इन सात कारणों से मिली भाजपा को प्रचंड जीत
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पांचों राज्यों के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी जिस तरह शानदार प्रदर्शन करती नजर आ रही है उसने एक बात तो साफ कर दी है कि देश में अभी भी मोदी लहर का असर बाकी है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा इतनी मजबूती से सामने आई है कि उसने दूसरे दलों के वजूद पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।
पांचों राज्यों के चुनावों में न नेता चले न अभिनेता केवल भाजपा का कमल ही हर तरफ खिलता दिख रहा है। हिंदी पट्टी के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश औरउत्तराखंड में जिस तरह भाजपा प्रचंड बहुमत से जीत की ओर है उसने लंबे समय के लिए भाजपा को इन दोनों राज्यों में ताकत देने का आधार तय कर दिया है।
हालांकि यह जीत इतनी आसान भी नहीं रही भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए जमकर मेहनत भी करनी पड़ी। इस जीत ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों दोनों पर मुहर लगा दी है। लेकिन इन सब कारणों से अलग कुछ कारण ऐसे भी हैं जिन्होंने भाजपा की जीत की राह तय कर दी। आइए डालते हैं ऐसे ही सात कारणों पर एक निगाह।
मोदी लहर का कायम रहना
लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत की सबसे बड़ी वजह बनी थी देशभर में चली मोदी लहर। इसी लहर पर सवार होकर भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत से केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई थी। लोकसभा चुनावों के बाद हुए हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र आदि के चुनावों में भी मोदी लहर कायम रही।
लेकिन इसके बाद दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा के खराब प्रदर्शनों के बाद माना जा रहा था कि यह लहर मंद पड़ी है। लेकिन पांचों राज्यों के चुनावों ने एक बार फिर इस बात पर मुहर लगा दी है कि देश में अभी मोदी लहर बदस्तूर कायम है। आम जनता में आज भी अन्य नेताओं की अपेक्षा मोदी की विश्वसनीयता सबसे ज्यादा है, लोग आज भी अपनी समस्याओं के हल के लिए मोदी की ओर ही देख रहे हैं।
नोटबंदी पर जनता के रुख को किया अपने पक्ष में
प्रधानमंत्री मोदी ने जब नवंबर में नोटबंदी का निर्णय लिया था तब आम जनता में उन्हें उस तरह का समर्थन नहीं मिल पाया था जैसा पार्टी और सरकार उम्मीद कर रही थी। नोटबंदी के बाद आई कई लोगों की मौत की खबर ने तो विपक्ष को बैठे बिठाए मुद्दा दे दिया जिसे उसने खुलकर भुनाने का प्रयास किया। यहां तक की संसद में भी विपक्ष ने इस मुद्दे को जमकर उठाया। विपक्ष के तल्ख तेवरों और जनता में बढ़ती नाराजगी के बीच प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस खुद ही इस मुद्दे पर मोर्चा संभाला।
पीएम मोदी ने तमाम मंचों से अपने इस निर्णय का खुलकर बचाव किया और इसके फायदे लोगों को गिनाए तो अमित शाह ने पार्टी सांसदों और विधायकों को इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाने की बजाय फ्रंटफुट पर रहने के निर्देश दिया। मोदी की मेहनत रंग लाई और नोटबंदी को धीरे धीरे जनता का समर्थन भी मिलने लगा।
धीरे धीरे हालात सामान्य हुए तो लोगों के दिलों में बसी नाराजगी भी जाती रही और उन्होंने नोटबंदी को सकारात्मक रूप से लिया। चुनावों में इसका फायदा भी भाजपा को खूब मिला।
जनता को पसंद आया केंद्र में मोदी का काम
पांचों राज्यों के मौजूदा परिणाम इस बात की ओर भी साफ इशारा कर रहे हैं कि जनता को केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार का काम भी पसंद आ रहा है।
आम जनता के लिए शुरू की गई उनकी गरीबों को गैस कनेक्शन देने वाली उज्जवला योजना, आम जनता को बैंक खाते मुहैया कराने वाली जनधन योजना, बेटियों के विकास के लिए सुकन्या समृद्धि योजना, अटल पेंशन योजना, कृषि बीमा योजना, दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी गरीबों की हितैषी योजनाएं हों या स्वच्छ भारत जैसे जनअभियान उनकी हर किसी योजना ने आम जनता को प्रभावित किया।
इसके अलावा डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे नारे भी लोगों को खूब आए। आम जनता को इन योजनाओं में अपना उज्जवल भविष्य दिखा तो उसने इस पर मुहर लगाने में देर नहीं लगाई।
दूसरी पार्टियों के वोटों में सेंध लगाने में मिली सफलता
भाजपा की जीत की एक बड़ी वजह ये भी रही कि रणनीतिक रूप से वह दूसरी पार्टियों के वोट में भी सेंध लगाने में सफल रही। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों पर ही निगाह डालें तो यहां भाजपा ने बसपा के वोट बैंक में सबसे तगड़ी सेंध लगाई है। कुछ उसी अंदाज में जिस तरह लोकसभा चुनावों में पार्टी ने यूपी में बसपा का दलित वोटबैंक तोड़ा था।
इसके अलावा भाजपा समाजवादी पार्टी के यादव और पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक में भी अच्छी खासी सेंध लगाई है। इसका नुकसान प्रदेश में इन दोनों बड़ी पार्टियों को उठाना पड़ा। खास बात ये रही कि पार्टी अपने उच्च जातियों वाले वोटबैंक को भी इस बार वापिस अपने पक्ष में खींचने में सफल रही जो बीतते चुनावों में बसपा और सपा की ओर मुड़ गया था।
सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है कि भाजपा ने कुछ मुस्लिम बहुल सीटों पर भी अच्छा प्रदर्शन किया है जिससे माना जा रहा है कि तीन तलाक जैसे भावनात्मक मुद्दे पर उसे मुस्लिम वर्ग का भी कुछ वोट हासिल हुआ है।
विकास के मुद्दे पर मिला जनता का साथ
बीते कई चुनावों में हिंदुत्वादी एजेंडा थामे रखने वाली भाजपा ने इस बार के चुनावों में अपनी रणनीति में बदलाव किया और इस कोर एजेंडे को एकतरफ रखकर विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा। हालांकि बीच बीच में जरूर पार्टी के कुछ हिंदुत्वादी चेहरे हिंदुत्व के मुद्दे को धार देते दिखे लेकिन पार्टी ने साफ तौर पर इससे परहेज ही रखा।
सारा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा गया। प्रधानमंत्री मोदी ने विकास को ही अपने मुख्य एजेंडे के तौर पर प्रचारित किया और उसे आम जनता के बीच में पहुंचाने में वह सफल भी रहे। इसके अलावा स्थानीय मुद्दों को भी पार्टी ने प्रमुखता से उठाया और सत्तारूढ़ सरकारों को घेरा। यूपी में उसका यह प्रयोग काफी सफल भी रहा।
दूसरों के मुकाबले सबसे ज्यादा रैलियां की मोदी ने
उस दौर में जब पूरा विपक्ष और मीडिया चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की अति सक्रियता को लेकर उन पर निशाना साध रहा था तब प्रधानमंत्री उतनी ही तल्लीनता और मेहनत से चुनावों में अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए जी जान झोंक रहे थे। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी प्रधानमंत्री ने चुनावों में 150 से अधिक रैलियां की।
केवल यूपी ही नहीं पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भी प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के लिए जमकर प्रचार किया। यूपी में तो हर जिले में पीएम ने लगभग एक रैली जरूर की जिसका साफ असर चुनावों में दिखा। जिस जिस सीट पर पीएम ने रैली की वहां भाजपा की जीत पक्की हो गई।
अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में तो प्रधानमंत्री ने तीन दिन तक डेरा डाले रखा। इसका परिणाम भी दिखा जब जिले की अधिकतर सीटों पर भगवा लहराता दिखा। दूसरी ओर इसके मुकाबले अन्य नेता पस्त ही नजर आए। यूपी में राहुल गांधी और अखिलेश यादव साथ मिलकर भी मोदी के बराबर रैलियां नहीं कर पाए। यही कारण रहा कि प्रचार के बाद विपक्ष चुनावों में भी मोदी के सामने पिछड़ता नजर आया।
विपक्ष की अंदरूनी राजनीति ने आसान कर दी राह
उस दौर में जब पीएम मोदी और उनके सिपहसलार चुनावी राज्यों में भाजपा की जीत की रणनीति तय कर रहे थे तब यूपी और उत्तराखंड जैसे बड़े राज्यों में विपक्ष आपसी लड़ाई में ही उलझा हुआ था। यूपी में सपा की अंदरूनी लड़ाई इस कदर थी कि उसने लोगों का पार्टी से ही मोहभंग कर दिया।
यहां जैसे तैसे अखिलेश पार्टी को कब्जे में करने में तो सफल रहे लेकिन कार्यकर्ताओं को एकजुट नहीं रख पाए। उनके अपने परिवार के लोग ही कभी इधर तो कभी उधर होते रहे। यही स्थिति दूसरे बड़े दल बसपा में रही जिसके कई बड़े नेता हाथी की सवारी छोड़कर भाजपा के साथ हो लिए। यहां तक की पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या ने भी बसपा का दामन छोड़कर भाजपा का कमल थाम लिया।
उत्तराखंड में भी यही हालात रहे, अच्छी छवि के बावजूद भी हरीश रावत पार्टी नेताओं को एकजुट नहीं रख पाए। नतीजा ये निकला विजय बहुगुणा जैसे पूर्व मुख्यमंत्री और सतपाल महाराज जैसे तमाम बड़े चेहरे पार्टी तोड़कर भाजपा के साथ हो लिए। विपक्ष की इसी फूट का फायदा भाजपा को चुनावों में मिला।