Axiom-4: पृथ्वी से आईएसएस की दूरी 403 किमी तो फिर पहुंचने में इतना समय क्यों, राह में कौन सी चुनौतियां, जानें
आईएसएस के साथ यान की डॉकिंग बहुत ही सटीक और जटिल प्रक्रिया है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (आईएसएस) की पृथ्वी से करीब 403 किमी की ऊंचाई पर है। आईएसएस 27,800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से धरती का चक्कर लगाता है। यानी आईएसएस 90 मिनट में धरती का एक चक्कर लगाता है।
विस्तार
पृथ्वी से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की दूरी करीब 403 किलोमीटर है लेकिन ड्रैगन यान को इस दूरी को तय करने के लिए करीब 28.5 घंटे लग जाएंगे। इतनी कम दूरी को तय करने में इतना समय इस वजह से लगेगा क्योंकि यान को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बचने और सही कक्षा में प्रवेश करने के लिए बहुत अधिक गति और ऊर्जा की आवश्यकता होगी और साथ ही आईएसएस के साथ यान की डॉकिंग बहुत ही सटीक और जटिल प्रक्रिया है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (आईएसएस) की पृथ्वी से करीब 403 किमी की ऊंचाई पर है। आईएसएस 27,800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से धरती का चक्कर लगाता है। यानी आईएसएस 90 मिनट में धरती का एक चक्कर लगाता है।
- अंतरिक्ष यान को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने और कक्षा में प्रवेश करने के लिए बहुत तेज गति से यात्रा करनी होती है।
- अंतरिक्ष यान को सही कक्षा में प्रवेश करने के लिए सटीक रूप से तैयारी करनी होती है और इसमें समय और ऊर्जा लगती है। प्रक्षेपण के बाद यान को मार्गदर्शन प्रणालियों का उपयोग कर अपने तय मार्ग पर बने रहना होता है। ये जटिल प्रक्रियाएं हैं।
- अंतरिक्ष यात्रियों और उपकरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यात्रा को सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध तरीके से अंजाम देना होता है।
ये आती हैं चुनौतियां
- लॉन्च के दौरान या रास्ते में अंतरिक्ष यान के सिस्टम में खराबी आ सकती है, जैसे इंजन की खराबी, ईंधन का रिसाव, या संचार प्रणाली में समस्या।
- आईएसएस तक पहुंचने के लिए सटीक नेविगेशन की आवश्यकता होती है। अगर अंतरिक्ष यान सही दिशा में नहीं है या अपनी गति को नियंत्रित नहीं कर पा रहा है, तो यह स्पेस स्टेशन से चूक सकता है।
- अंतरिक्ष में कम गुरुत्वाकर्षण के कारण अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे मांसपेशियों और हड्डियों में कमजोरी आ सकती है और चक्कर आना या उल्टी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
- अंतरिक्ष में उच्च स्तर का विकिरण होता है, जो अंतरिक्ष यात्रियों और अंतरिक्ष यान के लिए हानिकारक हो सकता है।
- अंतरिक्ष में छोटे-छोटे मलबे भी होते हैं, जो बहुत तेज गति से घूमते हैं। येे टुकड़े यान से टकराकर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
किले जैसा है आईएसएस
आईएसएस धरती की बाहरी कक्षा में बना एक किला जैसा है। 1984 में इसे बनाने की मंजूरी दी गई थी। 2 नवंबर 2000 को पहला दल आईएसएस के लिए रवाना हुआ था। 41 अंतरिक्ष चहलकमदी के जरिये आईएसएस की पूरी असेंबलिंग हुई। आईएसएस के हर हिस्से को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया और जोड़ा गया। पिछले 25 साल में 270 अंतरिक्ष यात्री यहां आ चुके हैं। आईएसएस का वजन 4,00,000 किलोग्राम से अधिक है। आईएसएस का कुल क्षेत्रफल 2,247 वर्ग मीटर है। इसके पैनल और अन्य ढांचे की लंबाई 109 मीटर है। यह एक जगह पर स्थिर नहीं है और पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है।
548 करोड़ भारत ने खर्च किए
भारत ने एक्सिओम-4 मिशन पर अब तक करीब 548 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसमें शुभांशु और उनके बैकअप ग्रुप कैप्टन प्रशांत नायर के प्रशिक्षण का खर्च भी शामिल है। ये पैसे प्रशिक्षण, उपकरण, और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में लगे हैं। यह मिशन गगनयान के लिए भारत के अभ्यास की तरह है।
पहला कोई भारतीय आईएसएस पहुंचेगा
भारत कभी भी आईएसएस का हिस्सा नहीं रहा है। यह पहली बार है जब कोई भारतीय वहां पहुंचेगा। एक्सिओम मिशन भविष्य में भारत के चार बड़े लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार होगा। ये हैं, वर्ष 2027 में पहला मानव मिशन गगनयान भेजना, 2035 तक अंतरिक्ष में अपना अंतरिक्ष केंद्र स्थापित करना और 2040 तक मानव चंद्रमा मिशन भेजना।
आज देख सकेंगे सीधा प्रसारण
नासा ने एक बयान में कहा कि अंतरिक्ष यान के आगमन का लाइव कवरेज बृहस्पतिवार, 26 जून को भारतीय समयानुसार दोपहर 2:30 बजे नासा प्लस पर देखा जा सकेगा। शुभांशु का यान अंतरिक्ष स्टेशन के हार्मोनी मॉड्यूल के अंतरिक्ष-मुखी पोर्ट पर भारतीय समयानुसार शाम 4:30 बजे स्वचालित रूप से डॉक करेगा।