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Hijab Row: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हिजाब से न करें पगड़ी और कृपाण की तुलना, संविधान से मिली है अनुमति

Thu, 08 Sep 2022 07:11 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Thu, 08 Sep 2022 07:11 PM IST
सार

वकील ने जोर देकर कहा कि सिख छात्र भी पगड़ी पहनते हैं। इस पर न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि सिखों के साथ तुलना उचित नहीं हो सकती है क्योंकि कृपाण और पगड़ी संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है।

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Don't compare Turban, Kirpan with Hijab: SC
हिजाब विवाद - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को भी हिजाब मामले पर सुनवाई जारी रहा। इस दौरान अदालत ने कहा कि सिखों के कृपाण और पगड़ी की हिजाब से कोई तुलना नहीं है क्योंकि  सिखों के लिए पगड़ी और कृपाण पहनने की अनुमति है। न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखने वाले कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की। एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील निजामुद्दीन पाशा ने कृपाण और पगड़ी और हिजाब के बीच समानता लाने की कोशिश की।

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वकील की दलील, हिजाब मुस्लिम लड़कियों की धार्मिक प्रथा का हिस्सा
पाशा ने कहा कि हिजाब मुस्लिम लड़कियों की धार्मिक प्रथा का हिस्सा है और पूछा कि क्या लड़कियों को हिजाब पहनकर स्कूल आने से रोका जा सकता है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि सिख छात्र भी पगड़ी पहनते हैं। पाशा ने जोर देकर कहा कि सांस्कृतिक प्रथाओं की रक्षा की जानी चाहिए। इस पर न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि सिखों के साथ तुलना उचित नहीं हो सकती है क्योंकि कृपाण ले जाने को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है। इसलिए प्रथाओं की तुलना न करें। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि पगड़ी पर वैधानिक आवश्यकताएं बताई गई हैं और ये सभी प्रथाएं देश की संस्कृति में अच्छी तरह से स्थापित हैं।
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अदालत ने कहा, हम फ्रांस या ऑस्ट्रिया जैसा नहीं बनना चाहते
पाशा ने फ्रांस जैसे विदेशी देशों का उदाहरण देने की कोशिश की। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हम फ्रांस या ऑस्ट्रिया जैसा नहीं बनना चाहते। कोर्ट ने कहा कि हम भारतीय हैं और भारत में रहना चाहते हैं। पाशा ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि हिजाब मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा करता है। पाशा ने कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट के निष्कर्ष कि हिजाब एक सांस्कृतिक प्रथा है, धारणा पर आधारित है। उन्होंने अपने तर्कों का समर्थन करने के लिए विभिन्न धार्मिक पुस्तकों का हवाला दिया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह गलत व्याख्या है कि हाई कोर्ट ने माना कि हिजाब एक सिफारिश न कि आवश्यकता। 
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वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कहा कि हर धार्मिक प्रथा जरूरी नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है कि राज्य इसे प्रतिबंधित करता रहता है। सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश कामत ने अदालत को अवगत कराया कि हिजाब एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है या नहीं, इस पर कर्नाटक, केरल और मद्रास उच्च न्यायालय के फैसलों ने अलग-अलग विचार रखे। कामत ने कहा कि मद्रास और केरल की अदालतों ने हिजाब को एक आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में माना है, लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट अलग है। उन्होंने कहा कि कर्नाटक सरकार के शैक्षणिक संस्थानों में यूनिफॉर्म पर आदेश बिना दिमाग लगाए बिना दिया गया है। 

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