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किसान आंदोलन: 100 दिन में खर्च हो गए 308 करोड़ रुपये, किसानों की झोली पर पड़ रहा है भारी

Sat, 06 Mar 2021 05:37 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 06 Mar 2021 05:37 PM IST
सार

एक महापंचायत में अधिकतम पांच लाख रुपये खर्च होते हैं। इसमें टैंट, मंच और साउंड सिस्टम शामिल है। अभी तक 55 से ज्यादा महापंचायत हो चुकी हैं, जिन पर ढाई करोड़ रुपये खर्च हुए हैं...

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Expenses of farmers protest has crossed Rs 308 crore includes the tractor parade
Kisan Mahapanchayat Nagaur, Rajasthan - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

देश में किसान आंदोलन के सौ दिन पूरे हो चुके हैं। तीनों कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए किसान लगातार धरना दे रहे हैं। अब महापंचायतों और रैलियों का दौर आरंभ हो गया है। गणतंत्र दिवस के बाद केंद्र सरकार की ओर से बैठक का बुलावा नहीं आया है। हालांकि दोनों पक्ष बैठक करने के लिए उत्सुक हैं। इस सारी जद्दोजहद के बाद अगर किसान आंदोलन का खर्च देखें, तो अभी तक वह 308 करोड़ रुपये के पार जा चुका है। इसमें ट्रैक्टर परेड, उससे पहले का आंदोलन और गणतंत्र दिवस के बाद अभी तक के 38 दिन का आंदोलन शामिल है। इसके अलावा छोटी-बड़ी 60 से अधिक महापंचायतों का खर्च भी उक्त आंकड़े में जोड़ा गया है। संयुक्त किसान मोर्चे के वरिष्ठ सदस्य हन्नान मौला के अनुसार, हर किसान अपने हिस्से का चंदा देता है। कई संगठन भी किसानों की मदद के लिए आगे आए हैं।

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किसान ने नहीं मानी हार

हन्नान मौला कहते हैं, आंदोलन की सबसे अच्छी बात यही है कि अभी तक किसान ने हार नहीं मानी है। अब तो सारे देश के किसान और आम जन मानस भी आंदोलन का हिस्सा बनता जा रहा है। महंगाई आसमान छू रही है, लेकिन अपने जीवन की लड़ाई लड़ रहे किसान का हौसला कहीं से भी कम नहीं हुआ है। केंद्र सरकार अभी अहंकार में है। जब उसे अपनी जमीनी हकीकत पता चलेगी तो वह बात भी करेगी और तीनों कानूनों को वापस भी लेगी।

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26 जनवरी तक किसान आंदोलन और ट्रैक्टर परेड के खर्च को मिलाएं तो वह 225 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया था। हालांकि इस राशि में खाना-पीना आदि शामिल नहीं था। इसमें केवल पेट्रोल और डीजल का खर्च जोड़ा गया है। किसान संगठनों के नेताओं का कहना था कि ट्रैक्टर परेड वाले दिन दो लाख ट्रैक्टर एवं दूसरे वाहन दिल्ली और उसके आसपास तक पहुंचे थे। इसके अलावा गणतंत्र दिवस से पहले दो माह के दौरान लगभग दो लाख वाहन ऐसे थे जो अपनी बारी के हिसाब से दिल्ली की बाहरी सीमा तक आते-जाते रहे थे। इनके साथ ही एक लाख कार व बाइक जैसे हल्के वाहन भी शामिल रहे। पंजाब जम्हूरी किसान सभा के महासचिव कुलवंत सिंह संधू ने तब दावा किया था कि दो से ढाई लाख ट्रैक्टर दिल्ली बॉर्डर के आसपास बाहर खड़े हैं।

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एक महापंचायत में खर्च हो जाते हैं पांच लाख रुपये तक

गणतंत्र दिवस के बाद दिल्ली की सीमाओं पर जारी तीनों धरना स्थलों पर रोजाना लगभग तीस हजार किसान जुट पा रहे हैं। अब तक के 38 दिनों का हिसाब जोड़ें तो एक किसान के खाने-पीने पर न्यूनतम सौ रुपये प्रतिदिन खर्च हो रहे हैं। चाय पानी का खर्च अलग है। ऐसे में यह खर्च करीब साढ़े 13 करोड़ रुपये के पार चला जाता है। इससे पहले के 62 दिन का भोजन खर्च देखें तो वह रोजाना 90 हजार किसानों के हिसाब से 54 करोड़ रुपये बैठता है। अब महापंचायतों और रैलियों का दौर चल रहा है। बहुत से व्यापारिक और सामाजिक संगठन अपने तरीके से किसानों की मदद कर रहे हैं तो ऐसे में महापंचायत या रैली का खर्च कुछ कम हो जाता है।


किसान नेता के मुताबिक, एक महापंचायत में अधिकतम पांच लाख रुपये खर्च होते हैं। इसमें टैंट, मंच और साउंड सिस्टम शामिल है। पानी और खाना, किसान साथ लेकर आते हैं या कोई संगठन उसकी जिम्मेदारी ले लेता है। अभी तक 55 से ज्यादा महापंचायत हो चुकी हैं, जिन पर ढाई करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

कहां-कहां पर हुई हैं किसान महापंचायत, कुछ प्रमुख जगह...

गाजीपुर से बाहर निकलने के बाद सबसे पहली किसान महापंचायत हरियाणा के जींद में आयोजित की गई थी। इसके बाद दादरी, मुजफ्फरनगर, बहादुरगढ़, बालसमंद, रुद्रपुर, खरक पूनिया, अलवर, झुंझनूं, नागौर, बिलारी, मुंडेरवा, सिसौली, बिजनौर, बड़ौत, सांगली, कुरुक्षेत्र, शाहजहांपुर बॉर्डर, झाड़ोदा, मेवात, मथुरा, दौसा, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, सहारनपुर, सीकर, लखनौर, इटावा और तेलंगाना आदि इलाकों में महापंचायतें की गई हैं। अभी श्योपुर, बलिया, जोधपुर, रीवा, जबलपुर और कर्नाटक में महापंचायतों का कार्यक्रम तय किया गया है। पश्चिम बंगाल और दूसरे चुनावी राज्यों में भी किसान संगठनों के नेता पहुंचेंगे।

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