।

15 जून 1964 को यहां हनुमान जी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। इसी दिन को कैंची धाम का स्थापना दिवस माना जाता है। बाबा के शरीर छोड़ने के बाद भी कैंची धाम उनकी स्मृति और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना रहा। 1974 में बाबा के मंदिर का निर्माण शुरू हुआ और 15 जून 1976 को उनकी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।

हनुमानगढ़ी समेत कई जगहों से जुड़ा नाम

बाबा का प्रभाव सिर्फ कैंची धाम तक सीमित नहीं रहा। नैनीताल का हनुमानगढ़ी मंदिर भी उनसे जुड़ा हुआ है। करीब 1950 के आसपास बाबा की प्रेरणा से यहां मंदिरों का निर्माण हुआ बताया जाता है। यहां हनुमान जी के अलावा भगवान राम और शिव के मंदिर भी हैं। इसके अलावा बाबा से जुड़े कई आश्रम और मंदिर अलग-अलग जगहों पर विकसित हुए। इन स्थानों पर उनकी भक्ति, सेवा और साधना की परंपरा आगे बढ़ी।

नीम करौली बाबा
नीम करौली बाबा - फोटो : Amar Ujala

विदेशों में भी पहुंचे बाबा के भक्त

नीम करौली बाबा के सबसे प्रसिद्ध शिष्यों में अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक राम दास का नाम लिया जाता है। उनका मूल नाम रिचर्ड अल्पर्ट था और वे हार्वर्ड के मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे। वर्ष 1967 में भारत यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात बाबा से हुई। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई और वे राम दास के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने दुनिया भर में भारतीय आध्यात्मिक विचारों को लोकप्रिय बनाया।

राम दास की किताब Miracle of Love के जरिए बाबा से जुड़ी कई कहानियां और अनुभव पश्चिमी दुनिया तक पहुंचे। राम दास के अलावा कृष्ण दास, जय उत्तल और लैरी ब्रिल जैसे नाम भी बाबा से जुड़े भक्तों में गिने जाते हैं। स्टीव जॉब्स, मार्क जुकरबर्ग और जूलिया रॉबर्ट्स का नाम भी बाबा से जोड़कर लिया जाता है।

बाबा के परिवार में कौन-कौन है?

बाबा और उनकी पत्नी राम बेटी शर्मा के दो बेटे और एक बेटी थी। बड़े बेटे का नाम अनेक सिंह शर्मा और छोटे बेटे का नाम धर्म नारायण शर्मा था। बेटी गिरजा भटेले हैं। अनेक सिंह शर्मा का नवंबर 2021 में निधन हुआ था। उनके बेटे धनंजय शर्मा डॉक्टर और सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए। वे भोपाल में रहते हैं। छोटे बेटे धर्म नारायण शर्मा वन विभाग में रेंजर थे और वृंदावन में रहते थे। उनका अप्रैल 2021 में निधन हुआ। उनकी छह बेटियां हैं, सुनीता शर्मा, अर्चना शर्मा, वंदना शर्मा, भावना रावत, रितु तिवारी और रिचा रावत। ये अलग-अलग शहरों में रहती हैं।

क्या है विवाद?
क्या है विवाद? - फोटो : Amar Ujala

जन्मस्थली के पैतृक मकान को लेकर क्या विवाद है?

बाबा नीब करोरी की जन्मस्थली अकबरपुर में स्थित पैतृक मकान को लेकर अब परिवार और ट्रस्ट के बीच विवाद सामने आया है। यह विवाद बाबा के छोटे बेटे धर्म नारायण शर्मा की छह बेटियों की शिकायत के बाद सामने आया।

परिवार की ओर से प्रशासन को दिए गए पत्र में आरोप लगाया गया है कि ग्राम पंचायत नगला के निजी मकान संख्या 154-वी में बाबा का ध्यान कक्ष, भोजनालय, अतिथि कक्ष और शयन कक्ष था। परिवार का दावा है कि इस पैतृक मकान पर श्री ठाकुर हनुमानजी ट्रस्ट का कब्जा है।

धर्म नारायण शर्मा की छह बेटियां बीते 14 अगस्त को अपनी मां की पुण्यतिथि मनाने अकबरपुर आई थीं। इसी दौरान उन्होंने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र दिया। यह पत्र 21 अगस्त को विधिवत दर्ज कराया गया।

परिवार की ओर से आरोप लगाया गया है कि ट्रस्ट में संजय गुप्ता ट्रस्टी थे और वे धर्म नारायण शर्मा की सेवा करते थे। परिवार का कहना है कि धर्म नारायण शर्मा के निधन के बाद संजय गुप्ता ने ट्रस्ट पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और बाबा के पैतृक मकान पर भी कब्जा कर लिया। 

परिवार ने रखा प्रशासनिक ट्रस्ट बनाने का प्रस्ताव

परिवार की ओर से इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए प्रशासनिक ट्रस्ट बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। उनका कहना है कि बाबा की जन्मस्थली से जुड़ी संपत्ति और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत होनी चाहिए।

प्रस्ताव के मुताबिक, जिलाधिकारी को इस ट्रस्ट का पदेन अध्यक्ष बनाया जाए। इसके अलावा एसडीएम, तहसीलदार और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को पदेन सदस्य बनाया जाए। परिवार का तर्क है कि इससे जन्मस्थली का प्रबंधन पारदर्शी तरीके से हो सकेगा और किसी निजी व्यक्ति के एकाधिकार की स्थिति नहीं बनेगी।

परिवार ने यह प्रस्ताव ऐसे समय रखा है, जब अकबरपुर में बाबा नीब करोरी से जुड़ी कॉरिडोर परियोजना का भी जिक्र किया गया है। उनका कहना है कि आने वाले समय में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने की संभावना है, इसलिए जन्मस्थली के प्रबंधन की स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था जरूरी है।

प्रशासन ने क्या कहा?

जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा ने कहा है कि बाबा की पोतियों की ओर से पत्र प्राप्त हुआ है और भावना रावत के पति मनोज रावत से भी मुलाकात हुई है। प्रशासन की ओर से संबंधित सभी पक्षों को बैठक के लिए बुलाया जाएगा। इसके बाद सभी दस्तावेजों की जांच की जाएगी और उसी आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

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