{"_id":"5a7969214f1c1b83268b8bcd","slug":"dark-side-of-the-circumcision-of-women-in-india","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"भारत में औरतों के खतने का काला सच","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
भारत में औरतों के खतने का काला सच
बीबीसी, हिंदी
Updated Tue, 06 Feb 2018 02:06 PM IST
विज्ञापन
muslim-women
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अगर कोई आपके शरीर का एक हिस्सा जबरन काट दे तो? क्या इसे किसी भी तरह से सही ठहराया जा सकता है? नहीं न? लेकिन ऐसा किया जा रहा है, ऐसा हो रहा है। भारत समेत दुनिया के कई देशो में। पुणे में रहने वाली निशरीन सैफ के साथ ऐसा ही कुछ हुआ था।
वो याद करती हैं, "तब मैं तकरीबन सात साल की रही होऊंगी। मुझे ठीक से याद नहीं है लेकिन उस घटना की एक धुंधली सी तस्वीर मेरे जहन में आज भी मौजूद है।" निशरीन ने बीबीसी को बताया, "मां मुझे अपने साथ लेकर घर से निकलीं और हम एक छोटे से कमरे में पहुंचे जहां एक औरत पहले से बैठी थी। उसने मुझे लिटाया और मेरी पैंटी उतार दी।"
भारत में खतना प्रथा
वो आगे बताती हैं, "उस वक्त तो ज्यादा दर्द नहीं हुआ, बस ऐसा लगा जैसे कोई सुई चुभो रहा है। असली दर्द सब कुछ होने के बाद महसूस हुआ। बहुत दिनों तक पेशाब करने में बेहद तकलीफ होती थी। मैं दर्द से रो पड़ती थी।"
विज्ञापन
निशरीन जब बड़ी हुईं तो उन्हें पता चला कि उनका खतना किया गया था। आम तौर पुरुषों का खतना किया जाता है लेकिन दुनिया के कई देशों में महिलाओँ को भी इस दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
भारत भी इनमें से एक है। यहां इस प्रथा का चलन बोहरा मुस्लिम समुदाय (दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा) में है। भारत में बोहरा आबादी आम तौर पर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में रहती है।
10 लाख से अधिक आबादी वाला यह समाज काफी समृद्ध है और दाऊदी बोहरा समुदाय भारत के सबसे ज्यादा शिक्षित समुदायों में से एक है। निशरीन सैफ भी बोहरा मुस्लिम समुदाय से हैं और यही वजह है कि बचपन में उनका खतना किया गया।
क्या है महिलाओँ का खतना?
इसे 'खफ्द' या 'फीमेल जेनाइटल म्युटिलेशन' (एफजीएम) भी कहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के मुताबिक, "एफजीएम की प्रक्रिया में लड़की के जननांग के बाहरी हिस्से को काट दिया जाता है या इसकी बाहरी त्वचा निकाल दी जाती है।"
यूएन इसे 'मानवाधिकारों का उल्लंघन' मानता है। दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें एफजीएम को दुनिया भर से ख़त्म करने का संकल्प लिया गया था। महिला खतना के बारे में जागरूकता बढ़ाने और इसे रोकने के मकसद से यूएन ने साल की 6 फरवरी तारीख़ को 'इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर एफजीएम' घोषित किया है।
बोहरा मुसलमान
लड़कियों का खतना किशोरावस्था से पहले यानी छह-सात साल की छोटी उम्र में ही करा दिया जाता है। इसके कई तरीके हैं। जैसे क्लिटरिस के बाहरी हिस्से में कट लगाना या इसके बाहरी हिस्से की त्वचा निकाल देना। खतना से पहले एनीस्थीसिया भी नहीं दिया जाता। बच्चियां पूरे होशोहवास में रहती हैं और दर्द से चीखती हैं।
पारंपरिक तौर पर इसके लिए ब्लेड या चाकू का इस्तेमाल करते हैं और खतना के बाद हल्दी, गर्म पानी और छोटे-मोटे मरहम लगाकर दर्द कम करने की कोशिश की जाती है। बोहरा मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाली इंसिया दरीवाला के मुताबिक 'क्लिटरिस' को बोहरा समाज में 'हराम की बोटी' कहा जाता है।
बोहरा मुस्लिम मानते हैं कि इसकी मौजूदगी से लड़की की यौन इच्छा बढ़ती है। इंसिया दरीवाला ने कहा, "माना जाता है कि क्लिटरिस हटा देने से लड़की की यौन इच्छा कम हो जाएगी और वो शादी से पहले यौन संबंध नहीं बनाएगी।"
वो बताती हैं, "मेरी मां ने मुझे तो बचा लिया लेकिन वो मेरी बड़ी बहन को नहीं बचा पाईं। परिवार की ही एक महिला ने उसे फिल्म दिखाने के बहाने उसका ख़तना करवा दिया था।" इंसिया की मां क्रिश्चियन समुदाय से हैं इसलिए उन्हें खतना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
उनकी बड़ी बेटी का खतना धोखे से कराया गया और जब उन्होंने उसे दर्द में तड़पते देखा तो ठान लिया कि अपनी छोटी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने देंगी। इंसिया ने बताया, "शुरू में परिवार के बड़े-बुजुर्ग मां से बहुत नाराज हुए लेकिन धीरे-धीरे ये बात भुला दी गई। मैंने अपनी बहन का दर्द करीब से देखा है इसीलिए आज इस क्रूर प्रथा के ख़िलाफ खुलकर आवाज उठा रही हूं।"
विज्ञापन
वो याद करती हैं, "तब मैं तकरीबन सात साल की रही होऊंगी। मुझे ठीक से याद नहीं है लेकिन उस घटना की एक धुंधली सी तस्वीर मेरे जहन में आज भी मौजूद है।" निशरीन ने बीबीसी को बताया, "मां मुझे अपने साथ लेकर घर से निकलीं और हम एक छोटे से कमरे में पहुंचे जहां एक औरत पहले से बैठी थी। उसने मुझे लिटाया और मेरी पैंटी उतार दी।"
विज्ञापन
भारत में खतना प्रथा
वो आगे बताती हैं, "उस वक्त तो ज्यादा दर्द नहीं हुआ, बस ऐसा लगा जैसे कोई सुई चुभो रहा है। असली दर्द सब कुछ होने के बाद महसूस हुआ। बहुत दिनों तक पेशाब करने में बेहद तकलीफ होती थी। मैं दर्द से रो पड़ती थी।"
विज्ञापन
निशरीन जब बड़ी हुईं तो उन्हें पता चला कि उनका खतना किया गया था। आम तौर पुरुषों का खतना किया जाता है लेकिन दुनिया के कई देशों में महिलाओँ को भी इस दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
भारत भी इनमें से एक है। यहां इस प्रथा का चलन बोहरा मुस्लिम समुदाय (दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा) में है। भारत में बोहरा आबादी आम तौर पर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में रहती है।
10 लाख से अधिक आबादी वाला यह समाज काफी समृद्ध है और दाऊदी बोहरा समुदाय भारत के सबसे ज्यादा शिक्षित समुदायों में से एक है। निशरीन सैफ भी बोहरा मुस्लिम समुदाय से हैं और यही वजह है कि बचपन में उनका खतना किया गया।
क्या है महिलाओँ का खतना?
इसे 'खफ्द' या 'फीमेल जेनाइटल म्युटिलेशन' (एफजीएम) भी कहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के मुताबिक, "एफजीएम की प्रक्रिया में लड़की के जननांग के बाहरी हिस्से को काट दिया जाता है या इसकी बाहरी त्वचा निकाल दी जाती है।"
यूएन इसे 'मानवाधिकारों का उल्लंघन' मानता है। दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें एफजीएम को दुनिया भर से ख़त्म करने का संकल्प लिया गया था। महिला खतना के बारे में जागरूकता बढ़ाने और इसे रोकने के मकसद से यूएन ने साल की 6 फरवरी तारीख़ को 'इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर एफजीएम' घोषित किया है।
बोहरा मुसलमान
लड़कियों का खतना किशोरावस्था से पहले यानी छह-सात साल की छोटी उम्र में ही करा दिया जाता है। इसके कई तरीके हैं। जैसे क्लिटरिस के बाहरी हिस्से में कट लगाना या इसके बाहरी हिस्से की त्वचा निकाल देना। खतना से पहले एनीस्थीसिया भी नहीं दिया जाता। बच्चियां पूरे होशोहवास में रहती हैं और दर्द से चीखती हैं।
पारंपरिक तौर पर इसके लिए ब्लेड या चाकू का इस्तेमाल करते हैं और खतना के बाद हल्दी, गर्म पानी और छोटे-मोटे मरहम लगाकर दर्द कम करने की कोशिश की जाती है। बोहरा मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाली इंसिया दरीवाला के मुताबिक 'क्लिटरिस' को बोहरा समाज में 'हराम की बोटी' कहा जाता है।
बोहरा मुस्लिम मानते हैं कि इसकी मौजूदगी से लड़की की यौन इच्छा बढ़ती है। इंसिया दरीवाला ने कहा, "माना जाता है कि क्लिटरिस हटा देने से लड़की की यौन इच्छा कम हो जाएगी और वो शादी से पहले यौन संबंध नहीं बनाएगी।"
वो बताती हैं, "मेरी मां ने मुझे तो बचा लिया लेकिन वो मेरी बड़ी बहन को नहीं बचा पाईं। परिवार की ही एक महिला ने उसे फिल्म दिखाने के बहाने उसका ख़तना करवा दिया था।" इंसिया की मां क्रिश्चियन समुदाय से हैं इसलिए उन्हें खतना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
उनकी बड़ी बेटी का खतना धोखे से कराया गया और जब उन्होंने उसे दर्द में तड़पते देखा तो ठान लिया कि अपनी छोटी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने देंगी। इंसिया ने बताया, "शुरू में परिवार के बड़े-बुजुर्ग मां से बहुत नाराज हुए लेकिन धीरे-धीरे ये बात भुला दी गई। मैंने अपनी बहन का दर्द करीब से देखा है इसीलिए आज इस क्रूर प्रथा के ख़िलाफ खुलकर आवाज उठा रही हूं।"
भारत में रोक क्यों नहीं?
muslim-women
40 साल की निशरीन भी दो बच्चियों की मां हैं और उन्होंने तय किया है कि वो उनका खतना नहीं करवाएंगी। उन्होंने कहा, "ये चाइल्ड अब्यूज जैसा है। मेरा खतना हुआ लेकिन मैं अपनी बेटियों का खतना नहीं होने दूंगी।"
निशरीन को बताया गया था कि खतना 'हाइजीन' यानी साफ-सफाई के मकसद से किया जाता है लेकिन अब वो जानती हैं कि इसका हाइजीन से कोई लेना-देना नहीं है। इंसिया कहती हैं, "हमारे समुदाय के लोग खतना की वजहें बदल-बदलकर बताते रहते हैं। पहले वो कहते थे ये सफाई के लिए है, फिर कहा कि लड़कियों की यौन इच्छा काबू में करने के लिए है और जब इसका विरोध हो रहा है तो कहते हैं यौन इच्छा बढ़ाने के लिए है।"
वो पूछती हैं, "अगर ये वाकई यौन इच्छा बढ़ाने के लिए है तो सात साल की लड़की का खतना कराके वो क्या हासिल करना चाहते हैं? छोटी बच्ची को सेक्स और यौन इच्छा से क्या मतलब? जाहिर है, वो हमें बेवकूफ बना रहे हैं।"
भारत में एफजीएम के ख़िलाफ मुहिम शुरू करने वाली मासूमा रानालवी कहती हैं कि इनमें से एक भी दावों में सच्चाई नहीं है और खतना का औरतों की जिंदगी पर बुरा असर ही पड़ता है।
उन्होंने कहा, "खतना से औरतों को शारीरिक तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है। इसके अलावा तरह-तरह की मानसिक परेशानियां भी होती हैं। उनकी सेक्स लाइफ पर भी असर पड़ता है और वो सेक्स एंजॉय नहीं कर पातीं।" निशरीन मानती हैं कि बचपन में खतना होने के बाद लड़कियों के लिए किसी पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि अक्सर घर के लोग ही उन्हें बहला-फुसलाकर खतना कराने ले जाते हैं।
उन्होंने कहा, "बचपन से पैदा हुआ ये अविश्वास लंबे वक्त तक बना रहता है और किसी न किसी तरह औरतों की जिंदगियों पर असर डालता है।" 'सहियो' और 'वी स्पीक आउट' जैसी संस्थाएं भारत में एफजीएम को अपराध घोषित करने और इस पर बैन लगाने की मांग कर रही हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, बेल्जियम, यूके, अमरीका, स्वीडन, डेनमार्क और स्पेन जैसे कई देश इसे पहले ही अपराध घोषित कर चुके हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक एफजीएम पर रोक लगाने की मांग करने वाली एक याचिका पर संज्ञान लेते हुए महिला और बाल कल्याण मंत्रालय से जवाब मांगा था। मंत्रालय ने अपने जवाब कहा था कि भारत में एनसीआआरबी (नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) में एफजीएम से सम्बन्धित कोई आधिकारिक आंकड़ा है ही नहीं। इसलिए सरकार इस बारे में कोई फैसला नहीं ले सकती।
'वी स्पीक आउट' की फाउंडर मासूमा रानालवी कहती हैं, "सरकार ये क्यों नहीं समझती कि जब एफजीएम को देश में अपराध माना ही नहीं जाता तो एनसीआरबी में इसके आंकड़े कहां से आएंगे?"
मासूमा आगे कहती हैं, "दूसरी बात ये कि बच्चियों का खतना बहुत छोटी उम्र में कराया जाता है। उस वक्त उन्हें कुछ पता ही नहीं होता, फिर वो पुलिस को कैसे बताएंगी? और फिर खतना कराते ही घरवाले हैं, तो बात बाहर कैसे आएगी?" इंसिया की सलाह है कि सरकार बोहरा समुदाय और एफजीएम पर हुई रिसर्च स्टडी पढ़े, इस बारे में काम करने वालों से बात करे और फिर कोई फैसला ले।
डॉक्टर भी इसमें शामिल हैं
उन्होंने कहा, "इसके साथ ही सरकार को बोहरा समुदाय के धार्मिक नेताओं से भी बात करनी चाहिए, उनके दख़ल के बिना इस अमानवीय परम्परा को ख़त्म करना बहुत मुश्किल है।"
मासूमा बताती हैं कि इन दिनों एक नया चलन देखने को मिल रहा है। पढ़े-लिखे और हाई-प्रोफाइल बोहरा परिवार अपनी बच्चियों का खतना कराने के लिए डॉक्टरों के यहां ले जाते हैं।
उन्होंने कहा, "चूंकि खतना मेडिकल प्रैक्टिस है ही नहीं इसलिए डॉक्टरों को भी इस बारे में कुछ पता नहीं होता फिर भी पैसों के लिए वो भी इसमें शामिल हो जाते हैं। ये सब बिल्कुल गुपचुप तरीके से होता है और कोई इस बारे में बात नहीं करता।" मासूमा ने इस बारे में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को चिट्ठी भी लिखी है लेकिन उन्हें अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।
वो कहती हैं, "एफजीएम रोकने के लिए हमें डॉक्टरों के मदद लेनी होगी। जैसे जन्म से पहले लिंग की जांच को गैरकानूनी घोषित किया गया, वैसे ही खतना को भी ग़ैरकानूनी करार दिया जाना चाहिए।"
निशरीन को बताया गया था कि खतना 'हाइजीन' यानी साफ-सफाई के मकसद से किया जाता है लेकिन अब वो जानती हैं कि इसका हाइजीन से कोई लेना-देना नहीं है। इंसिया कहती हैं, "हमारे समुदाय के लोग खतना की वजहें बदल-बदलकर बताते रहते हैं। पहले वो कहते थे ये सफाई के लिए है, फिर कहा कि लड़कियों की यौन इच्छा काबू में करने के लिए है और जब इसका विरोध हो रहा है तो कहते हैं यौन इच्छा बढ़ाने के लिए है।"
वो पूछती हैं, "अगर ये वाकई यौन इच्छा बढ़ाने के लिए है तो सात साल की लड़की का खतना कराके वो क्या हासिल करना चाहते हैं? छोटी बच्ची को सेक्स और यौन इच्छा से क्या मतलब? जाहिर है, वो हमें बेवकूफ बना रहे हैं।"
भारत में एफजीएम के ख़िलाफ मुहिम शुरू करने वाली मासूमा रानालवी कहती हैं कि इनमें से एक भी दावों में सच्चाई नहीं है और खतना का औरतों की जिंदगी पर बुरा असर ही पड़ता है।
उन्होंने कहा, "खतना से औरतों को शारीरिक तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है। इसके अलावा तरह-तरह की मानसिक परेशानियां भी होती हैं। उनकी सेक्स लाइफ पर भी असर पड़ता है और वो सेक्स एंजॉय नहीं कर पातीं।" निशरीन मानती हैं कि बचपन में खतना होने के बाद लड़कियों के लिए किसी पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि अक्सर घर के लोग ही उन्हें बहला-फुसलाकर खतना कराने ले जाते हैं।
उन्होंने कहा, "बचपन से पैदा हुआ ये अविश्वास लंबे वक्त तक बना रहता है और किसी न किसी तरह औरतों की जिंदगियों पर असर डालता है।" 'सहियो' और 'वी स्पीक आउट' जैसी संस्थाएं भारत में एफजीएम को अपराध घोषित करने और इस पर बैन लगाने की मांग कर रही हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, बेल्जियम, यूके, अमरीका, स्वीडन, डेनमार्क और स्पेन जैसे कई देश इसे पहले ही अपराध घोषित कर चुके हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक एफजीएम पर रोक लगाने की मांग करने वाली एक याचिका पर संज्ञान लेते हुए महिला और बाल कल्याण मंत्रालय से जवाब मांगा था। मंत्रालय ने अपने जवाब कहा था कि भारत में एनसीआआरबी (नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) में एफजीएम से सम्बन्धित कोई आधिकारिक आंकड़ा है ही नहीं। इसलिए सरकार इस बारे में कोई फैसला नहीं ले सकती।
'वी स्पीक आउट' की फाउंडर मासूमा रानालवी कहती हैं, "सरकार ये क्यों नहीं समझती कि जब एफजीएम को देश में अपराध माना ही नहीं जाता तो एनसीआरबी में इसके आंकड़े कहां से आएंगे?"
मासूमा आगे कहती हैं, "दूसरी बात ये कि बच्चियों का खतना बहुत छोटी उम्र में कराया जाता है। उस वक्त उन्हें कुछ पता ही नहीं होता, फिर वो पुलिस को कैसे बताएंगी? और फिर खतना कराते ही घरवाले हैं, तो बात बाहर कैसे आएगी?" इंसिया की सलाह है कि सरकार बोहरा समुदाय और एफजीएम पर हुई रिसर्च स्टडी पढ़े, इस बारे में काम करने वालों से बात करे और फिर कोई फैसला ले।
डॉक्टर भी इसमें शामिल हैं
उन्होंने कहा, "इसके साथ ही सरकार को बोहरा समुदाय के धार्मिक नेताओं से भी बात करनी चाहिए, उनके दख़ल के बिना इस अमानवीय परम्परा को ख़त्म करना बहुत मुश्किल है।"
मासूमा बताती हैं कि इन दिनों एक नया चलन देखने को मिल रहा है। पढ़े-लिखे और हाई-प्रोफाइल बोहरा परिवार अपनी बच्चियों का खतना कराने के लिए डॉक्टरों के यहां ले जाते हैं।
उन्होंने कहा, "चूंकि खतना मेडिकल प्रैक्टिस है ही नहीं इसलिए डॉक्टरों को भी इस बारे में कुछ पता नहीं होता फिर भी पैसों के लिए वो भी इसमें शामिल हो जाते हैं। ये सब बिल्कुल गुपचुप तरीके से होता है और कोई इस बारे में बात नहीं करता।" मासूमा ने इस बारे में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को चिट्ठी भी लिखी है लेकिन उन्हें अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।
वो कहती हैं, "एफजीएम रोकने के लिए हमें डॉक्टरों के मदद लेनी होगी। जैसे जन्म से पहले लिंग की जांच को गैरकानूनी घोषित किया गया, वैसे ही खतना को भी ग़ैरकानूनी करार दिया जाना चाहिए।"