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जनता को कड़वी दवा पिलाने की प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति क्या इस बार होगी कामयाब या करेंगे बदलाव!

Fri, 19 Feb 2021 02:34 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 19 Feb 2021 02:34 PM IST
सार

  • किसान का मुद्दा हो या ईंधन तेल के दाम
  • कश्मीर में अनुच्छेद 370 , 35 ए को निष्प्रभावी बनाना हो या नोटबंदी, जीएसटी जैसे फैसले
  • लद्दाख में चीन की घुसपैठ हो या शाहीनबाग प्रदर्शन जैसे मसले

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Due to Farmers protest and hike of petrol diesel prices, will PM Modi will change his stretgy
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

26 मई 2014 को देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता को कड़वी दवा पिलाने से कभी नहीं घबराए। न उन्हें लोगों का विरोध प्रदर्शन डिगा सका और न रसोई गैस, ईंधन तेल के बढ़ते दाम जैसे कड़वे फैसले लेने से हिचके। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 80 दिन से अधिक समय से दिल्ली की सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों का सम्मान तो किया, लेकिन केन्द्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से अभी तक कोई समझौता नहीं किया। चाहे अचानक नोटबंदी लागू करना पड़ा हो या फिर जीएसटी लागू करने का फैसला, प्रधानमंत्री कभी नहीं हिचकिचाए। जनता को कई बार कडवी दवा पिलाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के ग्राफ पर कोई आंच नहीं आई।

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सियासी गलियारों में यह सवाल आम है कि क्या इस बार किसानों के मुद्दे पर भी मोदी की कडवी दवाई की रणनीति कामयाब हो सकेगी या अगर किसानों के आंदोलन से भाजपा को सियासी नुकसान होने लगेगा तो क्या प्रधानमंत्री अपनी रणनीति बदलेंगे। खासकर पंजाब के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों और उत्तर प्रदेश में अगले एक महीने बाद संभावित पंचायत चुनावों के मद्देनजर यह सवाल जोर पकड़ रहा है।

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ब्रेंट क्रूड ऑयल 63.57 डॉलर /बैरल और दिल्ली में 89.54 प्रति ली. पेट्रोल, लेकिन जनता खामोश

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, ब्रेंट क्रूड आयल का मूल्य 63.57 डॉलर प्रति बैरल है। इसके मुकाबले दिल्ली में डीजल का मूल्य 79.95 रुपये प्रति ली. है। जबकि पेट्रोल का मूल्य 89.54 प्रति लीटर है। राजस्थान के गंगा नगर में यह 100 रुपये प्रति लीटर को पार कर गया है। अभी तक पेट्रोल और डीजल का यह सबसे ज्यादा दाम है। लेकिन जनता की तरफ से महंगाई, तेल ईधन के बढ़ रहे दाम को लेकर कोई आवाज नहीं उठ रही है। विपक्ष लगातार इसे मुद्दा बना रहा है, लेकिन उसके मुद्दे जनता के बीच में अभी समर्थन पाते कम दिखाई दे रहे हैं।

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जबकि यूपीए सरकार के समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 110 डालर प्रति बैरल तक चली गई थी। इसके बाद भी दिल्ली में पेट्रोल का मूल्य 71 रुपये प्रति लीटर के करीब था। डीजल ने 68 रुपये के आंकड़े को पार ही नहीं किया था। रसोई गैस के मामले में भी यही स्थिति रही, लेकिन जनता के बीच में यह नाराजगी का बड़ा मुद्दा बनता नजर आया था।लेकिन अब किसान आंदोलन से पेट्रो पदार्थों की आसमान छूती कीमतों को जोड़कर सरकार पर दबाव बढ़ाने की रणनीति पर विपक्ष और किसान नेता दोनों ने काम शुरू कर दिया है। 

कांग्रेस कहती है पीएम तानाशाह हैं और दूसरे दल सीधा मोर्चा खोलने से से बचते हैंं?

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने बजट पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा हमला बोला। उन्होंने केन्द्र सरकार को हम दो (प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह), हमारे दो (उद्योगपति अंबानी, अडानी) की संज्ञा से नवाजा। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र के पद पर संभालने के बाद उन्होंने उनकी सरकार को सूट-बूट की सरकार की संज्ञा दी थी। लोकसभा चुनाव से पहले राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर प्रधानमंत्री पर चौकीदार चोर है का तंज कसा था।

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसी की नहीं सुनते, जनता का दर्द नहीं सुनते, विपक्ष की बात नहीं सुनते और मनमाने तरीके से फैसले करते हैं। कांग्रेस पार्टी के मीडिया विभाग के प्रभारी महासचिव रणदीप सुरजेवाला प्रधानमंत्री को तानाशाह कहने के साथ-साथ मोदी सरकार पर लगातार देश को गुमराह करने का आरोप लगाते हैं। कांग्रेस, राहुल गांधी, रणदीप सुरजेवाला के बाद प्रधानमंत्री पर सबसे तीखा हमला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बोल रही हैं। इसके अलावा भारतीय राजनीति में कोई भी राष्ट्रीय स्तर का नेता प्रधानमंत्री पर सीधा आरोप नहीं लगाता। न ही कोई केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से राजनीतिक तौर पर टकराता है।

चाल, चरित्र चेहरा और जनता की साख है प्रधानमंत्री की पूंजी

उधर भाजपा नेता कहते हैं कि देश की जनता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भरोसा करती है। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का थिंक टैंक कहे जाने वाले एक विचारक का कहना है कि लोकप्रियता के मामले में उन्होंने आजादी के बाद के सभी नेताओं को पीछे छोड़ दिया है। प्रधानमंत्री की दरवाजे-दरवाजे की छवि बनी है। यह छवि देर से बनती है और इसके टूटने में समय लगता है। इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री सरकार,पार्टी, आरएसएस और अनुषांगिक संगठन पर मजबूत पकड़ रखते हैं। अपने चेहरे पर राज्यों तथा लोकसभा का चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। राजनीति को समझने वाले इस नेता का कहना है कि पार्टी के भीतर और समान विचाराधारा के लोग प्रधानमंत्री का खुलकर विरोध नहीं कर पाते।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक अन्य पदाधिकारी भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर कामकाज के मामले में प्रधानमंत्री का सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण स्पष्ट है। उनकी सरकार लगातार उसके अनुरुप फैसले ले रही है। राम मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ हो गया, अनुच्छेद 370, 35 ए निष्क्रिय हो गए, केन्द्र सरकार तीन तलाक का कानून बनाया। नागरिकता संशोधन कानून बना।सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में प्रधानमंत्री को निचले, निम्न मध्यम वर्ग के तबके का ख्याल है। खाते में सीधे सब्सिडी,किसान सम्मान निधि, घर-घर में गैस चूल्हा, पीने के पानी के लिए नल से जल, घर-घर बिजली, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत योजना, शौचालय निर्माण जैसी योजनाओं को चलाकर प्रधानमंत्री  अपनी छवि को लगातार मजबूती दी है। संघ से जुड़े विचारक का कहना है कि इसके चलते अडानी-अंबानी की सरकार जैसे विपक्ष के तंज कितना चल पाएंगे यह कहना मुश्किल है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों की राय में देश की संप्रभुता, सुरक्षा के मामले में प्रधानमंत्री लगातार संवेदनशील रहते हैं। जनता के बीच में यही संदेश जाता है। वह इस बारे में विपरीत परिस्थिति में भी कुछ नहीं बोलते। एक संतुलन बनाकर रखते हैं और देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता की रक्षा के लिए मजबूत सरकार का संकल्प लेते नजर आते हैं।
 
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा सीधे किसी राजनीतिक दल से नहीं टकराते। इसके विपरीत विपक्ष सीधे प्रधानमंत्री पर निजी हमले बोल रहा है। संघ से जुड़े एक थिंक टैंक की राय है कि कमजोर विपक्ष का चेहरा राहुल गांधी हैं और वह प्रधानमंत्री पर निजी हमला बोलते हैं, लेकिन विरोध करने में संतुलन नहीं बना पा रहे हैं। इससे जनता में गलत संदेश जा रहा है। उसे लग रहा है कि जैसे कांग्रेस हार नहीं पचा पा रही है।

अमेरिकी राजनीति की तर्ज पर यह सीधा टकराव जनता को सरकार के कामकाज में परेशानी पैदा करने जैसी धारणा को मजबूती दे रहा है। इसके सामनांतर सत्ता पक्ष जनता के बीच बन रही इस धारणा को मजबूती देने में सफल हो जा रहा है। इसलिए हमेशा एक सवाल उठकर खड़ा हो जाता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में कौन? विपक्ष यहीं खत्म हो जाता है।

सबका साथ, सबका विश्वास की पूंजी लेकर परिस्थितियों को झेलने में संकोच नहीं करते पीएम

भाजपा के रणनीतिकारों का भी मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपनी सरकार को लेकर दिया गया नारा है-सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास। प्रधानमंत्री इस नारे के बूते केन्द्र सरकार के सामने खड़ी हो रही हर विपरीत परिस्थिति को झेलने में संकोच नहीं करते। चाहे पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम हों या देश में बढ़ती बेरोजगारी, दिल्ली की सीमा पर किसानों का तीनों कृषि कानून को लेकर प्रदर्शन, नागरिक संशोधन विधेयक को लेकर शाहीन बाग में प्रदर्शन, डोकलाम, लद्दाख में चीन के साथ तनातनी।



केन्द्र सरकार के एक वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री का कहना है कि 39 साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने  तमाम सरकारें देखी हैं, लेकिन दूरगामी रणनीति पर दृढ़ता के साथ चलने वाला प्रधानमंत्री नहीं देखा। उक्त मंत्री का कहना है कि दूरगामी दृष्टिकोण का अभाव विपक्ष की कमजोरी है और दूरदर्शिता के आधार पर रणनीति ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ताकत।

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