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Bibek Debroy: लेख पर बढ़ते विवाद के बीच पीएम की EAC ने किया किनारा, कहा- इसका सरकार और परिषद से नहीं कोई संबंध

Fri, 18 Aug 2023 12:11 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Fri, 18 Aug 2023 12:11 PM IST
सार

देबरॉय ने कहा था कि हम लोगों को खुद को एक नया संविधान देने की जरूरत है। इसी को लेकर विपक्ष भड़क उठा था। बढ़ते मामले को देखकर परिषद ने लेख से किनारा कर लिया है। 

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Debroy's article doesn't reflect govt or EAC PM views: Eco Advisory Council tweet
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का बयान - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसीपीएम) के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय द्वारा ‘नए संविधान’ पर लिखे गए लेख पर विवाद गहराता जा रहा है। विपक्ष लगातार सरकार पर निशाना साध रहा है। ऐसे में परिषद और सरकार ने खुद को लेख से अलग करते हुए कहा कि देबरॉय के विचारों से ईएसीपीएम और सरकार का कोई लेना देना नहीं है। 

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बता दें, यह लेख 77वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रकाशित हुआ था। इसमें देबरॉय ने कहा था कि हम लोगों को खुद को एक नया संविधान देने की जरूरत है। इसी को लेकर विपक्ष भड़क उठा। उसने आरोप लगाया था कि सरकार ने संविधान को खत्म करने का बिगुल फूंक दिया है, जिसके प्रमुख शिल्पी डॉ. अंबेडकर थे।

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यह भी पढ़ें- Bibek Debroy: लेख पर बढ़ते विवाद के बीच पीएम की EAC प्रमुख देबरॉय की सफाई

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परिषद का देबरॉय के लेख से किनारा
ऐसे में बढ़ते विवाद को थामने के लिए अब प्रधानमंत्री की ईएसी ने लेख से खुद को अलग कर लिया है। उसका कहना है कि जो भी लिखा गया, वो बिबेक देबरॉय के व्यक्तिगत विचार थे। इसका परिषद और सरकार से कोई लेना देना नहीं है। हालांकि, परिषद ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह किस आर्टिकल के बारे में बात कर रहे। 

बता दें, बिबेक देबरॉय ईएसीपीएम के अध्यक्ष हैं। 

यह है मामला

देबरॉय ने अपने लेख में लिखा था, हमारा मौजूदा संविधान काफी हद तक 1935 के भारत सरकार अधिनियम पर आधारित है। इस अर्थ में यह एक औपनिवेशिक विरासत भी है। 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित एक आयोग द्वारा एक रिपोर्ट आई थी, लेकिन यह आधा-अधूरा प्रयास था। कानून में सुधार के कई पहलुओं की तरह यहां और दूसरे बदलाव से काम नहीं चलेगा। हमें पहले सिद्धांतों से शुरुआत करनी चाहिए, जैसा कि संविधान सभा की बहस में हुआ था। 2047 के लिए भारत को किस संविधान की जरूरत है?

उन्होंने कहा था कि हम जो बहस करते हैं, वह संविधान से शुरू और खत्म होती है। कुछ संशोधनों से काम नहीं चलेगा। हमें ड्राइंग बोर्ड पर वापस जाना चाहिए और पहले सिद्धांतों से शुरू करना चाहिए, यह पूछना चाहिए कि प्रस्तावना में इन शब्दों का अब क्या मतलब है: समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, न्याय, स्वतंत्रता और समानता। हम लोगों को खुद को एक नया संविधान देना होगा।'

 

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