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समंदर में बढ़ेगा भारत का दबदबा: निकोबार में 13,000 करोड़ से बनेगा एयरपोर्ट, नौसेना और नागरिक करेंगे इस्तेमाल
Mon, 08 Jun 2026 06:20 PM IST
Devesh Tripathi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 08 Jun 2026 06:20 PM IST
सार
केंद्र सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में लगभग 13,000 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक हवाई अड्डा और रनवे विकसित करने की योजना पर काम कर रही है। यह परियोजना रक्षा और नागरिक, दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। इसे पांच वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य है। नई सुविधा से भारतीय नौसेना की रणनीतिक क्षमता मजबूत होगी और हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी व त्वरित प्रतिक्रिया बेहतर हो सकेगी।
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ग्रेट निकोबार परियोजना
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
विस्तार
भारत सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप समूह के विकास के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रही है। इसके तहत 13,000 करोड़ रुपये के निवेश से एक अत्याधुनिक हवाई अड्डा और रनवे का निर्माण किया जाएगा। यह परियोजना न केवल भारतीय नौसेना के लिए रणनीतिक महत्व रखेगी, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी हवाई संपर्क को बेहतर बनाएगी। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस परियोजना को पांच साल के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए बजट का खर्च रक्षा मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से वहन किया जाएगा। यह सहयोगात्मक दृष्टिकोण परियोजना की विशालता और इसके दोहरे उद्देश्य- रक्षा और नागरिक उपयोग को दर्शाता है।
रणनीतिक महत्व के साथ नागरिक सुविधा का विस्तार
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां एक आधुनिक हवाई अड्डे और रनवे का निर्माण भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमताओं को मजबूत करेगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी और प्रतिक्रिया में तेजी आएगी। साथ ही यह परियोजना द्वीप के निवासियों के लिए हवाई यात्रा को सुगम बनाएगी, पर्यटन को बढ़ावा देगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेगी।
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इस परियोजना के तहत एक ऐसे हवाई अड्डे का निर्माण किया जाएगा जो सैन्य और नागरिक दोनों विमानों के संचालन के लिए उपयुक्त होगा। रनवे की लंबाई और क्षमता इस प्रकार डिजाइन की जाएगी कि यह विभिन्न प्रकार के विमानों को समायोजित कर सके। परियोजना के पांच साल के भीतर पूरा होने की उम्मीद है, जो इस क्षेत्र में भारत की बुनियादी ढांचा विकास की गति को दर्शाता है।
क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना?
यह विकास परियोजना ग्रेट निकोबार द्वीप समूह को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अंडमान-निकोबार भारत का अंतिम छोर है। सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद निकट स्थित है। यह ऐसी रणनीतिक लोकेशन है, जहां से चीन के लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल और 70 प्रतिशत एलएनजी (एलएनजी) का आवागमन होता है। सामरिक और व्यावसायिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को नई पहचान देने की दिशा में भारत सरकार तैयारी कर रही है।
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह (जीएनआई) के समग्र विकास की परिकल्पना के तहत केंद्र सरकार ने चार प्रमुख परियोजनाओं को शामिल किया है। इनमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आईसीटीपी), संयुक्त उपयोग वाला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा एवं नौसैनिक एयर स्टेशन, टाउनशिप तथा पावर प्लांट शामिल हैं।
हिंद महासागर में कैसे बढ़ेगा भारत का दबदबा?
ग्रेट निकोबार द्वीप (जीएनआई) में प्रस्तावित संयुक्त उपयोग वाले ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे और नौसैनिक वायु स्टेशन से भारत की इस क्षेत्र में निरंतर उपस्थिति मजबूत होगी। इसके साथ ही सैन्य संसाधनों की आवाजाही, अभियानों को समर्थन, समुद्री मार्गों की निगरानी, संकट की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया तथा अग्रिम क्षेत्रों में रसद (लॉजिस्टिक्स) बनाए रखने की क्षमता भी बढ़ेगी।
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह 6-डिग्री चैनल के निकट स्थित है, जो अदन की खाड़ी से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह क्षेत्र इस समुद्री मार्ग से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दुनिया के कुल ऊर्जा व्यापार का लगभग दो-तिहाई और कंटेनर परिवहन का लगभग आधा हिस्सा इसी संवेदनशील क्षेत्र से होकर गुजरता है।
आईएनएस बाज के बाद ग्रेट निकोबार परियोजना से मिलेगी नई ताकत
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना का एयर स्टेशन आईएनएस बाज वर्ष 2012 से सक्रिय है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, यह एयरफील्ड प्रारंभ में 3,500 फीट लंबे रनवे के साथ शुरू हुआ था। बाद में आवश्यकताओं के अनुरूप इसके विस्तार का कार्य जारी रहा। रनवे की लंबाई 3,500 फीट से बढ़ाकर 4,500 फीट कर दी गई थी, जबकि विस्तार योजना के तहत इसे 10,000 फीट तक बढ़ाने का प्रस्ताव था। हालांकि, इसके लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और समुद्री क्षेत्र के पुनर्भरण (रीक्लेमेशन) की आवश्यकता थी।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे की स्थापना के लिए आईएनएस बाज सहित पांच वैकल्पिक स्थलों का मूल्यांकन किया गया था। इस दौरान स्थलाकृति (टोपोग्राफी), हवाई नेविगेशन में संभावित बाधाएं, जनजातीय आबादी पर प्रभाव, वनस्पति एवं वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर सहित कई अन्य मानकों को ध्यान में रखा गया। विस्तृत अध्ययन के बाद गलाथिया खाड़ी को ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया।
क्या है भारत सरकार की योजना?
इसके अलावा, आईएनएस बाज को ब्राउनफील्ड परियोजना के रूप में विकसित करने की संभावना पर भी विचार किया गया, लेकिन कई व्यावहारिक सीमाओं के कारण इस विकल्प को छोड़ दिया गया। इस क्षेत्र के उत्तर में 80 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियां हैं, जिनके कारण बड़े विमानों के सुरक्षित संचालन के लिए व्यापक स्तर पर पहाड़ी कटान और उथले समुद्री तट की ड्रेजिंग आवश्यक होती।
साथ ही, भारतीय नौसेना का मौजूदा बुनियादी ढांचा छोटे रनवे के आसपास विकसित हो चुका है और कोड-4 श्रेणी के रनवे के लिए आवश्यक सुरक्षा मानक यहां उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में मौजूदा सुविधाओं को हटाना पड़ता। इसके अतिरिक्त, भविष्य में विस्तार की संभावनाएं भी सीमित थीं और यह स्थान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए आवश्यक अवसंरचना को समायोजित करने में सक्षम नहीं था।
अधिकारियों के अनुसार, अगर आईएनएस बाज को ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट के लिए चुना जाता तो जनजातीय आबादी, वनस्पति और वन्यजीवों पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव पड़ता। यही कारण है कि नई परियोजना के तहत आईएनएस बाज से लगभग 30 किलोमीटर दूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट विकसित किया जाएगा।
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इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए बजट का खर्च रक्षा मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से वहन किया जाएगा। यह सहयोगात्मक दृष्टिकोण परियोजना की विशालता और इसके दोहरे उद्देश्य- रक्षा और नागरिक उपयोग को दर्शाता है।
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रणनीतिक महत्व के साथ नागरिक सुविधा का विस्तार
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां एक आधुनिक हवाई अड्डे और रनवे का निर्माण भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमताओं को मजबूत करेगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी और प्रतिक्रिया में तेजी आएगी। साथ ही यह परियोजना द्वीप के निवासियों के लिए हवाई यात्रा को सुगम बनाएगी, पर्यटन को बढ़ावा देगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेगी।
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इस परियोजना के तहत एक ऐसे हवाई अड्डे का निर्माण किया जाएगा जो सैन्य और नागरिक दोनों विमानों के संचालन के लिए उपयुक्त होगा। रनवे की लंबाई और क्षमता इस प्रकार डिजाइन की जाएगी कि यह विभिन्न प्रकार के विमानों को समायोजित कर सके। परियोजना के पांच साल के भीतर पूरा होने की उम्मीद है, जो इस क्षेत्र में भारत की बुनियादी ढांचा विकास की गति को दर्शाता है।
क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना?
यह विकास परियोजना ग्रेट निकोबार द्वीप समूह को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अंडमान-निकोबार भारत का अंतिम छोर है। सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद निकट स्थित है। यह ऐसी रणनीतिक लोकेशन है, जहां से चीन के लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल और 70 प्रतिशत एलएनजी (एलएनजी) का आवागमन होता है। सामरिक और व्यावसायिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को नई पहचान देने की दिशा में भारत सरकार तैयारी कर रही है।
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह (जीएनआई) के समग्र विकास की परिकल्पना के तहत केंद्र सरकार ने चार प्रमुख परियोजनाओं को शामिल किया है। इनमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आईसीटीपी), संयुक्त उपयोग वाला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा एवं नौसैनिक एयर स्टेशन, टाउनशिप तथा पावर प्लांट शामिल हैं।
हिंद महासागर में कैसे बढ़ेगा भारत का दबदबा?
ग्रेट निकोबार द्वीप (जीएनआई) में प्रस्तावित संयुक्त उपयोग वाले ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे और नौसैनिक वायु स्टेशन से भारत की इस क्षेत्र में निरंतर उपस्थिति मजबूत होगी। इसके साथ ही सैन्य संसाधनों की आवाजाही, अभियानों को समर्थन, समुद्री मार्गों की निगरानी, संकट की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया तथा अग्रिम क्षेत्रों में रसद (लॉजिस्टिक्स) बनाए रखने की क्षमता भी बढ़ेगी।
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह 6-डिग्री चैनल के निकट स्थित है, जो अदन की खाड़ी से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह क्षेत्र इस समुद्री मार्ग से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दुनिया के कुल ऊर्जा व्यापार का लगभग दो-तिहाई और कंटेनर परिवहन का लगभग आधा हिस्सा इसी संवेदनशील क्षेत्र से होकर गुजरता है।
आईएनएस बाज के बाद ग्रेट निकोबार परियोजना से मिलेगी नई ताकत
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना का एयर स्टेशन आईएनएस बाज वर्ष 2012 से सक्रिय है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, यह एयरफील्ड प्रारंभ में 3,500 फीट लंबे रनवे के साथ शुरू हुआ था। बाद में आवश्यकताओं के अनुरूप इसके विस्तार का कार्य जारी रहा। रनवे की लंबाई 3,500 फीट से बढ़ाकर 4,500 फीट कर दी गई थी, जबकि विस्तार योजना के तहत इसे 10,000 फीट तक बढ़ाने का प्रस्ताव था। हालांकि, इसके लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और समुद्री क्षेत्र के पुनर्भरण (रीक्लेमेशन) की आवश्यकता थी।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे की स्थापना के लिए आईएनएस बाज सहित पांच वैकल्पिक स्थलों का मूल्यांकन किया गया था। इस दौरान स्थलाकृति (टोपोग्राफी), हवाई नेविगेशन में संभावित बाधाएं, जनजातीय आबादी पर प्रभाव, वनस्पति एवं वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर सहित कई अन्य मानकों को ध्यान में रखा गया। विस्तृत अध्ययन के बाद गलाथिया खाड़ी को ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया।
क्या है भारत सरकार की योजना?
इसके अलावा, आईएनएस बाज को ब्राउनफील्ड परियोजना के रूप में विकसित करने की संभावना पर भी विचार किया गया, लेकिन कई व्यावहारिक सीमाओं के कारण इस विकल्प को छोड़ दिया गया। इस क्षेत्र के उत्तर में 80 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियां हैं, जिनके कारण बड़े विमानों के सुरक्षित संचालन के लिए व्यापक स्तर पर पहाड़ी कटान और उथले समुद्री तट की ड्रेजिंग आवश्यक होती।
साथ ही, भारतीय नौसेना का मौजूदा बुनियादी ढांचा छोटे रनवे के आसपास विकसित हो चुका है और कोड-4 श्रेणी के रनवे के लिए आवश्यक सुरक्षा मानक यहां उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में मौजूदा सुविधाओं को हटाना पड़ता। इसके अतिरिक्त, भविष्य में विस्तार की संभावनाएं भी सीमित थीं और यह स्थान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए आवश्यक अवसंरचना को समायोजित करने में सक्षम नहीं था।
अधिकारियों के अनुसार, अगर आईएनएस बाज को ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट के लिए चुना जाता तो जनजातीय आबादी, वनस्पति और वन्यजीवों पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव पड़ता। यही कारण है कि नई परियोजना के तहत आईएनएस बाज से लगभग 30 किलोमीटर दूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट विकसित किया जाएगा।