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परेशान किसान: डीजल, बिजली, खाद और बीज के बेतहाशा बढ़े दाम, किसानों को 6000 रुपये की मदद से नहीं मिल रही राहत

Fri, 23 Jul 2021 07:39 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 23 Jul 2021 07:39 PM IST
सार

किसान प्रमोद त्यागी ने बताया कि गन्ना उनके क्षेत्र की प्रमुख फसल है। इस दौरान खेती की एक-एक चीज के दामों में भारी बढ़ोतरी हुई है, जबकि गन्ने की कीमत पिछले चार साल से नहीं बढ़ाई गई है। ऐसे में किसानों को भारी घाटा हो रहा है... 

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due to increase prices of Diesel, electricity, fertilizer and seeds, farmers are not getting relief with the help of Rs 6000 given by central government
किसान - फोटो : Amar Ujala (File)

विस्तार

केंद्र सरकार यह कहकर अपनी पीठ ठोकती है कि उसने किसानों को प्रति वर्ष 6000 रुपये वार्षिक आर्थिक सहायता पहुंचाई है। लेकिन उत्तर प्रदेश के किसानों को हर साल अकेले बिजली बिल के रूप में 11-12 हजार रुपये की जगह 18 हजार रुपये चुकाने पड़ रहे हैं, यानी केंद्र की पूरी सहायता तो बिजली कंपनियों की जेब में चली जाती है। जबकि इसी बीच किसानों को डीजल पर 22 रुपये प्रति लीटर ज्यादा, डाई पर 300 रुपये ज्यादा, मजदूरी में प्रति एकड़ 600 रुपये प्रति एकड़ ज्यादा चुकाने को मजबूर होना पड़ा है। इस दौरान फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में नाममात्र की बढ़ोतरी हुई है।

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गढ़मुक्तेश्वर के किसान प्रमोद त्यागी ने अमर उजाला को बताया कि गन्ना उनके क्षेत्र की प्रमुख फसल है। इस दौरान खेती की एक-एक चीज के दामों में भारी बढ़ोतरी हुई है, जबकि गन्ने की कीमत पिछले चार साल से नहीं बढ़ाई गई है। ऐसे में किसानों को भारी घाटा हो रहा है।  
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उत्तर प्रदेश के किसानों को देश में सबसे ज्यादा बिजली बिल का भुगतान करना पड़ता है। अब उत्तर प्रदेश का किसान न्यूनतम 7.5 हॉर्स पॉवर की बिजली मोटर इस्तेमाल कर सकता है। इसके लिए उसे 18 हजार रुपये प्रति वर्ष तक चुकाना पड़ रहा है, जबकि कुछ समय पहले यह कीमत केवल 11-12 हजार रुपये प्रति वर्ष हुआ करती थी। यानी किसानों के लिए बिजली कीमतों में 6000 रुपये तक वार्षिक बढ़ोतरी हुई है।  
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योगी आदित्याथ सरकार ने बिजली सप्लाई में सुधार किया है, लेकिन इसके बाद भी बिजली हमेशा नहीं रहती। सिंचाई और अन्य कार्यों के लिए किसानों को डीजल पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन पिछले डेढ़ साल में डीजल के मूल्य में 22 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।

आज दिल्ली में डीजल का प्रति लीटर मूल्य 89.87 रुपये हो चुका है, जबकि एक जनवरी 2020 को यह कीमत 67.96 रुपये प्रति लीटर थी। यानी डीजल की कीमतों में केवल डेढ़ साल के अंदर 22 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो चुकी है। 17 मई 2016 को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 63.02 रुपये थी। 29 मई 2018 को यह 78.43 रुपये प्रति लीटर हो गई। इस समय इसका मूल्य 101.84 रुपये प्रति लीटर हो चुकी है।

गन्ने के एक खेत में एक सीजन में लगभग 10 बार सिंचाई करनी पड़ती है। एक एकड़ के खेत में लगभग 10-12 घंटे मशीन चलाकर सिंचाई की जा सकती है। लेकिन अगर बिजली नहीं रहती तो यही काम डीजल इंजनों के जरिए किया जाता है जो गन्ना उत्पादन की कीमत बढ़ा देता है।

मजदूरी में प्रति एकड़ खर्च बढ़ा

इधर महंगाई के कारण मजदूरी में भी बढ़ोतरी हुई है। अब गन्ने के एक एकड़ का मजदूरी खर्च 900 रुपये से बढ़कर 1500 रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ चुका है। गन्ना की छिलाई 25 रुपये से बढ़कर 30-35 रुपये प्रति क्विंटल और पेराई भी बढ़ चुकी है।

यूरिया की कीमत तो 270 रुपये प्रति बोरी पर सीमित रही है, लेकिन महंगाई के कारण कंपनियों ने 50 किलो की बोरी का वजन घटाकर 45 किलो तक कर दिया है। इस तरह अप्रत्यक्ष तरीके से यूरिया की कीमत में भी बढ़ोतरी हुई है। डाई की कीमत 900 से बढ़कर 1400 रुपये और कीटनाशकों के मूल्य में भी भारी बढ़ोतरी हुई है।

गन्ना किसानों को प्रति क्विंटल 316 ररुपये खेत में तो गन्ना मिल तक ले जाने के बाद 324 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान मिल रहा है। इसमें पिछले चार साल से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। जबकि इसी बीच सिंचाई, बिजली, डीजल के कारण परिवहन की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। दुर्भाग्य यह है कि किसानों को यह मूल्य भी समय से नहीं मिल पाता। इसके लिए भी उसे कई-कई साल तक इंतजार करना पड़ जाता है। इससे किसानों में भारी नाराजगी है।

उत्पादन में भी बढ़ोतरी

हालांकि, इन नकारात्मक खबरों के बीच गन्ने के उत्पादन में वृद्धि से किसानों की लागत मूल्य कुछ कम हुई है। अब गन्ने की पैदावार प्रति एकड़ 250 क्विंटल से बढ़कर 350 क्विंटल तक पहुंच गई है। इससे किसानों को कुछ राहत मिली है। लेकिन अगर इसके साथ सरकार की कुछ मदद मिल जाती तो किसानों की जिंदगी खुशहाल हो सकती है।

गन्ना उत्पादन में भारत

वैश्विक स्तर पर गन्ना उत्पादन में भारत का स्थान ब्राजील के बाद दूसरे नंबर पर है। 2018-19 में गन्ने का उत्पादन 40.02 करोड़ टन रहा। कुल बुवाई क्षेत्रफल के 2.8 फीसदी में गन्ने का उत्पादन किया जाता है। देश में कुल 746 चीनी मिलें (सहकारी क्षेत्र में 324, सार्वजनिक क्षेत्र में 44 और निजी क्षेत्र में 378 चीनी मिलें) हैं। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की 77.3 प्रतिशत, सहकारी क्षेत्र की 31.8 फीसदी और निजी क्षेत्र की 21.2 फीसदी चीनी मिलें विभिन्न कारणों से बंद पड़ी हैं।

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