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Vice President: चुनाव आयोग जल्द शुरू करेगा उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया; सरकार को नहीं है इसकी जल्दबाजी

Wed, 23 Jul 2025 05:39 AM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 23 Jul 2025 05:39 AM IST
सार

माना जा रहा है कि सरकार मौजूदा संसद सत्र के दौरान उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराने की जल्दबाजी में नहीं है। संविधान में राष्ट्रपति के रिक्त पद पर छह महीने में चुनाव कराए जाने की अनिवार्यता है। उपराष्ट्रपति पद के लिए ऐसा नहीं है। अनुच्छेद 68 के खंड 2 के अनुसार, उपराष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से होने वाली रिक्ति पर यथाशीघ्र चुनाव कराया जाएगा।

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Election Commission to soon initiate process to hold vice-presidential polls know updates
जगदीप धनखड़, पूर्व उपराष्ट्रपति - फोटो : X @VPIndia

विस्तार

चुनाव आयोग (ईसी) जगदीप धनखड़ के पद छोड़ने के बाद अगले उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए चुनाव प्रक्रिया जल्द ही शुरू करेगा। हालांकि अभी तक इसे लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा मंगलवार को धनखड़ के इस्तीफे की आधिकारिक अधिसूचना जारी करने के साथ ही, उनके उत्तराधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो सकती है। हालांकि कहा जा रहा है कि सरकार मौजूदा संसद सत्र के दौरान उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराने की जल्दबाजी में नहीं है। 

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राष्ट्रपति मुर्मू ने किया स्वीकार  
इससे पहले, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उपराष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। जिसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सरकारी गजट में इसकी अधिसूचना जारी की। रिक्त हुए उपराष्ट्रपति पद के लिए जल्द चुनाव कराना होगा। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं, इसलिए यह पद भी खाली हो गया।
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न राज्यसभा पहुंचे, न औपचारिक विदाई 
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने मंगलवार सुबह 11 बजे सदन की कार्यवाही शुरू की। धनखड़ सदन की कार्यवाही में भी शामिल नहीं हुए। धनखड़ के लिए औपचारिक विदाई की रस्म नहीं हुई, न ही विदाई भाषण हुआ। राज्यसभा में पीठासीन अधिकारी भाजपा सांसद घनश्याम तिवारी ने बताया कि राष्ट्रपति ने धनखड़ का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। सदन में गृह मंत्रालय की अधिसूचना को पढ़ा गया। गृह सचिव गोविंद मोहन की ओर से जारी राजपत्र में धनखड़ का त्यागपत्र पुनः प्रकाशित किया गया, जिसे उन्होंने सोमवार शाम को सार्वजनिक किया था। इससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि सरकार धनखड़ को मनाने का प्रयास कर सकती है लेकिन इस्तीफा मंजूर किए जाने से इन अटकलों पर विराम लग गया।
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धनखड़ ने मंगलवार सुबह साफ कर दिया कि वह विदाई भाषण नहीं देंगे। आमतौर पर उच्च पद पर आसीन व्यक्ति की औपचारिक विदाई होती है। धनखड़ के मामले में सरकार ने ऐसा नहीं किया। इससे माना जा रहा है कि सरकार शायद उनके इस्तीफे के पक्ष में थी। हालांकि विपक्ष ने उनकी जमकर तारीफ की है, जिसने पिछले साल उनके कथित पक्षपात के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था।

मौजूदा सत्र के दौरान नए उपराष्ट्रपति नहीं
माना जा रहा है कि सरकार मौजूदा संसद सत्र के दौरान उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराने की जल्दबाजी में नहीं है। संविधान में राष्ट्रपति के रिक्त पद पर छह महीने में चुनाव कराए जाने की अनिवार्यता है। उपराष्ट्रपति पद के लिए ऐसा नहीं है। अनुच्छेद 68 के खंड 2 के अनुसार, उपराष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से होने वाली रिक्ति पर यथाशीघ्र चुनाव कराया जाएगा।

लुटियन दिल्ली में आवंटित होगा बंगला
 धनखड़ को उपराष्ट्रपति का आधिकारिक निवास खाली करना होगा। उन्हें लुटियन दिल्ली में सरकारी बंगला मिलेगा। सुरक्षा प्रोटोकॉल मौजूदा मानदंडों के अनुसार जारी रहेगा।

त्यागपत्र की रहस्य कथा...जो कभी रिकॉर्ड पर नहीं ली जाएगी
 धनखड़ के पद छोड़ने के दूसरे दिन भी सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। सूत्रों का दावा है कि राज्यसभा में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग नोटिस स्वीकार करना ही उनकी विदाई का सबब बना। दरअसल, सरकार इस मामले में एकजुटता का संदेश देना चाहती थी। लोकसभा के नोटिस में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित सत्तापक्ष व विपक्ष, दोनों के सांसदों के हस्ताक्षर हैं।

 धनखड़ के नोटिस स्वीकार करने से सरकार असहज हो गई। उसमें सत्तापक्ष के एक भी सदस्य के हस्ताक्षर नहीं हैं। सरकार ने इसे लोकसभा में अपने प्रस्ताव को कमजोर करने की चाल के रूप में देखा। यह इतना नागवार गुजरा कि न तो धनखड़ की औपचारिक विदाई हुई, न ही सरकार ने उनकी सेवाओं के लिए आभार प्रकट किया। प्रधानमंत्री का बयान भी रस्मी ही रहा।

जज को हटाने के लिए संसद के किसी भी सदन में प्रस्ताव दिया जा सकता है। पर, मानसून सत्र से पहले ही सरकार ने साफ कर दिया था कि वह लोकसभा में प्रस्ताव लाएगी। सरकार का मानना था कि लोकसभा के प्रस्ताव में दोनों पक्षों के दस्तखत के कारण उसे पक्षपातपूर्ण नहीं माना जा सकेगा।

सूत्रों के मुताबिक, राज्यसभा में प्रस्ताव पर विपक्ष ने पहले ही तय कर लिया था कि वे एनडीए को साथ नहीं रखेंगे। मंशा सरकार पर दबाव बनाने की थी। साथ ही, जस्टिस शेखर यादव के मुद्दे को भी जोड़ना चाहते थे, जिनके खिलाफ दिसंबर में दिए महाभियोग नोटिस पर अब तक निर्णय नहीं हुआ है। सरकार उनके प्रति नरम है।


विपक्ष के नोटिस के बाद भाजपा ने भी राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर लेने की कयावद शुरू की। इससे मकसद को लेकर भ्रम पैदा हो गया। इसलिए भाजपा सूत्रों ने धनखड़ के कदम को चौंकाने और भ्रमित करने वाला बताया।

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