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Electoral Bonds: चुनावी चंदे का यह निकल सकता है नया रास्ता, बॉन्ड का रद्द होना चुनावों से पहले है बड़ा झटका

Thu, 15 Feb 2024 02:44 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 15 Feb 2024 02:44 PM IST
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सार
कानूनी मामलों के जानकार और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित वर्मा कहते हैं कि कोर्ट का यह फैसला बहुत ही सराहनीय है। इससे न सिर्फ आगे राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता आएगी, बल्कि इस बात का भी पता चलेगा कि कौन किसे कितना पैसा दे रहा है...
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Electoral Bonds: hue set back for political parties due to cancellation of bonds before the elections
Electoral Bonds - फोटो : Amar Ujala/ Himanshu Bhatt

विस्तार

आने वाले लोकसभा के चुनावी माहौल में सुप्रीम कोर्ट का इलेक्टोरल बांड पर आया बड़ा फैसला सियासी दलों के लिए झटका माना जा रहा है। दरअसल इलेक्टोरल बांड पर सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी लगा दी है। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि बीते पांच वर्षों में 5000 करोड़ से ज्यादा चंदा भारतीय जनता पार्टी को मिला। जबकि दूसरे नंबर पर 900 करोड़ के साथ कांग्रेस और तीसरे नंबर पर तृणमूल कांग्रेस है। कानूनी मामलों के जानकारों का मानना है कि जब चुनाव सिर पर हैं, तो इस तरह की पाबंदी से निश्चित तौर पर आर्थिक रूप से मिलने वाली मदद पर बड़ा असर पड़ सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कानूनी जानकारों का मानना है कि अगर पारदर्शी तरीके से मिलने वाले चंदे की जानकारी देश की जनता को मिले तो नए विकल्प जल्द ही खुल जाएंगे।

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के आए एक फैसले ने देश की सियासत में बड़ी हलचल मचा दी। दरअसल यह फैसला सियासी दलों को मिलने वाले चुनावी चंदे की इलेक्टोरल बांड की प्रक्रिया पर रोक लगाने के साथ हुआ है। कानूनी मामलों के जानकार और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित वर्मा कहते हैं कि कोर्ट का यह फैसला बहुत ही सराहनीय है। इससे न सिर्फ आगे राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता आएगी, बल्कि इस बात का भी पता चलेगा कि कौन किसे कितना पैसा दे रहा है। सुमित कहते हैं कि सूचना के अधिकार के तहत देश के लोगों को इस बात की जानकारी मिलनी चाहिए कि किसने किसको कितना चंदा दिया है। वह कहते हैं कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत आ जाए तो रद्द हुए इलेक्टोरल बांड का नया विकल्प भी सामने आ जाएगा।



वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित वर्मा का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड की प्रक्रिया को रद्द करके बहुत ही न्याय संगत और तर्कसंगत फैसला दिया है। उनका कहना है कि देश के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि जो व्यक्ति चंदा दे रहा है कहीं उसके लिए सरकार कोई फेवर तो नहीं कर रही है। सूचना के अधिकार के तहत अभी तक इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी नहीं मिलती थी। इसलिए इस पर सवाल उठते थे। कानूनी मामलों के जानकारों का मानना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के रद्द किए जाने से चुनावी माहौल में सियासी दलों के लिए एक बड़ा झटका तो माना ही जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित वर्मा कहते हैं कि चुनावी दौर में राजनीतिक दलों को चंदा तो चाहिए ही होता है, ऐसे माहौल में इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था का रद्द किया जाना सभी सियासी दलों के लिए झटका है। अब सरकार को चाहिए कि चुनावी चंदे के लिए नई और पारदर्शी व्यवस्था बनाए।

इलेक्टोरल बांड पर पाबंदी लगने वाले आदेश के बाद सियासी दलों में भी हलचल मच गई। वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश सहाय कहते हैं कि इससे हर उस सियासी दल को झटका लगा है, जिसे इलेक्टोरल बांड से चुनावी चंदा मिलता था। वह कहते हैं कि सरकार ऐसी पारदर्शी व्यवस्था लाए, जिसमें चंदा देने वाले की पूरी जानकारी जनता को भी होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरीके से अगले कुछ हफ्तों के भीतर चंदा देने वालों के नाम उजागर करने को कहा है, उससे तस्वीर और भी साफ हो जाएगी। इस दौरान इस बात का पता चलेगा कि बीते कुछ सालों में किस औद्योगिक घराने से लेकर किस व्यक्ति ने कौन सी पार्टी को सबसे कितना चंदा दिया है। अवधेश सहाय कहते हैं कि चंदा देने की व्यवस्था कानूनी रूप से पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से अवश्य लागू होनी चाहिए। क्योंकि लोकसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं। इसलिए नई पारदर्शी व्यवस्था जितनी जल्दी लागू हो सकेगी उससे चुनावों में। इस्तेमाल होने वाले काले धन पर रोक भी उतनी ही तेजी से लगेगी।

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