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देश को कहां ले जाएगा यह सांप्रदायिक तनाव: क्या फिजा से गायब हो रहे सामाजिक सौहार्द्र के तराने? जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ

Sun, 24 Apr 2022 06:35 PM IST
amit sharma अमित शर्मा
Updated Sun, 24 Apr 2022 06:35 PM IST
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सार
इतिहास के हर कालखंड में धार्मिक दृष्टि से कट्टर और उदार लोग हमेशा ही उपस्थित रहे हैं। यह सत्ता के केंद्र पर निर्भर करता है कि वह किस चरित्र के लोगों को ज्यादा प्राथमिकता देना चाहता है।
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Expert View about communal tension in the country and current situation After Ram Navami Hanuman Janmotsava Violence Loudspeaker Cotroversy
दिल्ली के जहांगीरपुरी में बवाल (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

विस्तार

इतिहास के लंबे कालखंड में देश के हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच कभी तनाव का माहौल रहा तो कभी मोहब्बत का दौर। कभी दोनों ही समुदायों के स्वतंत्रता सेनानी कंधे से कंधा मिलाकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ते देखे गए, तो कभी आपसी तनाव इतना बढ़ा कि इसके कारण देश का विभाजन तक करना पड़ गया। ऐसे में आज जब देश में केवल हिजाब, हलाल मीट, राम-हनुमान जन्मोत्सव पर हो रहे पथराव की चर्चा हो रही है तो यह समझना बेहद जरूरी है कि देश में हिंदू-मुस्लिम एकता की सच्चाई क्या रही है और इस तरह की बहस देश को किस दिशा में लेकर जा सकती है? सामाजिक सौहार्द्र के जो तराने कभी देश की पहचान हुआ करते थे, वर्तमान दौर में उनकी आवाज कमजोर क्यों पड़ती जा रही है?   



हमेशा मौजूद रहे दोनों सोच के लोग
दिल्ली के जानकीदेवी कॉलेज में इतिहास विषय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मनीषा अग्निहोत्री ने अमर उजाला से कहा कि इतिहास के हर कालखंड में धार्मिक दृष्टि से कट्टर और उदार लोग हमेशा ही उपस्थित रहे हैं। यह सत्ता के केंद्र पर निर्भर करता है कि वह किस चरित्र के लोगों को ज्यादा प्राथमिकता देना चाहता है और किस चरित्र के लोगों को जनता के सामने खलनायक के तौर पर पेश करना चाहता है। सत्ता की यही प्राथमिकता समाज में लोगों के बीच आपसी सामंजस्य की दिशा और दशा तय करने में प्रमुख भूमिका निभाती है।  


उन्होंने बताया कि मध्यकालीन भारतीय इतिहास में औरंगजेब का एक चरित्र हमारे सामने धार्मिक कट्टरता के लिए जाना जाता है, तो दाराशिकोह भी हमारे उन्हीं इतिहास के पन्नों में दर्ज है जो अपनी धार्मिक उदारता और हिंदू धर्म के गहन अध्ययन के लिए विश्व विख्यात है। दाराशिकोह 54 उपनिषदों को अरबी-फारसी भाषाओं में अनुवाद के लिए, बनारस के पंडितों के पास रहकर संस्कृत सीखने और शंकराचार्य की टिप्पणियों के गहन अध्ययन के लिए जाना जाता है। उसके पास हिंदू धर्म और दर्शन का जितना गहरा ज्ञान था, उसकी किसी से तुलना आज भी किसी से नहीं की जा सकती। 

उन्होंने कहा कि अपनी इसी सोच के कारण उसे अपने समय के मुस्लिम कट्टरपंथियों का शिकार भी होना पड़ा। इतिहास में अकबर, जहांगीर और टीपू सुल्तान के रूप में ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं। इनकी भूमिका की जानकारी लोगों तक पहुंचाने से समाज में एक सकारात्मक माहौल बनता है, जबकि कट्टर प्रकृति के लोगों को बढ़ावा देने से तनाव बढ़ता है।  

उन्होंने बताया कि इतिहास का हर कालखंड हमें बताता है कि जिस समय सत्ता की धमक दिखाने के लिए कोई बादशाह किसी हिंदू राजा को प्रताड़ित करने का काम करता था, ठीक उसी काल में देश के दूसरे हिस्से में दोनों समुदाय एक-दूसरे के साथ बेहद शांति के साथ रह रहे थे। जिस समय अकबर का महाराणा प्रताप से लड़ाई चल रही होती है (जिसे आजकल हिंदू बनाम मुस्लिम विवाद की तरह पेश किया जाता है), उसी समय कोई मुस्लिम सरदार महाराणा प्रताप की सेना की बागडोर संभाल रहा होता है। इस प्रसंग से यह समझने की जरूरत है कि अब तक जिन घटनाओं को हिंदू-मुस्लिम विवाद के रूप में पेश किया जाता रहा है, उसकी जड़ में सत्ता की लड़ाई ज्यादा रही है, इसका सामाजिक तौर पर असर अपेक्षाकृत हमेशा बेहद कम रहा है।     

सिविल सोसाइटी की भूमिका अहम
डॉ. मनीषा अग्निहोत्री ने कहा कि वर्तमान हालात में धार्मिक और सामाजिक तौर पर लब्ध प्रतिष्ठित लोगों की भूमिका अहम हो जाती है कि वे अपने धर्म-समुदाय के लोगों को बताएं कि सच्चाई क्या है और उन्हें एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। यदि समाज के लोग सच्चाई समझें और एक-दूसरे के साथ खड़े रहें तो सामाजिक सौहार्द्र को कोई खतरा नहीं है क्योंकि अंततः कोई देश या समाज इसी सौहार्द्र से ही चलता है।

एक-दूसरे का सम्मान करें
राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. सोनाली चितलकर (मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली) ने कहा कि यह देखना दुखद है कि इस समय देश-दुनिया के सभी समाजों में ‘रैडिकलाइजेशन’ बढ़ रहा है। धर्म के नाम पर ज्यादा शोर-शराबा करने और दिखावे के कार्यक्रम ज्यादा आयोजित किए जाते हैं। आज यही कार्यक्रम अपनी धमक दिखाने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए प्रयोग किया जाने लगा है जो सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बनकर उभर रहा है। ये कार्यक्रम सबके लिए नुकसानदेह होते हैं।

उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में सरकारों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यदि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाने में कोई गलती की तो उससे स्थिति बिगड़ सकती है। इस संदर्भ में सरकारों को सभी समुदायों को एक साथ रखते हुए सबके लिए एक जैसा कानून बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। यदि किसी भी कारण से एक वर्ग को खुश करने और दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश होगी तो उससे स्थितियां काबू में नहीं होंगी।

सबको एक कानून के नीचे लाने की आवश्यकता
डॉ. सोनाली चितलकर के अनुसार, इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बेहतरीन पहल की है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंदिर-मस्जिद में भेद किए बिना सबके लिए निर्देश दिया है कि किसी भी धार्मिक स्थल में लाउडस्पीकर की क्षमता उस परिसर से बाहर नहीं जानी चाहिए, नए धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह फैसला हर समाज के लिए एक सुखद संदेश लेकर आया है। अन्य सरकारों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए।

वोट की राजनीति बिगाड़ रही है खेल
राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. शिवानी सिंह (दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली) ने कहा कि हिंदू-मुस्लिम समुदाय की एकता कोई मिथ नहीं, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई है। हर दंगे में देखा जाता है कि कुछ कट्टरपंथी लोग किसी समुदाय विशेष को नुकसान पहुंचा रहे होते हैं तो उसी समय उसी समुदाय के कुछ अन्य लोग दूसरे समुदाय के लोगों की जान बचा रहे होते हैं। हमारे संबंधों की सच्चाई यही है। इस समुदाय के लोगों में अच्छे-बुरे हर प्रकार के लोग पाए जाते हैं।

डॉ. शिवानी सिंह ने कहा कि जब 1947 में धर्म के आधार पर देश का बंटवारा हुआ तो भी इसके पीछे सत्ता को पाने की लालसा थी, तो आज भी वोटों के लालच के कारण ही सामाजिक सौहार्द्र को बिगाड़ने की कोशिश की जाती है। किसी दल विशेष को लगता है कि धार्मिक आधार पर विभाजन से उसको लाभ होगा तो वह इस तरह की घटनाओं को करने की कोशिश करता है जिससे धार्मिक आधार पर तनाव बढ़े और लोगों में विभाजन हो। 

लेकिन ऐसे अवसरों पर लोगों को आत्मविवेक से काम लेना चाहिए और अपने पुराने संबंधों को ध्यान में रखते हुए अपनी भूमिका निर्धारित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि धार्मिक उन्माद बेहद सीमित कालखंड के लिए होता है जबकि सौहार्द्र स्थाई होता है क्योंकि देश और समाज इसी से आगे चलता है। उन्होंने कहा कि एक समाज का कट्टरपंथी दूसरे समाज के कट्टरपंथियों की राजनीति के लिए जमीन उपलब्ध कराता है। जैसे 9/11 की घटना या सीरिया से आए आईएसआईएस के संदेशों ने दुनिया के दूसरे धर्मों के कट्टरपंथियों को मुसलमानों को निशाने पर लेने का अवसर उपलब्ध करा दिया। ऐसे में सभी धर्म के लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने धर्म में कट्टरपंथियों को महत्त्व न दें। इससे दूसरे धर्मों के कट्टरपंथी स्वयं ही हाशिए पर चले जाते हैं।

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