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कुरुक्षेत्र: आम आदमी पार्टी के नैतिक क्षरण पर जनता की मुहर है दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Sat, 08 Feb 2025 03:14 PM IST
सार

2013 में दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल में संभावना देखी। 2015 में उन्हें अपार बहुमत देकर बड़ा मौका दिया और 2020 में मुफ्त, बिजली, पानी, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए उठाए गए कदमों पर मुहर लगाते हुए दोबारा भरोसा दिया कि वो सब करो, जो आप कहते हो। हालांकि, 2020 से 2025 के दौरान अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी रास्ता भटक गए या यूं कहें कि उन्होंने रास्ता बदल दिया।

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delhi election result 2025: Delhi results are the public seal of approval on moral degradation of AAP
AAP - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी सिर्फ हारी ही नहीं, बल्कि राजनीति में नैतिकता और शुचिता के जिन मूल्यों की स्थापना के जिस दावे के साथ इस दल का अन्ना आंदोलन के गर्भ से जन्म हुआ था, कहीं न कहीं उनसे दूर होना इस पार्टी को ले डूबा। इस बार सिर्फ पार्टी ही नहीं, बल्कि निवर्तमान मुख्यमंत्री आतिशी और मंत्री गोपाल राय को छोड़कर कमोबेश आप के सभी बड़े नेता चुनाव हार गए। वरना यही बीजेपी, यही नरेंद्र मोदी और यही अमित शाह 2015 और 2020 में भी तो थे। तब भी पूरा जोर लगाया गया था, लेकिन तब अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का नई और अलग राजनीति का नारा भाजपा की संगठन शक्ति, उसके नेताओं की चमक, साधन, संसाधन और तंत्र बल पर भारी पड़ा था।

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केजरीवाल ने जनता को पीछे चलने वाली भीड़ समझ लिया
अगर आम आदमी पार्टी और टीम केजरीवाल अपनी नैतिक आभा नहीं खोते तो उनकी जीत की संभावनाओं पर कोई संशय नहीं होता। दरअसल 2013 से दिल्ली की राजनीति में मिलने वाली अपार लोकप्रियता से अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के अपराजेय होने का भ्रम पैदा कर दिया था। उन्होंने जनता को अपने पीछे चलने वाली भीड़ समझ लिया। वो भूल गए कि जनता किसी व्यक्ति या दल के पीछे नहीं, बल्कि उन वादों, दावों और सपनों के साथ है, जिन्हें नई राजनीति के नारे के साथ अरविंद केजरीवाल और आप ने शुरू किया था और जिनमें कट्टर ईमानदारी, सत्ता के तामझाम से दूर सादगी, आम जन से निकटता, राजनीति में शुचिता, सार्वजनिक नैतिकता की स्थापना, भ्रष्टाचार उन्मूलन और सर्व धर्म समभाव शामिल थे। 
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अति आत्मविश्वास और सत्ता का अहंकार
2013 में दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल में संभावना देखी। 2015 में उन्हें अपार बहुमत देकर बड़ा मौका दिया और 2020 में मुफ्त, बिजली, पानी, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए उठाए गए कदमों पर मुहर लगाते हुए दोबारा भरोसा दिया कि वो सब करो, जो आप कहते हो। हालांकि, 2020 से 2025 के दौरान अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी रास्ता भटक गए या यूं कहें कि उन्होंने रास्ता बदल दिया। 2022 में दिल्ली नगर निगम की जीत ने आप और टीम केजरीवाल का मनोबल और बढ़ा दिया। इससे वो अति आत्मविश्वास के शिकार हुए, जो कालांतर में सत्ता के अहंकार में बदल गया क्योंकि दोनों के बीच की सीमा रेखा बेहद क्षीण होती है।
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राजनीतिक साख पर असर
इसी दौर में कथित शराब घोटाले और शीशमहल जैसे विवादों ने आप और केजरीवाल की नैतिक आभा को निस्तेज किया और बीजेपी-कांग्रेस दोनों को हमले का मौका दिया। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी और जेल यात्रा ने भाजपा को और ज्यादा हमलावर होने का मौका दे दिया। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन और विधानसभा चुनाव में उसी कांग्रेस को बीजेपी की बी टीम बताने से आप की राजनीतिक साख पर भी खराब असर पड़ा। गिरफ्तार होने और जेल जाने के बावजूद मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र न देकर अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक नैतिकता और राजनीतिक शुचिता के सार्वभौमिक मूल्य के स्वघोषित संकल्प को तार-तार कर दिया। 

बड़ी भूल
इसके बाद रही सही कसर तब पूरी हो गई, जब केजरीवाल ने इस्तीफा देकर सिर्फ चुनाव तक आतिशी सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया। इसकी जगह अगर केजरीवाल गिरफ्तार होते ही इस्तीफा देकर आतिशी को पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बना देते तो उनकी नैतिक आभा भी बचती और तस्वीर भी कुछ और हो सकती थी, लेकिन केजरीवाल को लगा कि जनता उनके हर सही और हर गलत फैसले को झूमते हुए सिर माथे लगा लेगी। यही उनकी बड़ी भूल थी। 


आप को हराने के लिए लड़ी कांग्रेस
बीजेपी ने इस बार पिछली बार की तरह चुनाव हिंदू-मुस्लिम पर नहीं, दिल्ली के मुद्दों पर लड़ा। बिजली, पानी, यमुना के पानी, वायु प्रदूषण, टूटी सड़कों, गंदी नालियों, सीवर और सुशासन को मुद्दा बनाया और उस पर ही आप को घेरा। केजरीवाल की मुफ्त घोषणाओं के जवाब में बीजेपी ने बाजी मारी। आप और कांग्रेस के मजबूत नेताओं को तोड़कर उनके जरिए वो सीटें भी जीतीं, जो वह पहले नही जीत सकी थीं। जबकि केजरीवाल अपने नाराज नेताओं को भी नहीं संभाल सके। भाजपा की जीत में कांग्रेस का भी गिलहरी वाला योगदान रहा, जो खुद जीतने से ज्यादा आप को हराने के लिए लड़ रही थी।

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