देश में हैं चार भूकंप क्षेत्र: राजधानी भी नहीं सुरक्षित, यहां की 80 फीसदी इमारतें नहीं सह सकतीं जमीन का कंपन
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देश में इस साल भूकंप के झटके कई बार महसूस किए गए। दिल्ली-एनसीआर में पिछले दो महीनों में करीब छह बार भूकंप के झटके महसूस किए गए। हालांकि भूकंप की तीव्रता बहुत तेज नहीं थी लेकिन कम अंतराल में भूकंप का बार-बार आना खतरनाक भी हो सकता है।
भूकंप के झटके सहने के लिए देश का कौन-सा इलाका सुरक्षित है या फिर कहां भूकंप से सबसे ज्यादा क्षति हो सकती है, ऐसे कई सवाल आपके मन में आते होंगे। आज इन्हीं सवालों के जवाब देने के लिए आइए भूकंप से संबंधित कुछ रोचक जानकारियां जान लेते हैं।
भारत में कितने भूकंपीय जोन हैं?
भारत में भूकंप की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे चार जोन में बांटा गया है, ये जोन हैं:
- सिस्मिक जोन 5
- सिस्मिक जोन 4
- सिस्मिक जोन 3
- सिस्मिक जोन 2
भूकंप के लिहाज से कई इलाके संवेदनशील इलाकों में आते हैं, इसमें सबसे ज्यादा खतरनाक सिस्मिक जोन 5 है, जहां आठ से नौ तीव्रता वाले भूकंप के आने की संभावना रहती है।
- सिस्मिक जोन 5 में देश का पूरा पूर्वोत्तर इलाका, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल के इलाके, गुजरात का कच्छ, उत्तर बिहार और अंडमान निकोबार द्वीप शामिल है।
- सिस्मिक जोन 4 भी खतरनाक श्रेणी में आता है, इसमें भूकंप की तीव्रता 7.9-आठ रहती है। इसमें दिल्ली, एनसीआर के इलाके, जम्मू कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के इलाके, यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल का उत्तरी इलाका, गुजरात का कुछ हिस्सा और पश्चिम तट से सटा महाराष्ट्र और राजस्थान का इलाका आता है।
- सिस्मिक जोन 3 मध्यम खतरनाक होता है, इसमें भूकंप की तीव्रता सात या उससे कम होती है। इसमें केरल, गोवा, लक्षदीप, यूपी, गुजरात और पश्चिम बंगाल के बचे हुए इलाके, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के इलाके आते हैं।
- सिस्मिक जोन 2 कम खतरनाक जोन माना जाता है, इसमें वो इलाके आते हैं जो सिस्मिक जोन 5, 4 और 3 शामिल नहीं हुए हैं। यहां 4.9 तीव्रता से ज्यादा का भूकंप आने का खतरा नहीं है।
भूकंप की तीव्रता को कैसे मापा जाता है?
भूकंप की तीव्रता मापने के दो विकल्प हैं, एक तो रिक्टर पैमाने के जरिए तीव्रता मापना और दूसरा मरकली पैमाना के जरिए। आइए समझते हैं दोनों तरीकों से भूकंप कैसे मापा जाता है:
रिक्टर पैमाना
रिक्टर पैमाने को परिमाण पैमाने के रूप में भी जाना जाता है। भूकंप के दौरान उत्पन्न ऊर्जा का मापा जाता है, जिसे 0-10 तक पूर्ण संख्या में बताया जाता है। हालांकि दो से कम और दस से ज्यादा रिक्टर तीव्रता के भूकंप का मापन सामान्य तौर पर संभव नहीं है।
मरकली पैमाना
मरकली पैमाने को तीव्रता पैमाने के रूप में भी जाना जाता है। इसके लिए घटना के कारण दिखाई देने वाले नुकसान का मापन किया जाता है। इस पैमाने में भूकंप की तीव्रता को एक से 12 के बीच में रखा जाता है।
भूकंपीय तीव्रता का निर्धारण कैसे किया जाता है?
- अतीत में आए भूकंप
- तनाव ऊर्जा बजट की गणना, महाद्वीपीय विस्थापन के धरातलीय प्लेटों के विरूपण के कारण पृथ्वी के आंतरिक भागों में संग्रहीत ऊर्जा को तनाव ऊर्जा कहा जाता है।
- सक्रिय भ्रंश की मैपिंग
भूकंप की तीव्रता मापने के पैमाने
माइक्रो श्रेणी
2.0 से कम तीव्रता वाले भूकंप इस श्रेणी में आते हैं। 2.0 से कम तीव्रता वाले भूकंप रिक्टर पैमाने पर प्रति दिन दुनियाभर में 9,000 दर्ज किए जाते हैं। रिक्टर पैमाने पर इन्हें माइक्रो श्रेणी में रखा जाता है और यह भूकंप महसूस नहीं किए जाते।
माइनर श्रेणी
2.0 से 2.9 तीव्रता वाले भूकंप इस श्रेणी में आते हैं। ऐसे 1,000 भूकंप प्रतिदिन आते हैं, इसे भी सामान्य तौर पर हम महसूस नहीं करते।
वेरी लाइट और लाइट श्रेणी
3.0 से 3.9 तीव्रता रिक्टर पैमाने वाले भूकंप इस श्रेणी में शामिल किए जाते हैं। एक अंदाज के अनुसार, हर साल रिक्टर पैमाने पर वेरी लाइट और लाइट श्रेणी के 55,000 से अधिक भूकंप दर्ज किए जाते हैं। इन्हें महसूस तो किया जाता है लेकिन शायद ही इनसे कोई नुकसान पहुंचता है।
लाइट श्रेणी
4.0 से 4.9 तीव्रता के भूकंप इस श्रेँणी में रखे जाते हैं। इसी तरह एक साल में 4.0 से 4.9 तीव्रता वाले 6,200 लाइट श्रेणी के भूकंप दुनियाभर में दर्ज किए जाते हैं। इन झटकों को महसूस किया जाता है और इनसे घर के सामान हिलते नजर आते हैं। हालांकि इनसे न के बराबर ही नुकसान होता है।
स्ट्रांग श्रेणी
स्ट्रांग श्रेणी के भूकंप जिनकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6.0 से 6.9 होती है, इनसे भारी तबाही होती है। जबरदस्त तीव्रता की वजह से भूकंप के केंद्र से लेकर 160 किमी तक आबादी वाले इलाकों में तबाही फैल जाती है। एक साल में ऐसे 120 भूकंप दुनियाभर के रेक्टर पैमाने पर दर्ज किए जाते हैं।
मेजर श्रेणी
इस श्रेणी में भूकंप की तीव्रता 7.0 से 7.9 होती है। ऐसे भूकंपों की संख्या साल भर में 18 होती है और इनसे काफी बड़े क्षेत्रों में गंभीर तबाही होती है।
दिल्ली की 80 फीसदी इमारतें तेज भूकंप सहन कर सकती हैं?
दिल्ली में पिछले दो-तीन महीनों में भूकंप के कई झटके महसूस किए गए हैं। हालांकि ये सभी झटके कम तीव्रता वाले थे लेकिन वैज्ञानिकों की ओर से तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली-एनसीआर की हर ऊंची इमारतें असुरक्षित नहीं है वल्नेबरिलिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ने यह रिपोर्ट तैयार की है।
इस रिपोर्ट को बिल्डिंग मटेरियल एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन काउंसिल ने प्रकाशित किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कहना गलत है कि दिल्ली की हर ऊंची इमारत भूकंप के कम तीव्रता के झटकों में दरक जाएगी। हालांकि, अपनी रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने चेताया भी है कि इन इमारतों का गलत तरीके से निर्माण इन्हें रेत में भी धंसा सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सिस्मिक जोन-4 में आने वाली राजधानी दिल्ली भूकंप के बड़े झटके से खासा प्रभावित हो सकती है। अगर यहां सात की तीव्रता वाला भूकंप आया तो दिल्ली की कई सारी इमारतें और घर रेत की तरह बिखर जाएंगे। इन इमारतों में निर्माण सामग्री ऐसी है, जो भूकंप के झटकों का सामना करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं है। दिल्ली में मकान बनाने की निर्माण सामग्री ही आफत की सबसे बड़ी वजह है।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र-दिल्ली में हाल ही में आए भूकंप के झटकों की श्रृंखला असामान्य नहीं है और इस क्षेत्र में मौजूद तनाव ऊर्जा की ओर संकेत करती है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त संस्थान है।
क्या भूकंप झेलने के दिल्ली तैयार है?
दिल्ली की 70-80 फीसदी इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज से डिजाइन ही नहीं की गई हैं। पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें पर बहुत ज्यादा चिंता की बात है क्योंकि अधिकांश के बनने के पहले मिट्टी की पकड़ की जांच नहीं हुई है।
दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या आबादी का घनत्व भी है। डेढ़ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में लाखों इमारतें दशकों पुरानी हो चुकी हैं और कई मोहल्ले एक दूसरे से सटे हुए बने हैं। केवल बड़ी इमारतें ही नहीं, यदि छोटी इमारतें भी दिल्ली जिस सिस्मिक जोन में आता है, उस हिसाब से नहीं बनी तो तेज झटकों में उसे डेमेज का खतरा बना रहेगा।
दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाके के पास भूगर्भ में फॉल्ट लाइन मौजूद हैं, जिसके चलते भविष्य में किसी बड़ी तीव्रता वाले भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। दिल्ली-एनसीआर में जमीन के नीचे मुख्यतया पांच लाइन दिल्ली-मुरादाबाद, दिल्ली-मथुरा, महेंद्रगढ़-देहरादून, दिल्ली सरगौधा रिज और दिल्ली-हरिद्वार रिज मौजूद है।
हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान के शोध के अनुसार प्राथमिक स्तर पर इन भूकंपों की एक वजह भूजल का गिरता स्तर भी है। क्योंकि भूजल को धरती के भीतर भार के रूप में देखा जाता है। यह लोड फाल्ट लाइनों के संतुलन को बरकरार रखने में मददगार होता है। भूजल के गिरते स्तर से फाल्ट लाइनों का लोड असंतुलित हो रहा है।
दिल्ली-एनसीआर में भूकंप के संभावित कारण
ऊर्जा का मुक्त होना
कमजोर क्षेत्रों या फॉल्ट के माध्यम से तनाव ऊर्जा का मुक्त होना, जो भारतीय प्लेट के उत्तर की और खिसकने तथा यूरेशियन प्लेट के साथ इसकी टक्कर के परिणामस्वरूप जमा होती है।
प्लेटों का खिसकना
हिमालय भूकंपीय बेल्ट, भारतीय तट यूरेशियन प्लेट से अभिसरण क्षेत्र में स्थित है। हिमालयी क्षेत्र में भूकंप मुख्यत: मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) और हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट (HFT) से बीच ही आते हैं। इन भूकंपों का कारण द्विध्रुवीय सतह पर प्लेटों का आपस में खिसकना है।
हिमालय से निकटता
दिल्ली-एनसीआर, उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व हिमालय बेल्ट जो भूकंपीय संभावित क्षेत्र पांच और चार से बहुत दूर स्थित नहीं है।
फॉल्ट और कगार
दिल्ली-एनसीआर में: Delhi-NCR में दिल्ली-हरिद्वार कगार, महेंद्र गढ़-देहरादून भ्रंश, मुरादाबाद भ्रंश, सोहना भ्रंश, ग्रेट बाउंड्री भ्रंश, दिल्ली-सरगोडा कगार, यमुना तथा यमुना गंगा नदी की दरार रेखाएँ जैसे कमजोर क्षेत्र और फॉल्ट स्थित है। इन कमजोर क्षेत्रों तथा भ्रंशों से आंतरिक तनाव ऊर्जा बाहर निकल सकती है और किसी बड़े भूकंप का कारण बन सकती है।
पूर्वाघात
किसी क्षेत्र में बड़े भूकंप के आने से पहले आने वाले कम तीव्रता के भूकंपों को पूर्वाघात के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हालांकि इस बात का स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है कि इन कम तीव्रता के भूकंपीय झटकों के बाद कोई बड़ा भूकंप आएगा लेकिन एक मजबूत भूकंप की संभावना को खारिज भी नहीं किया जा सकता है।
भूकंप का स्थान, किस साल में भूकंप आया और उस भूंकप की तीव्रता क्या रही:
| स्थान | वर्ष | भूकंप की तीव्रता |
| दिल्ली | 1720 | 6.5 |
| मथुरा | 1803 | 6.8 |
| मथुरा | 1842 | 5.5 |
| बुलंदशहर | 1956 | 6.7 |
| फरीदाबाद | 1960 | 6.0 |
| मुरादाबाद | 1966 | 5.8 |