{"_id":"68d3df42e1a0b1855a02dc76","slug":"dense-forest-ration-supply-in-knee-deep-mud-movement-through-swollen-rivers-read-the-story-of-crpf-warriors-2025-09-24","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"CRPF: घना जंगल... घुटनों तक कीचड़ में राशन सप्लाई, उफनती नदियों से आवाजाही; पढ़ें सीआरपीएफ जांबाजों की कहानी","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
CRPF: घना जंगल... घुटनों तक कीचड़ में राशन सप्लाई, उफनती नदियों से आवाजाही; पढ़ें सीआरपीएफ जांबाजों की कहानी
सार
नक्सलवाद से प्रभावित अधिकांश इलाकों में सीआरपीएफ और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा', तेज गति से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित कर रही है। इसमें सीआरपीएफ जवान कई दिक्कतों का सामना भी कर रहे हैं, लेकिन अपने लक्ष्य पर अडिग हैं। पढ़िए सीआरपीएफ जांबाजों की कहानी...।
विज्ञापन
सड़क बनाते सीआरपीएफ के जवान।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की वह घोषणा कि '31 मार्च 2026' से पहले देश के सभी हिस्सों से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा, इस टारगेट को हासिल करने में सीआरपीएफ व दूसरे बल, जुट गए हैं। नक्सलवाद से प्रभावित अधिकांश इलाकों में सीआरपीएफ और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा', तेज गति से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित कर रही है।
घने जंगल में नक्सली हमले का खतरा, बरसात में घुटनों तक कीचड़ में राशन सप्लाई, उफनती नदियों के बीच आवाजाही, कटी हुई सड़कें और टपकते टैंट एवं पोटा कैबिन, सीआरपीएफ के जांबाज इन तमाम दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, मगर वे अपने लक्ष्य की राह पर जरा भी टस से मस नहीं होते। उनके जोश में कोई भी कमी नहीं आती। प्राकृतिक बाधाओं के चलते भले ही राशन सप्लाई में देरी हो जाए, लेकिन जवान '31 मार्च 2026' की डेड लाइन नहीं भूलते। उत्साह के साथ वे नए एफओबी स्थापित कर रहे हैं।
विज्ञापन
विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, एक एफओबी तैयार करने में वैसे तो कई सप्ताह लग जाते हैं, लेकिन मौजूदा समय में दो दिन के भीतर एफओबी को तैयार किया जा रहा है। इसका कारण, नक्सलियों के खात्मे की डेड लाइन करीब आ रही है। ऐसे में सुरक्षा बलों पर नए एफओबी शुरु करने का भारी दबाव है। 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित करना आसान नहीं है। वजह, उस क्षेत्र में सड़क तक नहीं होती।
चारों तरफ तय एसओपी के तहत फोर्स लगाकर नए शिविर का काम शुरु होता है। लंबे समय तक ग्राउंड कमांडर व जवानों को रहने के लिए आरामदायक जगह तक नहीं मिल पाती। नक्सलियों द्वारा घात लगाकर हमला, आईईडी लगाना और बैरल ग्रेनेड लॉन्चर (बीजीएल) से अटैक, यह जोखिम तो हमेशा ही बना रहता है।
एफओबी को कच्चे पक्के तरीके से स्थापित करने में दो तीन दिन लगते हैं। भले ही जवानों को टैंट या कच्चे में रहना पड़े, मगर वे आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। जब एक जगह पर एफओबी तैयार हो जाता है तो उसके 30 दिन बाद ही नए कैंप का ले आउट प्लान तैयार हो जाता है। छत्तीसगढ़ में कई क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां महीनों बीतने के बाद भी एफओबी पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है।
सीआरपीएफ द्वारा जहां पर कैंप स्थापित किया जाता है, उससे पहले वहां कोई नहीं होता। लोकल मशीनरी और पुलिस, सीआरपीएफ के साथ ही कैंप साइट पर पहुंचती है। सबसे पहले जंगल के कुछ हिस्से को साफ कर कैंप के लिए उपयुक्त जगह तैयार की जाती है। कैंप तक पहुंचने वाले रूट को कई किलोमीटर तक सेनेटाइज कर दिया जाता है। इसके बाद ही जेसीबी अपना काम शुरु करती है।
विज्ञापन
घने जंगल में नक्सली हमले का खतरा, बरसात में घुटनों तक कीचड़ में राशन सप्लाई, उफनती नदियों के बीच आवाजाही, कटी हुई सड़कें और टपकते टैंट एवं पोटा कैबिन, सीआरपीएफ के जांबाज इन तमाम दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, मगर वे अपने लक्ष्य की राह पर जरा भी टस से मस नहीं होते। उनके जोश में कोई भी कमी नहीं आती। प्राकृतिक बाधाओं के चलते भले ही राशन सप्लाई में देरी हो जाए, लेकिन जवान '31 मार्च 2026' की डेड लाइन नहीं भूलते। उत्साह के साथ वे नए एफओबी स्थापित कर रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, एक एफओबी तैयार करने में वैसे तो कई सप्ताह लग जाते हैं, लेकिन मौजूदा समय में दो दिन के भीतर एफओबी को तैयार किया जा रहा है। इसका कारण, नक्सलियों के खात्मे की डेड लाइन करीब आ रही है। ऐसे में सुरक्षा बलों पर नए एफओबी शुरु करने का भारी दबाव है। 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित करना आसान नहीं है। वजह, उस क्षेत्र में सड़क तक नहीं होती।
चारों तरफ तय एसओपी के तहत फोर्स लगाकर नए शिविर का काम शुरु होता है। लंबे समय तक ग्राउंड कमांडर व जवानों को रहने के लिए आरामदायक जगह तक नहीं मिल पाती। नक्सलियों द्वारा घात लगाकर हमला, आईईडी लगाना और बैरल ग्रेनेड लॉन्चर (बीजीएल) से अटैक, यह जोखिम तो हमेशा ही बना रहता है।
एफओबी को कच्चे पक्के तरीके से स्थापित करने में दो तीन दिन लगते हैं। भले ही जवानों को टैंट या कच्चे में रहना पड़े, मगर वे आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। जब एक जगह पर एफओबी तैयार हो जाता है तो उसके 30 दिन बाद ही नए कैंप का ले आउट प्लान तैयार हो जाता है। छत्तीसगढ़ में कई क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां महीनों बीतने के बाद भी एफओबी पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है।
सीआरपीएफ द्वारा जहां पर कैंप स्थापित किया जाता है, उससे पहले वहां कोई नहीं होता। लोकल मशीनरी और पुलिस, सीआरपीएफ के साथ ही कैंप साइट पर पहुंचती है। सबसे पहले जंगल के कुछ हिस्से को साफ कर कैंप के लिए उपयुक्त जगह तैयार की जाती है। कैंप तक पहुंचने वाले रूट को कई किलोमीटर तक सेनेटाइज कर दिया जाता है। इसके बाद ही जेसीबी अपना काम शुरु करती है।
कैंप के चारों तरफ कई फुट चौड़ी खाई खोदी जाती है। उसके बाद कंटीली तार लगाते हैं। अगर मौसम खराब है तो भी जवान इस काम को तय समय सीमा में ही पूरा करते हैं। दूसरा चरण टैंट लगाने का होता है। कुछ दिनों बाद पोटा केबिन बनते हैं। नक्सलियों के चलते आसपास की सड़कें पहले से ही क्षतिग्रस्त रहती हैं, ऐसे में जरुरत का सामान भी सीआरपीएफ व दूसरे सुरक्षा बलों के जवान ही कैंप तक ले जाते हैं।
बरसात में राशन, डीजल या गैस सिलेंडर, कई फुट पानी और दलदल में मैस तक यह सप्लाई जवानों द्वारा ही की जाती है। 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' तैयार होने के दौरान, सीआरपीएफ अधिकारी और जवान, ग्रामीणों का हाल जानने के लिए उनके पास पहुंचते हैं। उन्हें जरुरत का सामान मुहैया कराते हैं।
इस बीच जवानों को आवश्यक कार्य से छुट्टी जाना पड़े तो संसाधनों के अभाव में उन्हें अपनी लीव आगे बढ़ानी पड़ती है। वजह, सड़कें टूटी हुई होती हैं या नक्सलियों द्वारा उन्हें बीच से काट दिया जाता है। ऐसे में वहां से गाड़ी या बाइक नहीं गुजर सकती। जवानों को अपनी राशन सप्लाई के लिए खुद ही सड़क को ठीक करना पड़ता है।
एफओबी के चक्रव्यूह में फंसकर नक्सली मारे जा रहे हैं। नक्सलियों के गढ़ में अभी तक लगभग 300 से ज्यादा 'एफओबी' स्थापित किए जा चुके हैं। 2024 में 58 नए कैंप स्थापित हुए थे। इस वर्ष 100 नए एफओबी स्थापित करने पर काम शुरु हो हुआ था। ये कैंप नक्सल के किले को ढहाने में आखिरी किल साबित हो रहे हैं। जिस तेजी से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित हो रहे हैं, उससे यह बात साफ है कि तय अवधि से पहले ही नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा।
बरसात में राशन, डीजल या गैस सिलेंडर, कई फुट पानी और दलदल में मैस तक यह सप्लाई जवानों द्वारा ही की जाती है। 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' तैयार होने के दौरान, सीआरपीएफ अधिकारी और जवान, ग्रामीणों का हाल जानने के लिए उनके पास पहुंचते हैं। उन्हें जरुरत का सामान मुहैया कराते हैं।
इस बीच जवानों को आवश्यक कार्य से छुट्टी जाना पड़े तो संसाधनों के अभाव में उन्हें अपनी लीव आगे बढ़ानी पड़ती है। वजह, सड़कें टूटी हुई होती हैं या नक्सलियों द्वारा उन्हें बीच से काट दिया जाता है। ऐसे में वहां से गाड़ी या बाइक नहीं गुजर सकती। जवानों को अपनी राशन सप्लाई के लिए खुद ही सड़क को ठीक करना पड़ता है।
एफओबी के चक्रव्यूह में फंसकर नक्सली मारे जा रहे हैं। नक्सलियों के गढ़ में अभी तक लगभग 300 से ज्यादा 'एफओबी' स्थापित किए जा चुके हैं। 2024 में 58 नए कैंप स्थापित हुए थे। इस वर्ष 100 नए एफओबी स्थापित करने पर काम शुरु हो हुआ था। ये कैंप नक्सल के किले को ढहाने में आखिरी किल साबित हो रहे हैं। जिस तेजी से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित हो रहे हैं, उससे यह बात साफ है कि तय अवधि से पहले ही नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा।