प्रदूषण ने भारत को दुनियाभर में किया बदनाम, नासा का ताजा सैटेलाइट चित्र जारी
भारत के आसमान में सर्दियों की शुरूआत में छाई धुंध पर दुनिया भर में चर्चा है। नासा ने ताजा सैटेलाइट चित्र जारी करते हुए अनुमान जताया है कि किसानों द्वारा करीब 3.2 करोड़ टन अवशेष घास-फूस (पराली) इन दिनों जलाया जा रहा है। सरकार द्वारा पटाखों पर नियंत्रण करने के उपाय भी काम नहीं आए और परिणाम यह हुआ कि नई दिल्ली की हवा दुनिया में खतरनाक स्तर पर जा पहुंची है।
नासा द्वारा जारी चित्र के बाद भारत में छाई प्रदूषित धुंध पर चीन के सीआरआई रेडियो के अलावा ब्रिटेन के दि इंडिपेंडेंट, आईबी टाइम्स और ऑस्ट्रेलिया के दि ऑस्ट्रेलियन ऑनलाइन ने भी इस पर विस्तार से खबरें प्रकाशित की हैं। भारत में एनजीटी द्वारा पिछले साल ही इस पर रोक लगाने के लिए सरकार को कहा गया था, लेकिन फिलहाल किसानों की इस कार्रवाई पर कोई नियंत्रण नहीं दिख रहा है।
पंजाब में जब किसानों से इस बारे में बात की तो वे इस बात को लेकर जागरूक दिखे और चाहते हैं कि इसे रोका जाए। लेकिन सरकार द्वारा सुझाए गए महंगे विकल्प को अपनाने में किसानों ने असमर्थता जताई। करीब दो हफ्ते पहले से किसानों द्वारा उनके खेतों में लगाई जाने वाली आग के कारण वायु के सबसे छोटे कण (पीएम-2.5) सोमवार तक दिल्ली व आसपास के इलाकों में 688 माइक्रोग्राम के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। यह भारत सरकार के निर्धारित मानकों से 10 गुना अधिक है और डब्ल्यूएचओ के मुताबिक यह इंसान की सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक है।
सरकार द्वारा सुझाई तकनीकी पर अमल करना है काफी खर्चीला
न्यूयॉर्क टाइम्स संवाददाता ने जब चंडीगढ़ और दिल्ली के आसपास वाले कई इलाकों का दौरा किया तो पाया कि शाम होते ही सड़क के दोनों तरफ किसानों द्वारा कटी हुई फसल के अवशेष जलते देखना आम बात है। इसके चलते अगली सुबह न केवल सांस लेने में तकलीफ होती है बल्कि प्रदूषण की गर्द धुंध के रूप में छा जाने के कारण यातायात भी रुक-रुककर आगे खिसकता है।
सरकार द्वारा सुझाई तकनीकी पर अमल करना है काफी खर्चीला
सरकार ने जो तकनीकी सुझाई है उसके मुताबिक किसान बीज बोने वाली मशीन को ट्रैक्टर पर लादकर गेहूं की बोवनी करें। ऐसा करने से उन्हें चावल की फसल काटने के बाद खेतों में खड़े उसके ठूंठों (पराली) को जलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन किसानों का कहना है कि इस तकनीकी पर करीब सवा लाख रु. का अतिरिक्त खर्च पड़ेगा जिसे बर्दाश्त करना किसान के बूते की बात नहीं है।
दीपावली पर पटाखों के बजाय ‘पराली’ की आग ज्यादा प्रदूषित
दुनिया में चर्चा है कि उत्तर भारत में छाई ‘स्मॉग’ के लिए अधिकांश लोग दिवाली पर छूटने वाले पटाखों को अधिक जिम्मेदार मान रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि इसका सबसे बड़ा कारण पंजाब-हरियाणा में किसानों द्वारा जलाई जाने वाली करीब 3.2 करोड़ टन ‘पराली’ है। इससे उठने वाले धुंए के चलते एक तिहाई हवा प्रदूषण की गिरफ्त में है। इस कारण करीब 2 करोड़ लोग पिछले एक हफ्ते में हवा के खतरनाक स्तर में सांस लेने को मजबूर हैं।