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कांग्रेस कार्यसमिति: 23 नेताओं का शिकायती पत्र खारिज, दूसरी बार सोनिया के सामने ऐसी चुनौती

Tue, 25 Aug 2020 04:35 AM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Tue, 25 Aug 2020 04:35 AM IST
सार

  • भाजपा से मिलीभगत के आरोपों पर अफरातफरी
  • घंटों की कवायद के बाद हुआ डैमेज कंट्रोल

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CWC: congress rejects letter of 23 leaders who raised question over leadership
सोनिया-राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

विस्तार

कांग्रेस कार्यसमिति की करीब सात घंटे चली बैठक 23 वरिष्ठ नेताओं के लिखे शिकायती पत्र के इर्द-गिर्द घूमती रही। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खुद इस पत्र का जिक्र कर इस्तीफे की पेशकश की। बैठक में शामिल 50 नेताओं में से ज्यादातर के बात में पत्र का हवाला जरूर आया। गहमा-गहमी वाली बहस के बाद कार्यसमिति ने न केवल उस पत्र को खारिज कर दिया बल्कि प्रस्ताव पास किया कि पार्टी के अंदरूनी मामलों पर विचार-विमर्श मीडिया के माध्यम से या सार्वजनिक पटल पर नहीं हो सकता।
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पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले तीन वरिष्ठ सदस्य बैठक में शामिल हुए लेकिन इस बात का दबाव नहीं बनया कि उस पर कोई फैसला हो। एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया, पत्र में तीन चार पैरा ऐसे थे जिस पर हस्ताक्षर करने वाले भी बैठक में सहमत नहीं दिखे। बैठक के दौरान उन नेताओं ने पत्र के मजमून पर सफाई भी दी। बैठक के बाद मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बताया, कांग्रेस अध्यक्ष को लिखे पत्र पर गहन-विचार विमर्श किया हुआ है।
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पत्र मीडिया में लीक करना ठीक नहीं था : राहुल
राहुल ने पत्र लिखने वाले नेताओं को आड़े हाथ लिया। उन्होंने बेटे के तौर पर पत्र लिखने के समय पर सवाल उठाते हुए कहा, इलाज करवा रहीं कांग्रेस अध्यक्ष की क्षमताओं और फैसलों पर सवाल उठाकर उन्हें आहत किया गया। अध्यक्ष को पत्र लिखना ठीक था लेकिन बैठक में चर्चा से पहले मीडिया में लीक किया गया। एक बेटे के तौर पर मुझे पीड़ा हुई क्योंकि उनकी सेहत ठीक नहीं है। मैंने अभी भी मना किया लेकिन वह पार्टी हितों की रक्षा चाहती हैं।
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साबित हो तो मैं इस्तीफा देने को तैयार : आजाद
दोपहर करीब साढ़े 12 बजे, बैठक में शामिल गुलाब नबी आजाद ने सफाई दी और बताया, कोई कह रहा है कि मैं भाजपा से मिला हूं और पत्र भाजपा के कहने पर लिखा है। अगर ऐसा साबित हो जाए तो मैं सभी पदों से इस्तीफा दे दूंगा।

सिब्बल ने बदला प्रोफाइल, फिर ट्वीट हटाया
करीब एक बजे खबर मीडिया पर चलते ही कपिल सिब्बल भड़क गए। उन्होंने ट्वीट किया, मैंने राजस्थान हाईकोर्ट में कांग्रेस का केस कामयाबी के साथ लड़ा। बीते 30 साल में कभी भी, किसी भी मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में बयान नहीं दिया। फिर भी हम भाजपा के साथ मिलीभगत में हैं? इसके कुछ देर बाद ही सिब्बल ने ट्विटर पर से अपने परिचय से ‘कांग्रेस’ हटा दिया।

बैठक में अफरातफरी, सदस्यों में हड़कंप
आजाद के चुनौती देने और बाहर सिब्बल के ट्वीट के बाद बैठक में अफरातफरी का माहौल बन गया। एक सदस्य ने बताया, स्क्रीन पर दिख रहे तमाम सदस्य ऐसी खबरों पर हैरान थे। इस दौरान खुद राहुल गांधी ने कहा, मैं आश्चर्यचकित हूं कि मैंने आरएसएस भाजपा का नाम भी नहीं लिया। इसके बाद राहुल ने सिब्बल से बात की।

पार्टी की सफाई राहुल ने ऐसा कुछ नहीं कहा
डेढ़ बजे, रणदीप सुरजेवाला ने सिब्बल को रीट्वीट कर लिखा, राहुल गांधी ने ऐसा कुछ नहीं कहा। इस बारे में कोई बात नहीं हुई। कृपया फर्जी मीडिया रिपोर्ट से भ्रमित ना हों और गलत सूचना न फैलाएं। ज्यादा जरूरी यह है कि मोदी शासन के खिलाफ एकजुट होकर लड़ें न कि आपस में भिड़ते रहें।

सिब्बल ने ट्वीट हटाया, आजाद ने दी सफाई
सुरजेवाला के ट्वीट के बाद दोपहर 1:47 बजे, सिब्बल ने दोबारा ट्वीट किया, राहुल गांधी ने मुझे खुद बताया कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा, इसलिए मैं ट्वीट हटा रहा हूं। शाम करीब चार बजे आजाद ने ट्वीट कर सफाई दी। उन्होंने लिखा, मीडिया के एक हलके में कहा जा रहा है कि कार्यसमिति की बैठक में मैंने राहुल गांधी से कहा कि वह साबित करें कि हमने पत्र भाजपा की मिलीभगत से लिखा है। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि राहुल गांधी ने न तो कार्यसमिति और न बाहर कभी यह कहा कि पत्र भाजपा की वजह से लिखा गया है। आजाद ने कहा, मैंने रविवार को कहा था कि कुछ कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि हमने भाजपा की मिलीभगत से पत्र लिखा है। बैठक के दौरान मैंने उस संदर्भ में इस्तीफा देने की बात कही।


दूसरी बार सोनिया के सामने ऐसी चुनौती
1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद यह दूसरा मौका है जब सोनिया के सामने ऐसी चुनौती आई है। इससे पहले 1999 में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के दिग्गज शरद पवार ने विदेशी मूल का मुद्दा उठाया हुए उन्हें पीएम पद का चेहरा बनाए जाने का विरोध किया था। इसके बाद सोनिया ने इस्तीफा दिया जिसे कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से खारिज कर दिया था। इसके बाद पवार ने कुछ बागी नेताओं के साथ पार्टी छोड़ दी। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सोनिया का सबसे लंबा कार्यकाल रहा।
 
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