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ब्रिटिश काल में होने वाली असहमति की तुलना वर्तमान लोकतांत्रिक शासन से नहीं कर सकते : सुप्रीम कोर्ट

Thu, 08 Oct 2020 03:28 AM IST
Jeet Kumar राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Thu, 08 Oct 2020 03:28 AM IST
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Disagreements in the British time can not be compared with the current democratic regime, says supreme court on Shaheen Bagh protest
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ब्रिटिश काल में होने वाली असहमति की तुलना हमारे द्वारा बनाए गए लोकतांत्रिक शासन के साथ नहीं की जा सकती। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रदर्शन करने का अधिकार असीम नहीं है, उसमें मुनासिब पाबंदी शामिल है।

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शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में 100 दिन तक सड़क पर चले धरने की वैधता पर फैसला सुनाते समय की।
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जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि हम सभी जानते हैं भारत में विरोध प्रदर्शन की नींव हमारे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पड़ी थी। उस वक्त इसका आधार मजबूत था, जिसकी बदौलत हमें जनतंत्र मिलना संभव हो सका। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि पुराने तरीके व औपनिवेशिक शासन के खिलाफ असंतोष जताने के तरीके की तुलना एक स्वयंभू लोकतंत्र में जताए जाने वाले असंतोष के साथ नहीं की जा सकती।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारी सांविधानिक योजना के तहत हमें विरोध और असंतोष जताने का अधिकार मिला है। लेकिन ये अधिकार कुछ मौलिक कर्तव्यों के प्रति दायित्व के साथ मिला है।

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत हमें बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है और अनुच्छेद 19 (1) (बी) के तहत हथियारों के बिना शांति से इकट्ठा होने का अधिकार मिला है।

इन अधिकारों के तहत हर नागरिक को राज्य की किसी कार्रवाई या उदासीनता के खिलाफ शांतिपूर्वक इकट्ठा होने और विरोध करने का अधिकार है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राज्य को इन अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। लेकिन ये अधिकार असीम नहीं हैं, बल्कि इनमें मुनासिब पाबंदी भी है और यह देश की संप्रभुता और एकता के हित में है।

देर आया पर दुरुस्त आया सुप्रीम कोर्ट
शाहीन बाग मामले में सुप्रीम कोर्ट देर आया पर दुरुस्त आया। भले ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश आने से पहले ही सीएए के विरोध में  शाहीन बाग में शुरू हुआ धरना खत्म हो गया।

शीर्ष अदालत के आदेश से यह तो साफ हो गया कि लोगों को शांतिपूर्वक जुटने व विरोध करने का अधिकार है। लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया कि प्रदर्शन के नाम पर किसी सार्वजनिक स्थल पर अनिश्चित काल के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता।

विरोध-प्रदर्शनों पर कार्रवाई के लिए नजीर बनेगा फैसला
शाहीन बाग में प्रदर्शन गत दिसंबर में शुरू हुआ था। इससे आम लोगों को हो रही परेशानी के मद्देनजर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई थी।

जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने मध्यस्थों के जरिये प्रदर्शनकारियों को समझकर प्रदर्शन दूसरी जगह शिफ्ट कराने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास असफल रहा था।

हालांकि इसके कुछ दिन बाद कोरोना महामारी के कारण यह धरना खुद ही समाप्त हो गया। लेकिन इस मामले में अब आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश से देश में आंदोलनों और प्रदर्शनों को लेकर बहुत सारी स्थितियां स्पष्ट होने की उम्मीद है और आगे ऐसी परिस्थितियों के लिए यह फैसला नजीर का काम करेगा।

शाहीन बाग में पुलिस चाहती तो खुल सकता था रास्ता

शाहीन बाग में करीब 100 दिन चले प्रदर्शन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक फैसले में कहा कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर रास्ता रोककर प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है। इस मामले पर अमर उजाला ने मुस्लिम धर्मगुरु व फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुफ्ती मुकर्रम से बातचीत की। 

मुफ्ती मुकर्रम ने कहा कि कोई भी कानून बनाने से पहले यदि सरकार जनता का विश्वास जीत ले तो ऐसे प्रदर्शनों की नौबत ही नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि अक्सर यह देखा गया कि कोई भी कानून आम जनता पर थोप दिए जाते हैं, लेकिन राजनीतिक शरण पाए लोग उनका फायदा उठाकर कानून का मजाक उड़ाते हैं। सीएए और एनआरसी के विरोध के दौरान इस तरह की मिसाल सामने आई। उन्होंने कहा कि रास्ता रोककर या किसी को तकलीफ पहुंचाकर कोई प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ठीक फैसला दिया है। 

लेकिन सरकार यह सुनिश्चित करे कि कानून का पालन सब करें। जहां तक शाहीन बाग की बात है तो पुलिस चाहती तो सड़क पर एक साइड से ट्रैफिक को चलाया जा सकता था। लेकिन पुलिस ने जानबूझकर रास्ता नहीं खुलवाया। पुलिस बस रास्ता खुलवाने का दिखावा करती रही। जहां तक सीएए और एनआरसी के विरोध की बात है तो लोगों को इस कानून का विरोध करने का अधिकार है। लेकिन लोग अपने प्रदर्शन ऐसे करें कि उससे लोगों को दिक्कत न हो। यदि कोर्ट कहता है कि निर्धारित जगहों पर ही प्रदर्शन किए जाएं तो सरकार को ऐसे स्थानों की संख्या बढ़ाना चाहिए। 

चंद लोगों की वजह से हुई परेशानी 
शाहीन बाग जामा मस्जिद के इमाम मौलाना कासमी ने कहा कि धरना-प्रदर्शन के दौरान ही इलाके के करीब 80 फीसदी लोग सड़क को खाली कर अपना धरना दूसरे स्थान पर शिफ्ट करने के हक में थे। लेकिन चंद लोगों की वजह से पूरे एक बहुत बड़ी आबादी को परेशानी हुई।
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