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Emergency@50: आपातकाल के वो काले किस्से जिन्होंने हिला दिया था पूरा देश; प्रेस पर भी लगी थीं पाबंदियां

Wed, 25 Jun 2025 07:20 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 25 Jun 2025 07:20 AM IST
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सार
Emergency: 1975 में 25 और 26 जून की दरमियानी रात से 21 मार्च 1977 तक (21 महीने) तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की थी। 
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Emergency in India Congress Indira Gandhi Govt imposed in 1975 its reason and effects news
इमरजेंसी के 50 साल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल को आज 50 साल पूरे हो रहे हैं। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार की तरफ से लगाई गई इमरजेंसी एक काला अध्याय है। दरअसल, इसी दिन करोड़ों भारतीयों के मौलिक अधिकारों को कुचलने की कोशिश की गई थी। 


केंद्र सरकार ने बीते साल 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में घोषित किया था। अपने इस फैसले को केंद्र ने आपातकाल के खिलाफ लोकतंत्र बहाली की जंग लड़ने के दौरान अमानवीय यातना झेलने वाले लाखों लोगों का सम्मान करार दिया था। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस दौरान कहा था कि 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाना इस बात की याद दिलाएगा कि उस दिन क्या हुआ था और संविधान को कैसे कुचला गया था।


अमर उजाला के पन्नों में भी आपातकाल की हर खबर दर्ज है। 25 जून को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने से लेकर 1977 में हटने तक हर खबर अमर उजाला के अंकों में नजर आती है। आइये जानते हैं कि 1975 में देश में कैसे लगाया गया था आपातकाल? इसके क्या कारण थे? आपातकाल के दौरान क्या-क्या हुआ? बाद में इसे कैसे हटाया गया?  


 

25 जून 1975 की स्याह रात, जब आपातकाल की घोषणा की गई, उस रात से ही पुलिस ने विरोधी दलों के नेताओं, बच्चों पर जो जुल्म किए, उन्हें याद कर लोकतंत्र सेनानी अब भी सिहर उठते हैं। शहर में 150 से ज्यादा लोकतंत्र सेनानी और हजारों लोग ऐसे हैं, जिन्होंने 21 महीने के आपातकाल में पुलिस के जुल्म झेले और जेल में यातनाएं सहीं। लोकतंत्र सेनानी और अब विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल बताते हैं कि जाट हाउस से निकलते ही लोहामंडी थाने की पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। वह 15 साल के थे। जेल में पिटाई और केवल सूखी रोटी मिलती थी। दिनभर प्यासा रखा जाता था कि मनोबल तोड़ा जा सके।

कई दिनों के बाद वह जेल से रिहा हुए। आपातकाल का एक-एक दिन उनके जेहन में बसा है। लोकतंत्र सेनानी विजय गोयल और उनके छोटे भाई संजय गोयल पर भी जुल्म हुआ। संजय गोयल तब सेंट जोंस इंटर कॉलेज के सातवीं के छात्र थे। पुलिस ने उन्हें पकड़ा और डेढ़ महीने जेल में रखा। वह तब 12 साल के थे और सबसे छोटे आंदोलनकारी थे। उनके बड़े भाई और संघ के स्वयंसेवक विजय गोयल बताते हैं कि इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे लगाने पर पुलिस ऐसी यातनाएं देती थी कि रूह कांप जाए। उन्होंने जेल से ही परीक्षा दी थी।

अमर उजाला ने खाली रखा था संपादकीय
अमर उजाला के पुराने पन्नों में दर्ज है कि तत्कालीन सरकार ने आपातकाल में जब प्रेस पर सेंसरशिप और पाबंदियां लगाईं तो अमर उजाला ने अपने संपादकीय की जगह खाली छोड़कर विरोध दर्ज कराया था। आपातकाल के समर्थन में पूरी सरकार के मंत्री जुट गए थे, जो जगह-जगह जाकर आपातकाल की खूबियां गिना रहे थे।

शाह आयोग का किया था गठन
जनता सरकार आने पर मार्च 1977 में आपातकाल हटाने की घोषणा नई सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने की थी। 21 महीने के आपातकाल में सरकारी मशीनरी ने जो दुरुपयोग किए, उनकी जानकारी के लिए तत्कालीन सरकार ने शाह आयोग का गठन 20 मई 1977 को किया। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति जेसी शाह को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था।

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