पुस्तक मेले की संस्कृति लेखकों और प्रकाशकों के लिए एक स्वर्णिम युग
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पुस्तक मेलों में किताबों पर चर्चा, पुस्तक विमोचन, लेखक मंच पर होने वाले कार्यक्रमों के अलावा जितने भी आयोजन होते हैं, उससे लेखकों में लिखने, छपने और चर्चा में बने रहने की एक नई ललक देखने को मिलती है। निरंतर बेहद व्यावसायिक होते जा रहे पुस्तक मेलों और लिटरेचर फेस्टिवल जैसे आयोजनों में घूमते फिरते आपको कई लेखक-प्रकाशक मिल जाएंगे और ज्यादातर एक दूसरे से ये पूछते हुए पाए जाते हैं कि इस मेले में आपकी कोई पुस्तक आई क्या... कुछ लेखक गर्व से बताते हैं कि फलां स्टाल पर मेरी किताब है, देखिए।
आते जाते तमाम स्टॉल्स पर हाथों में किताबें लेकर तीन चार वरिष्ठ जनों के साथ लेखक विमोचन परंपरा को आगे बढ़ाते और तस्वीरें खिंचवाते भी दिख जाएंगे। सोशल मीडिया के ज़माने में तो वैसे भी सेल्फ पब्लिसिटी का एक बड़ा प्लेटफॉर्म आपके पास है तो फिर किताब आए और चर्चा न हो, ये भला कैसे हो सकता है।
जाहिर है, लेखकों के लिए पुस्तक मेले या लिटरेचर फेस्टिवल्स जैसे आयोजन एक नए जीवन का संचार करने वाले साबित होते जा रहे हैं। वरना तमाम लेखक इससे पहले तक हाशिये पर पड़े रह जाते थे, एक छोटे से दायरे में ये साहित्य और लेखन का संसार समाया हुआ था, किताबें छपवाने के लिए प्रकाशकों के आगे पीछे करने और छप जाने के बाद उसकी समीक्षा छपवाने की जोड़तोड़ में ही वक्त गुजर जाता था।
कुछ स्वांत सुखाए लिखने और अपनी किताबें छपवाने वाले लेखक भी आपको यहां मिल जाते हैं। पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रोफेसर गोविन्द शर्मा बताते हैं कि पिछले साल एनबीटी ने तीन करोड़ पुस्तकें बेचीं। यह संख्या सुनकर ताज्जुब भी हुआ लेकिन उनका कहना है कि पुस्तकों के छापने का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है, हर प्रकाशक ये दावा करता है कि उसकी बिक्री हर साल बढ़ रही है। हर बार प्रकाशकों की संख्या बढ़ रही है।
इसी बार 600 से ज्यादा प्रकाशक दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में आए जबकि सैकड़ों प्रकाशक ऐसे हैं, जिन्हें जगह नहीं मिल सकी। प्रोफेसर शर्मा के कार्यकाल में ये पहला विश्व पुस्तक मेला है। उन्होंने पिछले साल फरवरी में एनबीटी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली है। उन्हें लगता है कि पुस्तक मेले की इस संस्कृति ने लेखकों को व्यापक मंच दिया है। अब किताबें छपवाने की होड़ लगी है और लेखकों-प्रकाशकों का लक्ष्य होता है कि उनकी किताब मेले में आ जाए।
इसी बार एनबीटी ने मेले की जो थीम रखी, वह थी –‘महात्मा गांधी – लेखकों के लेखक’। एनबीटी के पवेलियन में बने मंच पर पूरे आठ दिन और रोजाना 5-6 सत्रों में गांधी जी के तमाम आयामों पर ही चर्चा होती रही। और तो और गांधी की 150वीं सालगिरह वर्ष पर आपको गांधी पर लिखने वाले सैकड़ों लेखक पिछले एक साल में नज़र आने लगे।
गांधी पर किताबें इतनी छपीं जितनी पहले कभी नहीं छपी थीं
गांधी पर किताबें इतनी छपीं जितनी पहले कभी नहीं छपी थीं। उसी तरह नरेन्द्र मोदी की महिमा में लिखी गई किताबों की संख्या भी कम नहीं रही। पिछले एक साल में ही छोटे बड़े प्रकाशकों ने मोदी के नाम पर सौ से ज्यादा किताबें छाप दीं। इन पुस्तक मेलों की यह भी एक बड़ी उपलब्धि कहिए कि इन्होंने लेखकों को भी वक्त के साथ चलना और बिकने की कला को समझना सिखाया है।
पिछले 30 सालों से एनबीटी से जुड़ी मौजूदा निदेशक नीरा जैन इसे एक बेहद उत्साहजनक आयोजन मानती हैं और कहती हैं कि जब हमने 1972 में इसकी शुरुआत की थी तो बहुत कम लोग आते थे। पहले ये मेला हर दूसरे साल होता था, लेकिन 2013 से हर साल होने लगा है। इसका दायरा दिल्ली से बढ़कर देश के तमाम शहरों तक पहुंच गया है। हर राज्य की राजधानियों में तो हर साल पुस्तक मेला लगता ही है, अन्य कई छोटे शहरों में भी इसकी पहुंच बढ़ी है।
मशहूर आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि साहित्यिक समारोहों जिसे लिट फेस्ट या लिटरेचर फेस्टिवल के नाम से जाना जाता है, वहां भी एक तरह से पुस्तक मेलों जैसा ही माहौल हो गया है, तमाम प्रकाशकों के स्टॉल्स वहां भी लगते हैं। खासकर इसके व्यावसायिक स्वरूप लेने और प्रायोजकों की जमात के शामिल हो जाने से किताबों का बाज़ार बढ़ा है और इसमें ग्लैमर एलिमेंट भी नजर आने लगा है। लेखक भी अब एक सेलिब्रिटी जैसा हो गया है। युवाओं में भी इन लिट फेस्ट की चमक दमक का असर दिखता है। ‘बेस्ट सेलर’ जैसे आकर्षक टर्म आ गए हैं और तमाम किताबें इस नाम पर खरीदी जाती हैं कि वो किसी बेस्ट सेलर लेखक या सेलिब्रिटी की हैं।
लेकिन ज्यादातर लेखक-प्रकाशक मानते हैं कि किसी बहाने सही, लेखकों की इज्जत तो बढ़ी, उनकी पहचान तो बनी और उनके लेखन पर चर्चा का मंच तो मिला। वरना आज जब मीडिया से साहित्य संस्कृति गायब है, लघु पत्रिकाओं की हालत खस्ता है, कोई व्यावसायिक साहित्यिक पत्रिका छापने की हिम्मत नहीं करता, ऐसे में पुस्तक मेले की यह संस्कृति बेशक एक संजीवनी की तरह है। निश्चित तौर पर लेखकों और प्रकाशकों के लिए यह एक स्वर्णिम युग जैसा है।