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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कंपनी में अपना पता अपडेट न करने वाले कर्मचारी को राहत नहीं, बहाली का आदेश खारिज

Mon, 22 Jun 2026 10:24 PM IST
राकेश कुमार आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Mon, 22 Jun 2026 10:24 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और लेबर कोर्ट के आदेश को पलटते हुए साफ किया है कि कंपनी को अपना नया पता न बताने की लापरवाही का फायदा कर्मचारी नहीं उठा सकता। कोर्ट ने बिना सूचना गायब रहने वाले कर्मचारी अर्जुन गुप्ता की बहाली और 50% बैक वेजेस के फैसले को सबूतों के अभाव में पूरी तरह रद्द कर दिया है। क्या है मामला? जानिए...
 

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employee cannot benefit from failure to update address with employer Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी और नियोक्ता के रिश्तों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अगर कोई कर्मचारी अपना निवास स्थान बदलता है, तो इसकी जानकारी कंपनी को देना पूरी तरह उसी की जिम्मेदारी है। अपनी इस लापरवाही या चूक का फायदा कोई भी कर्मचारी नहीं उठा सकता। इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले और लेबर कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें एक कर्मचारी को सेवा में बहाल करने और पिछला वेतन देने का निर्देश दिया गया था।
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मैसर्स रिफिलिस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कर्मचारी अर्जुन गुप्ता के उस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि जून 2012 में काम पर लौटने की कोशिश के बाद उसे अवैध रूप से नौकरी से निकाल दिया गया था।
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क्या था पूरा विवाद और लेबर कोर्ट का रुख?
यह पूरा विवाद साल 2012 से शुरू हुआ था। अर्जुन गुप्ता अगस्त 2006 से कंपनी में मोल्डर के पद पर कार्यरत थे, लेकिन 14 मई 2012 से उन्होंने अचानक काम पर आना बंद कर दिया। कंपनी का दावा था कि वह बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहे। इसके बाद कंपनी ने 18 मई 2012 को उनके रिकॉर्ड में दर्ज स्थायी पते पर एक नोटिस भेजकर स्पष्टीकरण मांगा था।
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इस मामले में लेबर कोर्ट ने शुरुआत में फरवरी 2022 में कर्मचारी के पक्ष में एकपक्षीय आदेश पारित किया था। बाद में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजा, तो लेबर कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में फिर से कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया। लेबर कोर्ट ने अर्जुन गुप्ता को सेवा में बहाल करने और 50 प्रतिशत बैक वेजेस (पिछला वेतन) व अन्य सेवा लाभ देने का आदेश दिया था, जिसे बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने बिना किसी पुख्ता सबूत के कर्मचारी को राहत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट का तर्क था कि कंपनी ने नोटिस गौतम बुद्ध नगर के पते के बजाय बिहार के स्थायी पते पर भेजा था। इसे खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में दर्ज पते पर भरोसा करने के लिए नियोक्ता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, 'एक नियोक्ता से केवल उसी पते पर संवाद करने की उम्मीद की जा सकती है जो कर्मचारी ने खुद प्रदान किया है। यदि कर्मचारी ने अपना निवास स्थान बदल लिया था, तो इसकी सूचना देने का दायित्व उसी पर था।'  शीर्ष अदालत ने कर्मचारी के उन दावों को भी पूरी तरह मनगढ़ंत और बेबुनियाद माना कि वह अपनी मां की गंभीर बीमारी के कारण अनुपस्थित था, क्योंकि इसके पक्ष में कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि बिना मंजूरी के गायब रहना, लिखित सूचना न देना और काम पर लौटने का कोई सबूत न होना यह साबित करता है कि लेबर कोर्ट का अक्टूबर 2023 और हाईकोर्ट का मार्च 2024 का आदेश पूरी तरह गलत था, जिसे अब तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।
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