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Study: ‘वर्तमान जलवायु नीतियां पेरिस लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं', लैंसेट की रिपोर्ट में खुलासा

Tue, 05 Sep 2023 02:26 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Tue, 05 Sep 2023 02:26 PM IST
सार

लैंसेट की रिपोर्ट से पता चलता है कि जिन 11 उच्च आय वाले देशों ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से कार्बन उत्सर्जन को 'अलग' कर दिया है, उन्हें अपने उत्सर्जन को शून्य के करीब लाने में औसतन 200 साल से अधिक का समय लगेगा। 

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Current climate policies not enough to meet Paris targets: Lancet study
जलवायु परिवर्तन (सांकेतिक) - फोटो : social media

विस्तार

एक अध्ययन में दावा किया है कि वर्तमान जलवायु नीतियां पेरिस के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कहा गया है कि उच्च आय वाले देशों में हरित विकास को आगे बढ़ाने के प्रयासों से पेरिस समझौते के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक उत्सर्जन में कटौती नहीं होगी।

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उत्सर्जन को शून्य के करीब लाने में लगेंगे 200 साल 

द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ जर्नल में हाल ही में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि अगर ऐसा ही रहा तो जिन 11 उच्च आय वाले देशों ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से कार्बन उत्सर्जन को 'अलग' कर दिया है, उन्हें अपने उत्सर्जन को शून्य के करीब लाने में औसतन 200 साल से अधिक का समय लगेगा। अध्ययन में यह भी कहा गया कि ये देश 'वैश्विक कार्बन बजट' में अपने उचित हिस्से से 27 गुना से अधिक उत्सर्जन करेंगे, जिसे पेरिस समझौते के अनुसार खतरनाक जलवायु को रोकने के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक पार नहीं किया जाना चाहिए।

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निष्पक्ष नीति पर काम करने की जरूरत

शोधकर्ताओं ने कहा कि उच्च आय वाले देशों में आर्थिक विकास की खोज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमत जलवायु लक्ष्यों के विपरीत है। इसके लिए एक निष्पक्ष नीति पर काम करने की जरूरत है। वहीं, अध्ययन में इन देशों में कार्बन उत्सर्जन में कटौती की तुलना पेरिस समझौते के तहत आवश्यक कटौती से की गई है। 

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'हरित विकास' कहना भ्रामक

ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय के अध्ययन के प्रमुख लेखक जेफिम वोगेल ने कहा कि उच्च आय वाले देशों में आर्थिक विकास के बारे में कुछ भी अच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय की जलवायु के लिए यह खतरा है। इस उत्सर्जन कटौती को 'हरित विकास' कहना भ्रामक है। उन्होंने कहा कि यह मूल रूप से ग्रीनवाशिंग है। शोधकर्ताओं ने कहा कि उच्च आय वाले देशों में निरंतर आर्थिक विकास विनाशकारी जलवायु विघटन को रोकने और कम आय वाले देशों में विकास की संभावनाओं की रक्षा करने वाले निष्पक्ष सिद्धांतों को बनाए रखने के दोहरे लक्ष्य के विपरीत है।

11 उच्च आय वाले देशों की पहचान

अध्ययन ने साल 2013 और 2019 के बीच 11 उच्च आय वाले देशों की पहचान की, जिन्होंने पूर्ण विघटन हासिल किया। इसमें ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, स्वीडन और यूके थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन उच्च आय वाले देशों ने विकास से उत्सर्जन को अलग किया है, उनमें से किसी ने भी इतनी तेजी से उत्सर्जन में कटौती हासिल नहीं की है कि पेरिस के अनुरूप हो सके।

उन्होंने कहा कि मौजूदा दरों पर इन देशों को अपने उत्सर्जन को शून्य के करीब लाने में औसतन 200 साल से अधिक का समय लगेगा और 1.5 डिग्री सेल्सियस के लिए वैश्विक कार्बन बजट के अपने उचित हिस्से का 27 गुना से अधिक उत्सर्जन करेंगे। शोधकर्ताओं ने कहा कि जिन 11 उच्च आय वाले देशों की जांच की गई, उनमें 2013 और 2019 के बीच उत्सर्जन में कटौती हर साल औसतन 1.6 प्रतिशत थी।

 

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