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Hindi News ›   India News ›   Disillusionment in four years: BJP could not fulfill Mukul Roys hopes, these are the eight main reasons for Ghar Waps'

चार साल में मोह भंग: रॉय की उम्मीदें पूरी नहीं कर सकी भाजपा, 'घर वापसी' के ये हैं आठ प्रमुख कारण

Fri, 11 Jun 2021 08:43 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Fri, 11 Jun 2021 08:43 PM IST
सार

बंगाल में भाजपा का सत्ता में आने का सपना टूटते ही तृणमूल से पार्टी में आए नेताओं में स्वाभाविक मायूसी नजर आ रही थी। मुकुल रॉय की घर वापसी के रूप में यह प्रकट हुई है। 
 

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Disillusionment in four years: BJP could not fulfill Mukul Roys hopes, these are the eight main reasons for Ghar Waps'
टीएमसी में शामिल हुए मुकुल रॉय - फोटो : ANI

विस्तार

आखिर क्या वजहें रहीं कि बंगाल भाजपा के प्रमुख चेहरा रहे मुकुल रॉय ममता दीदी का दामन थामने को मजबूर हुए। क्या भाजपा उनकी सियासी उम्मीदें पूरी नहीं कर सकी? क्या तृणमूल में वापसी से उनका व दीदी का कद और बढ़ेगा? ऐसे तमाम सवाल हैं जो अब उठ रहे हैं। मोटे रूप में आठ कारण सामने आए हैं, जिन्हें रॉय के इस फैसले की वजह माना जा सकता है। 
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मुकुल रॉय करीब चार साल भाजपा में रहे। भाजपा ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक बनाया, लेकिन हालिया बंगाल चुनाव में वह भाजपा का सीएम चेहरा नहीं बन सके। वे प्रमुख नेताओं में तो रहे, लेकिन उन पर सुवेंदु अधिकारी भारी नजर आए। दीदी से मुकाबला भी सुवेंदु ने ही किया और टीएमसी प्रमुख को सीधे मुकाबले में हराया भी। भाजपा ने भी सुवेंदु को ज्यादा महत्व दिया और रॉय थोड़े हाशिये पर नजर आए। आठ प्रमुख कारण रहे, जिन्होंने रॉय को फिर दीदी से मिलवा दिया। 
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स्वाभिमान: रॉय के लिए स्वाभिमान बड़ा मुद्दा रहा। उन्होंने ममता बनर्जी के साथ ही कांग्रेस छोड़कर तृणमूल बनाई थी। वह टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के करीबी, भरोसेमंद व संगठन  के महारथी रहे। उनका कहना है कि भाजपा में उन्हें घुटन हो रही है। 
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भाजपा में नहीं मिली तवज्जो: 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें महत्व दिया। उनकी सलाह के दम पर ही भाजपा को 18 सीटों पर जीत मिली। किंतु 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्हें तवज्जो नहीं दी गई। हालांकि उन्हें इन चुनावों के पहले राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया, लेकिन उनकी सलाहें नहीं मानी गईं।

आंतरिक राजनीति : हालिया विधानसभा चुनाव में रॉय को कृष्ण नगर से मैदान में उतारा गया। यह कदम बंगाल भाजपा में आंतरिक राजनीति के कारण उठाया गया। उनका उपयोग संगठन में बेहतर ढंग से करने के बजाए साधारण नेता के तौर पर मैदान में उतार दिया गया। 

सुवेंदु अधिकारी बनाम मुकुल रॉय: मुकुल रॉय सुवेंदु अधिकारी से वरिष्ठ नेता हैं। भाजपा में भी वह पहले आए थे। इसके बावजूद उनके बजाया जब सुवेंदु को महत्व मिलने लगा तो रॉय का खिन्न होना स्वाभाविक था। रॉय ने पूरे देश से भाजपा नेताओं को बंगाल में बुलाने और ममता बनर्जी पर निजी हमले नहीं करने की सलाह दी थी, जिसे नहीं माना गया। 

बीमारी के वक्त नहीं पूछा: मुकुल रॉय की पत्नी हाल ही में बीमार हुईं तो भाजपा के किसी नेता ने उनका हालचाल नहीं जाना। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के महासचिव व ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी खुद अस्पताल पहुंचे। हालांकि पीएम मोदी ने रॉय की नाराजगी व चुप्पी को भांप लिया था और खुद फोन कर 10 मिनट तक बात की थी, लेकिन वह नहीं पिघले। 

ममता का सम्मान करते रहे : मुकुल रॉय भाजपा में रह कर भी कभी ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं बोले। उन्होंने टीएमसी प्रमुख पर कोई निजी हमला नहीं किया। राजनीतिक बयान दिए, लेकिन ममता को ठेस नहीं पहुंचे इसका हमेशा ध्यान रखा।  भाजपा को दीदी का अनादर नहीं करने को कहा, लेकिन पार्टी नेता नहीं माने।

विपक्ष का नेता नहीं बनाया: बंगाल चुनाव में भाजपा की हार के बाद जब विधानसभा में विपक्ष का नेता बनने की बारी आई तो भी मुकुल रॉय की बजाए सुवेंदु अधिकारी को मौका दिया गया। इसके बाद से तो वे मौन धारण कर चुके थे। 

राज्यसभा में मिलेगी सीट : माना जा रहा है कि रॉय को तृणमूल राज्यसभा में भेज सकती है। दिनेश त्रिवेदी की रिक्त हुई सीट पर टीएमसी उन्हें उच्च सदन में भेज सकती है। 
 
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