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बेटियों के लिए घड़ियाली आंसू बहाना बंद करें, हमारे समाज का यही है घिनौना सच

Sun, 11 Oct 2020 10:51 AM IST
अमित कुमार अमित कुमार, नई दिल्ली
अमित कुमार, नई दिल्ली Published by: अमित कुमार Updated Sun, 11 Oct 2020 10:51 AM IST
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Dhoni 5 year daughter Ziva get sexual assault threats after loses of Chennai Super Kings in IPL, It shows the bitter truth of our society
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock

जीवा। जब तुम दुनिया में आने वाली थी, तो तुम्हारे डैडी विश्व कप में देश के लिए खेल रहे थे। और उन्होंने तुम्हारा प्यारा सा चेहरा देखने के लिए इंतजार करना सिर्फ इसलिए बेहतर समझा क्योंकि वो उस टाइम नेशनल ड्यूटी कर रहे थे।

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मगर उससे क्या फर्क पड़ता है? क्या फर्क पड़ता है कि तुम्हारे प्यारे से पापा ने देश को एक नहीं बल्कि दो-दो प्रारूपों में विश्व विजेता बनाया। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिनके कंधे पर चढ़ी तुम खेलती रहती हो, उनके नेतृत्व में भारतीय टीम टेस्ट क्रिकेट में नंबर एक बनी। वही भारतीय टीम जिसे अपना पहला टेस्ट मैच जीतने के लिए 20 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। 
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आज महज कुछ मैच में अच्छा न कर पाने की वजह से तुम्हें जो कुछ कहा गया, उसके पीछे की कुंठित मानसिकता या उन शब्दों के घिनौनेपन को समझने के लिए अभी तुम काफी छोटी हो। इतनी कम उम्र में ही हमारे समाज का घिनौनापन तुम्हारे सामने आ गया। इसके लिए हम सब शर्मिंदा हैं। सॉरी जीवा। 
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आईपीएल में धोनी की टीम के खराब प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर जीवा के बारे में जो कुछ कहा गया, उसका जिक्र करते हुए भी शर्म आने लगती है। बार-बार यही सवाल मन में उठता है, क्या हम इसी समाज का हिस्सा हैं? क्या सच में हम खुद को इंसान कहलाने लायक हैं? यूं तो कहा जाता है कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। हमने बहुत तरक्की कर ली है। लेकिन सच तो यह है कि हमारे भीतर की पशुता किसी मायने में कम नहीं हुई है। शायद इसे पशुता कहना भी पशुओं का अपमान होगा।

कभी निर्भया कभी हाथरस तो कभी कठुआ। ऐसी घटनाओं को लेकर हम अक्सर गुस्से से भर जाते हैं। सोशल मीडिया पर लंबी चौड़ी पोस्ट लिखते हैं। मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर निकलते हैं। प्रदर्शन करते हैं। 

लेकिन क्या हमें ये घड़ियाली आंसू बहाने का कोई हक है? 

हमारे समाज की हकीकत यही है। बाहर से हम कितने ही सभ्य बनने की कोशिश करें, लेकिन भीतर से हमारी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। वो बरसों से सड़ रही है, जिसमें से रह-रहकर इतनी बदबू आने लगती है, जिससे सांस लेना तक दूभर हो जाता है। 

एक और सवाल 

क्या दुष्कर्म के मामले सिर्फ यौन कुंठा का परिणाम है? बीते आठ साल में करीब 3 लाख दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए। इनमें से क्या सभी के पीछे यही एक कारण था?

दरअसल हमारा पुरुषवादी दंभ अभी तक बरकरार है। तभी तो परिवार की कथित इज्जत बचाए रखने के लिए अक्सर बेटियों को ही बलि चढ़ा दिया जाता है। या फिर कभी किसी को उसकी जाति याद दिलाने के लिए बेटियों के साथ दुष्कर्म किया जाता है।  विराट के हारने का दोष अनुष्का पर मढ़ दिया जाता है। या फिर किसी सफल महिला को ये समाज तुरंत 'चरित्र प्रमाणपत्र'  दे देता है। यही नहीं जो चीजें पुरुष खुद करता है, वही सब किसी महिला के करने पर उसे क्या कहा जाता है, ये बताने की भी जरूरत नहीं है।

हम इन पर सवाल कैसे उठा सकते हैं? जरा सोचिए किसी से थोड़ी सी बहस होने पर हमारे मुंह से जो गालियां निकलती हैं, उनमें भी मां-बहनों को ही निशाना बनाया जाता है। जिस समाज में दो पुरुषों की लड़ाई में हो रहे गाली-गलौच में भी उन महिलाओं को ही निशाने पर लिया जाता है, जिनका कोई कसूर नहीं होता, उस संकीर्ण सोच वाले समाज से क्या ही उम्मीद की जा सकती है। 

क्या ऐसे समाज का हिस्सा रहते हुए हम किसी तरह के बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं? क्या हम अपनी सोच में बदलाव करने के लिए तैयार हैं? क्या हमें सच में हाथरस, कठुआ या निर्भया जैसी घटनाओं से कोई फर्क पड़ता है? अगर ऐसे सवालों का जवाब हमारे पास नहीं है, तो हमें घड़ियाली आंसू बहाना बंद कर देना चाहिए। और स्वीकार कर लेना चाहिए हमारे समाज के घिनौने सच को। 

हमारे सोशल मीडिया पेजों के माध्यम से आप भी इस पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं।
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