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Tripura Violence: त्रिपुरा हिंसा मामले में एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट, पुलिस प्रशासन ने की एकतरफा कार्रवाई

Thu, 23 Dec 2021 08:28 PM IST
गौरव पाण्डेय डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Thu, 23 Dec 2021 08:28 PM IST
सार

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय पुलिस और एक राजनीतिक नेतृत्व की ओर से यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल नागरिक समाज और मीडिया को कुचलने के लिए किया जा रहा है।

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Editors Guild of India report in Tripura violence says Police and Administration took one sided actions all you need to know in Hindi
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

विस्तार

त्रिपुरा में पत्रकारों और मीडिया पर हो रहे हमले को लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कहा है कि त्रिपुरा पुलिस और राज्य सरकार ने बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने वालों के साथ कानून विरोधी रवैया अपनाया। अपनी रिपोर्ट में एडिटर्स गिल्ड ने दावा किया कि एक चुनी हुई राज्य सरकार सांप्रदायिक हिंसा और हिंदूवाद को बढ़ावा दे रही है। राज्य की मौजूदा सरकार और प्रशासन का रवैया मीडिया और पत्रकारों के प्रति ठीक नहीं है।  

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पड़ोसी देश बांग्लादेश में सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में अक्तूबर में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की ओर से त्रिपुरा के चामटिला में निकाली गई एक रैली के दौरान एक मस्जिद में कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई थी और दो दुकानों में आग लगा दी गई थी। राज्य पुलिस के अनुसार रोवा बाजार में कथित तौर पर मुसलमानों के स्वामित्व वाले मकानों और कुछ दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई। इस घटना के चलते त्रिपुरा पुलिस ने 102 सोशल मीडिया अकाउंट धारकों पर एफआईआर दर्ज की थी। इनमें कुछ पत्रकारों के अकाउंट भी शामिल थे।
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एडिटर्स गिल्ड ने तीन सदस्यीय टीम को भेजा था त्रिपुरा
स्वतंत्र पत्रकार, मीडिया और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं को राज्य में हो रही सांप्रदायिक हिंसा पर रिपोर्टिंग करने से रोकने और त्रिपुरा सरकार द्वारा परेशान करने की खबरें सामने आने के बाद एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने तीन सदस्यों की टीम त्रिपुरा भेजने का फैसला किया। इस टीम में स्वतंत्र पत्रकार भरत भूषण, गिल्ड के महासचिव संजय कपूर और 'इंफाल रिव्यू ऑफ आर्ट्स एंड पॉलिटिक्स' के संपादक प्रदीप फंजौबाम शामिल थे। इस टीम ने 28 नवंबर से 1 दिसंबर तक त्रिपुरा का दौरा किया और मीडिया की स्वतंत्रता की स्थिति का आकलन करने के लिए पत्रकारों, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सहित राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के साथ-साथ नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं से भी मुलाकात की।
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गिल्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि त्रिपुरा पुलिस और प्रशासन ने सांप्रदायिक संघर्ष से निपटने और इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने वालों के साथ नियम और कानून के मुताबिक व्यवहार नहीं किया है। पुलिस प्रशासन का ये व्यवहार एकतरफा लगता है। यही कारण है कि पुलिस और सत्तारूढ़ दल ट्वीट में एक षड्यंत्र देखते हैं और त्रिपुरा में सामाजिक अस्थिरता के जोखिम में पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हैं।

मीडिया को कुचलने के लिए हो रहा यूएपीए का इस्तेमाल
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि स्थानीय पुलिस और एक राजनीतिक नेतृत्व यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल नागरिक समाज और मीडिया को कुचलने के लिए कर रहा है। प्रदेश के हाईकोर्ट के वकीलों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर अपनी बात रखने के लिए जब संवाददाता सम्मेलन बुलाया तो उन्हें भी यूएपीए के तहत सरकार ने नोटिस जारी कर दिया। स्थानीय पुलिस ने 'त्रिपुरा जल रहा है' जैसा ट्वीट करने वालों के खिलाफ यूएपीए का इस्तेमाल किया। 


इसका एक अन्य कारण यह भी था कि वे दूसरों को राज्य में होने वाले घटनाओं के बारे में ट्वीट करने से रोकना चाहते थे। जबकि बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के खिलाफ विहिप और अन्य हिंदू संगठनों द्वारा आयोजित दो सौ से अधिक रैलियों, मस्जिदों में तोड़फोड़ और मुसलमानों के स्वामित्व वाली दुकानों को आग लगाने जैसी घटनाओं के बावजूद उन लोगों की तब तक कोई गिरफ्तारी नहीं की गई जब तक अदालतों ने उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया।

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