केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'पुरानी पेंशन बहाली' को लेकर उठी मांग, सरहदों के चौकीदारों को नहीं मिला 'एक्समैन' का दर्जा
कॉन्फेडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वैलफेयर एसोसिएशन द्वारा बुधवार को इन बलों की मांगों के प्रति केंद्र सरकार का ध्यान खींचने के लिए ट्विटर पर 'पुरानी पेंशन बहाल करो' हैशटेग से अभियान चलाया गया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
देश में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए 'पुरानी पेंशन बहाली' की मांग अब जोर पकड़ती जा रही है। बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और सीआईएसएफ जैसे केंद्रीय सुरक्षा बलों में वेतन भत्तों को लेकर जवान खुश नहीं हैं। न तो जवानों की पुरानी पेंशन बहाल की गई है और न ही इनको एक्समैन का दर्जा मिला। इतना ही नहीं सीपीसी कैंटीन को जीएसटी छूट तक नहीं दी जा रही। इससे जवान बेहद निराश और नाराज हैं।
कॉन्फेडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वैलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं कि सेना के मुकाबले इन बलों को बहुत सी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। इन बलों के वे जवान जो देश के लिए अपना बलिदान देते हैं, उन्हें सरकार 'शहीद' का दर्जा देना सही नहीं समझती। इनकी ड्यूटी में आतंकवाद, नक्सलवाद, कोरोना, चुनाव, दंगा फसाद, सरहदों की चौकीदारी, प्राकृतिक आपदा, वीआईपी सुरक्षा और तैनाती वाले इलाकों में सामाजिक कार्य ये सब शामिल हैं। इसके बावजूद इन बलों को पुरानी पेंशन व्यवस्था से बाहर कर दिया गया। दूसरी तरफ भारतीय सेना में पेंशन मिल रही है। वहां वन रैंक वन पैंशन भी मिल रही है। सरकार को समझना चाहिए कि सेना एक बड़े भाई की तरह हैं, लेकिन जोखिम उठाने और बलिदान देने में अर्धसैनिक बल कहीं भी पीछे नहीं है। पुरानी पेंशन के अलावा इन बलों के जवानों को एक्समैन का दर्जा तक नहीं मिला।
विभिन्न स्तरों पर लगाई अर्जी, नहीं हुई सुनवाई
कॉन्फेडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वैलफेयर एसोसिएशन द्वारा बुधवार को इन बलों की मांगों के प्रति केंद्र सरकार का ध्यान खींचने के लिए ट्विटर पर 'पुरानी पेंशन बहाल करो' हैशटेग से अभियान चलाया गया। इस अभियान में केंद्रीय बलों के जवानों के लाखों परिजनों और दूसरे विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया।
एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह ने कहा कि दरअसल केंद्र सरकार जानबूझकर इन बलों की समस्याओं का निदान नहीं करना चाहती। पिछले कई वर्षों से केंद्र सरकार में दर्जनों ज्ञापन दिए जा चुके हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और दूसरे कई नौकरशाहों से मुलाकात कर उनके समक्ष केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की समस्याओं को रखा गया है।
सरकार से मांग की कि अर्द्धसैनिक बलों के लाखों कर्मियों को सेना की तर्ज पर पेंशन का लाभ प्रदान किया जाए। इन बलों में 2004 से पुरानी पेंशन व्यवस्था बंद कर दी गई है। सशस्त्र बलों के जवानों की कुल संख्या 11 लाख से अधिक है। दूसरी तरफ तीनों सेनाओं की नफरी भी करीब 13 लाख है। केंद्र सरकार द्वारा हर बार ज्ञापन ले लिया जाता है, लेकिन इन बलों की मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी।
नई अंशदायी पेंशन योजना: सशस्त्र बलों के लिए नहीं
केंद्र ने एक जनवरी 2004 से नई अंशदायी पेंशन योजना की शुरुआत की थी। इस बाबत 22 दिसंबर, 2003 को जारी एक अधिसूचना के माध्यम से पेंशन योजना को भागीदारी वाला बना दिया गया। इसमें कर्मचारी के वेतन से ही एक हिस्सा कटता है। सरकार ने कहा कि गृह मंत्रालय के तहत आने वाले और एक जनवरी 2004 के बाद सेवा में आए सशस्त्र बलों के कर्मियों के लिए हाइब्रिड पेंशन योजना लागू की जा रही है, जो पुरानी और नई पेंशन योजना का मिश्रण है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर कहा गया कि यह नई अंशदायी पेंशन योजना भारत सरकार के सशस्त्र बलों पर लागू नहीं होती है। गृह मंत्रालय के तहत आने वाले सशस्त्र बलों के लिए 6 अगस्त, 2004 को एक स्पष्टीकरण जारी किया गया था कि ये सभी बल गृह मंत्रालय के तहत केंद्र के सशस्त्र बल हैं। गृह मंत्रालय के तहत आने वाले सशस्त्र बलों में बीएसएफ, आईटीबीपी, सीमा सुरक्षा बल, असम राइफल्स, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ तथा एनएसजी शामिल हैं। रणबीर सिंह के मुताबिक, गृह मंत्रालय के तहत आने वाले सशस्त्र बलों के सभी कर्मी पुरानी योजना के तहत पेंशन पाना चाहते हैं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार इस दिशा में कोई भी सार्थक कदम आगे नहीं बढ़ा रही है।
गरिमापूर्ण जीवन के लिए पेंशन जरूरी
रणबीर सिंह के मुताबिक, रिटायरमेंट के बाद एक सम्मानित एवं गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए जवानों को पेंशन मिलना आवश्यक है। गृह मंत्रालय के नियंत्रण वाले सशस्त्र बलों के प्रति विसंगति व भेदभाव केंद्र सरकार की स्वयं की नीति के विरुद्ध है। केंद्र सरकार द्वारा 22 दिसंबर, 2003 व 6 अगस्त, 2004 को जारी आदेशों में यह बात परिलक्षित होती है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय सशस्त्र बलों में जारी वेतन विसंगतियां व भेदभाव को समाप्त किया जाए। इन बलों के जवानों की मांग है कि उन्हें पुरानी पेंशन योजना के दायरे में लाया जाए। ये वही योजना है, जो रक्षा मंत्रालय के अधीन सशस्त्र बलों के लिए मान्य की गई है।
सरकार कर रही है जवानों के साथ भेदभाव
रणबीर सिंह ने कहा कि देश सेवा के लिए हर वक्त तत्पर रहने वाले केंद्रीय बलों के साथ भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाया जाता है। सैन्य बलों के लिए सौ नए सैनिक स्कूल खोलने की घोषणा कर दी जाती है, लेकिन केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए कोई नया स्कूल शुरू करने की बात नहीं की गई। केंद्रीय सुरक्षा बलों की सीपीसी कैंटीन, जीएसटी के चलते बाजार भाव पर आ गई है। सीएसडी कैंटीन की तर्ज पर सीपीसी कैंटीन को जीएसटी से छूट नहीं जा रही।
केंद्रीय बलों की ये मांगें भी ठंडे बस्ते में गईं
एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि इन बलों की कैंटीन को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना संभव नहीं है, तो सीएसडी कैंटीन को केंद्रीय सुरक्षा बलों के लिए भी अधिकृत किया जाए। सशस्त्र झंडा दिवस की तर्ज पर अर्धसेना झंडा दिवस कोष की स्थापित करना, सरदार पटेल के नाम पर अर्धसैनिक स्कूल खोलना और जवानों एवं उनके परिवारों के लिए सीजीएचएस डिस्पेंसरियों का विस्तार करना आदि शामिल है।
परेशान होकर नौकरी छोड़ रहे जवान
एसोसिएशन के मुताबिक, जोखिम भत्ता और राशन मनी को लेकर भी शिकायत रहती है। छुट्टी की समस्या खत्म नहीं हो सकी है। आवासीय सुविधा का मौजूदा स्तर संतोषजनक नहीं है। कई बलों के अधिकारियों को अपना कैडर रिव्यू, पदोन्नति और वेतन विसंगतियां दूर कराने के लिए अदालती लड़ाई लड़नी पड़ रही है। इससे परेशान होकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्त लेने और इस्तीफा देने वाले जवानों की संख्या बढ़ती जा रही है।
बल स्वैच्छिक सेवानिवृत्त इस्तीफा
- सीआरपीएफ 26,164 3396
- बीएसएफ 36768 3837
- आईटीबीपी 3837 1648
- एसएसबी 3230 1031
- सीआईएसएफ 6705 5848
(यह आंकड़ा वर्ष 2011 से लेकर 1 मार्च, 2021 तक का है।)