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जंगलों में लौटता जीवन: जानिए भारत के जंगलों में से खत्म हो रहे जीवों को वापस लौटाने के सफल प्रयासों की कहानी

Sat, 05 Jun 2021 08:28 AM IST
Kuldeep Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kuldeep Singh Updated Sat, 05 Jun 2021 08:28 AM IST
सार

  • लॉकडाउन हमेशा के लिए नहीं लगाया जा सकता लेकिन मानव गतिविधियों की वजह से खत्म हुए जीवो को लौटाने की कोशिश तो हो ही रहती है।

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Environment day 2021: Know the story of successful efforts to bring back the animals that are being lost from the forests of India
चीता - फोटो : पेक्सेल्स

विस्तार

कोरोना महामारी के चलते डेढ़ वर्ष पहले लगे लॉकडाउन में मानवीय गतिविधियां थमी और कई वन्यजीवों का सड़कों से लेकर कॉलोनियों तक में घूमते देखा गया। जहां वे आमतौर पर फटकते भी नहीं। यह संकेत था कि प्रकृति में हमारा हस्तक्षेप कम हो तो, वास्तविक इकोसिस्टम यानी पारिस्थितिकी तंत्र फिर से अपनी जगह बना लेगा।

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70 साल बाद इस साल लौटेगा चीता

ऐसा इसलिए हुआ 
मौजूदा छत्तीसगढ़ में सरगुजा के पूर्व राजा द्वारा 1948 में तीन एशियाई चीतों का शिकार किया गया था। यह भारत की धरती पर आखिरी तीन चीते माने जाते हैं। भारी संख्या में शिकार की वजह से यह तेजी से खत्म हो रहे थे और अंत में धरती के सबसे तेज दौड़ने वाले इस जीव को भारत से विलुप्त घोषित कर दिया गया।

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1955 में ही शुरू हो गए वापसी के प्रयास
चीतों को भारत में लौटाने के प्रयास 1955 में ही शुरू हो गए थे। लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। अब कई दशकों के प्रयासों के बाद अंततः इस वर्ष नवंबर में दक्षिण अफ्रीका से 10 अफ्रीकी चीते भारत लाने पर सहमति बन गई है।
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प्रोजेक्ट चीता : खर्च होंगे 14 करोड़
इन चीतों को मध्यप्रदेश के चंबल नदी क्षेत्र में स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान में रखा जाएगा। इसके लिए मौजूदा वित्त वर्ष में प्रोजेक्ट चीता के तहत 14 करोड़ खर्च होंगे। ये चीते एशियाई चीतों से अलग हैं।

यहां समुद्र, तटीय मैदान, नदियों के मैदान, दक्षिणी और पश्चिमी पठार, मरुस्थल, हिमालय समेत कई पर्वतीय जैसी भौगोलिक विविधताओं सहित कई पारिस्थितिकी तंत्र ओं के कारण दुनिया के 12 सबसे ज्यादा विविधता देशों में एक है भारत। 

प्रजातियों के तेजी से लुप्त होने से भारत सबसे संवेदनशील जैव विविधता वाले क्षेत्रों में सबसे संवेदनशील क्षेत्र पश्चिमी घाट है।

 

कितने हर गए घड़ियाल?

घड़ियाल
रह गए थे : 200 से कम 
आज संख्या : 1900 केवल चंबल नदी में

किसी समय भारत की नदियों में हजारों की संख्या में मिलने वाले घड़ियाल शिकार बांध वह बिजली परियोजनाओं और नदियों में बढ़े प्रदूषण की वजह से 2006 तक घटकर 2 से से भी कम रह गए।

1980 में संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए : साल 2012 तक इनकी संख्या करीब 900 पहुंची। अब नदियों में यह नजर आने लगे हैं उड़ीसा में महानदी में घड़ियाल 40 साल बाद प्राकृतिक रूप से प्रजनन करने लगे हैं।



व्हाइट रम्प्ड वल्चर
कभी मिलते थे :  करोड़ों में 
अब बचे रह गए थे : 1 प्रतिशत

भारत में करोड़ों की संख्या में मिलने वाले गिद्ध 1990 तक सिर्फ 1 फीसदी बचे थे। वजह, मरते पशुओं में डाइक्लोफेनेक जैसी दवाओं का इस्तेमाल था, जिन्हें खाने पर इनके गुर्दे खराब हो रहे थे।

वापसी
2001 में चंडीगढ़ के पास पिंजौर में जटायु संरक्षण व प्रजनन केंद्र शुरू हुआ 
बीते वर्ष दिसंबर में इस सेंटर द्वारा पहली बार 8 व्हाइट रम्प्ड वल्चर जंगल में छोड़े गए।

कितने रह गए पिग्मी शूकर और भारतीय गैंडा?

पिग्मी शूकर 
विलुप्ति से निकल कर आए 

रह गए थे : 250 से कम 
आज संख्या : 350 से 400 तक

हिमालय के निचले पहाड़ों में मिलने वाले 6 से 8 किलो वजनी पिग्मी शूकर का आकार 20 से 30 सेंटीमीटर होता है। 1859 में पहली बार देखे गए। यह बौने शूकर जंगलों के खत्म होने और शिकार की वजह से विलुप्त होने लगे। इन्हें 60 के दशक तक विलुप्त मान लिया गया था।

आज पिग्मी शूकर असम के मानस और ओरांग राष्ट्रीय उद्यान में पनप रहे हैं। कुछ को सोनाई रूपई वन्य जीव अभ्यारण में भी रखा गया है। अनुमान है कि आज इनकी संख्या करीब 400 हो चुकी है।

भारतीय गैंडा 
दुधवा में शून्य से अब संख्या हुई 42
रह गए थे : 1800 
आज संख्या : 3600

एक सींग वाला भारतीय गैंडा गंगा के मैदान में हजारों की संख्या में पाया जाता था। शिकार और खत्म होते जंगलों से इसकी संख्या भी सीमित होती गई, जो 1990 के दशक में करीब 1800 मानी जा रही थी।

भारत सरकार ने शिकार पर कड़ी रोक लगाई। उत्तर प्रदेश के दुधवा में 1984 में पांच भारतीय गैंडे लाए गए। यहां धीरे-धीरे इनकी आबादी बढ़ी और साल 2020 में इनकी संख्या 42 पहुंच चुकी है। इस वर्ष में 2 गैंडों के बच्चों का जन्म हुआ है।

भारतीय वनों में गैंडों की कुल आबादी 2020 में करीब 3600 मानी जा रही थी। करीब 80% संरक्षित जंगलों में हैं। कुछ नेपाल में भी हैं। दुधवा जैसा एक प्रोजेक्ट उत्तराखंड के जिम कार्बेट पार्क के लिए भी बनाया जा रहा है।
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