{"_id":"5c434772bdec220bb35c24a1","slug":"ex-director-of-cbi-make-silence-and-has-not-written","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"यूपीए सरकार में भड़ास निकालने वाले सीबीआई के पूर्व निदेशक एनडीए सरकार में चुप क्यों हो गए हैं?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
यूपीए सरकार में भड़ास निकालने वाले सीबीआई के पूर्व निदेशक एनडीए सरकार में चुप क्यों हो गए हैं?
Sat, 19 Jan 2019 09:21 PM IST
Jitendra Bhardwaj
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Published by: Jitendra Bhardwaj
Updated Sat, 19 Jan 2019 09:21 PM IST
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सीबीआई की वेबसाइट
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सीबीआई में इतना कुछ हो गया और अभी चल ही रहा है, मगर इन सबके बीच केंद्रीय जांच एजेंसी के पूर्व निदेशक मौन हैं। यूपीए सरकार में कई निदेशकों ने सीबीआई को लेकर जमकर लिखा था। आए दिन उनके लेख अखबारों की सुर्खियां बनते थे। आज वे कुछ नहीं बोल रहे हैं।
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सीबीआई की वेबसाइट पर 2014 के बाद किसी भी पूर्व निदेशक या अन्य आईपीएस अधिकारी ने एक शब्द नहीं लिखा। दिसंबर 2014 में सीबीआई के निदेशक रहे रंजीत सिन्हा ने वेबसाइट पर अपना विदाई संदेश डाला था।वेबसाइट पर यही आखिरी लेख था। इसके बाद न तो पूर्व आईपीएस और न ही जांच एजेंसी का हिस्सा रहे किसी अधिकारी ने कुछ लिखने का साहस जुटाया।
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2014 तक जांच एजेंसी के पूर्व निदेशकों ने सीबीआई को गर्त में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार कारणों पर कई लेख लिखे थे। सीबीआई का दुरुपयोग, सुप्रीम कोर्ट का इस एजेंसी को 'तोता' कहना और सीवीसी के साथ संबंध, आदि विषयों पर कई निदेशक जबरदस्त तरीक़े से कलम चलाते रहे। सबसे ज्यादा लेख पूर्व निदेशक, जो कि अब इस दुनिया में नहीं हैं, सरदार जोगेंद्र सिंह ने लिखे हैं।
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उन्होंने सीबीआई के दुरुपयोग, टूजी स्कैम और जांच एजेंसी की स्वायत्तता पर केंद्र सरकार एवं राजनीतिक दलों की जमकर खिंचाई की थी।पूर्व निदेशक अमर प्रताप सिंह, जिनकी सेवानिवृत्ति के बाद सीबीआई ने उनके खिलाफ एक मामले में जांच शुरु कर दी थी, ने केवल आरुषि-हेमराज मर्डर केस के जांच अधिकारी को लेकर कुछ लिखा था।
आईपीएस शांतनु सेन ने भी सीबीआई की साख कैसे और कब गिरनी शुरु हुई, इस बाबत एक आर्टिकल लिखा था।इसमें उन्होंने बताया था कि 1990 के दशक में हवाला कांड की डायरी में लिखे कई नामों को बचा लिया गया और उसके बाद यूरिया स्कैम में पूर्व पीएम के परिवार का हाथ होने के मामले में भी जांच एजेंसी की भूमिका संदिग्ध रही।
यहीं से एजेंसी की साख गिरती चली गई।एनएसजी के पूर्व डीजी रणजीत शेखर, सीबीआई के पूर्व कार्यकारी निदेशक त्रिनाथ मिश्रा और निदेशक रहे आरके राघवन के लेख भी वेबसाइट पर नजर आते हैं। आईपीएस शंकर सेन ने भी फंक्शनिंग ऑफ लोकपाल एंड द सीबीआई नीड फॉर सिनर्जी, पर लेख लिखा था।यह सबसे पहला लेख था, जिसे सीबीआई वेबसाइट पर जगह मिली।
पूर्व निदेशकों का लेख लगाने की मनाही तो नहीं!
cbi
- फोटो : PTI
यह एक बड़ा सवाल है कि क्या पूर्व निदेशक कुछ लिखने से खुद पीछे हट गए या फिर उनकी कलम पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस बारे में कोई खुल कर नहीं बोल रहा। सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर शांतनु सेन एकमात्र ऐसे अधिकारी रहे हैं, जो 2014 के बाद भी मीडिया में जांच एजेंसी और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर खूब बोलते हैं।
दो माह पहले तक भी उनका साक्षात्कार मीडिया में आता रहा है, जबकि इससे पहले भी वे नियमित तौर पर अपनी बात रखते रहे हैं, लेकिन 2014 के बाद उनका एक भी लेख सीबीआई वेबसाइट पर नहीं दिखा। पूर्व निदेशक विजय शंकर ने 2015 में एक साक्षात्कार दिया, जबकि अनिल सिन्हा भी पिछले साल सीबीआई के बारे में अपनी राय रख चुके हैं।
हैरानी की बात है कि इनके लेख भी वेबसाइट पर नहीं हैं। सीबीआई में काम कर चुके ज्वाइंट डायरेक्टर स्तर के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि 2014 के बाद जांच एजेंसी में किसी भी आईपीएस या पूर्व निदेशक का लेख छापना बंद कर दिया गया है। आदेश कहां से आए, कब आए, इस बाबत उन्होंने कुछ नहीं बताया। हालांकि जांच एजेंसी के एक अधिकारी से जब इस बारे में जानने का प्रयास किया तो उन्होंने भी ढुलमुल जवाब दिया।
दो माह पहले तक भी उनका साक्षात्कार मीडिया में आता रहा है, जबकि इससे पहले भी वे नियमित तौर पर अपनी बात रखते रहे हैं, लेकिन 2014 के बाद उनका एक भी लेख सीबीआई वेबसाइट पर नहीं दिखा। पूर्व निदेशक विजय शंकर ने 2015 में एक साक्षात्कार दिया, जबकि अनिल सिन्हा भी पिछले साल सीबीआई के बारे में अपनी राय रख चुके हैं।
हैरानी की बात है कि इनके लेख भी वेबसाइट पर नहीं हैं। सीबीआई में काम कर चुके ज्वाइंट डायरेक्टर स्तर के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि 2014 के बाद जांच एजेंसी में किसी भी आईपीएस या पूर्व निदेशक का लेख छापना बंद कर दिया गया है। आदेश कहां से आए, कब आए, इस बाबत उन्होंने कुछ नहीं बताया। हालांकि जांच एजेंसी के एक अधिकारी से जब इस बारे में जानने का प्रयास किया तो उन्होंने भी ढुलमुल जवाब दिया।