दूसरों को अलर्ट करते-करते खुद कोरोना से हार गए CRPF के इकराम, सुनें कहानी साथियों की जुबानी
इकराम हुसैन की कमान में ड्यूटी करने वाले सिपाही अरशद इकबाल और देबजीत बरूआ बहुत उदास हैं। दोनों का कहना है कि हमारे साहब जवानों का बहुत ख्याल रखते थे।
विस्तार
जहां ड्यूटी होती, तो वहां भी अपने जवानों के पास आकर पूछते, तबीयत सही है। कुछ दिक्कत है तो बताओ। ऐसे थे एसआई इकराम हुसैन, जो अपने जवानों को कोरोना से सचेत करते हुए खुद उसकी चपेट में आ गए।
इकराम हुसैन की कमान में ड्यूटी करने वाले सिपाही अरशद इकबाल और देबजीत बरूआ बहुत उदास हैं। ये दोनों अभी क्वारंटीन में हैं। काफी प्रयास करने के बाद ये दोनों फोन पर कुछ बोलने को तैयार हुए। दोनों का कहना था कि हमारे साहब जवानों का बहुत ख्याल रखते थे।
यूं कहें कि फोर्स की ड्यूटी कैसे दी जाती है तो ये उनसे सीखा जा सकता है। डेली ब्रीफिंग में वे सबसे पहले कोरोना की बात करते थे। आप ये कह सकते हैं कि इकराम साहब दस मिनट तक केवल कोरोना पर बोलते थे।
कहते थे, अगर किसी में कोई भी कोरोना का लक्षण हो तो छिपाना नहीं। मंडोली जेल पर उनके साथ रहे अरशद और देबजीत, बताते हैं कि 15 अप्रैल के आसपास किसी जवान को जुखाम हो गया था। साहब ने उन्हें ड्यूटी से हटाकर तुरंत डॉक्टर के पास भेजा।
वो मजाक, हम कैसे भूल सकते हैं
देबजीत बताते हैं कि दो सप्ताह पहले एक-दो जवानों को जब हल्की खांसी और जुखाम की शिकायत हुई, तो उस वक्त साहब चिंता में पड़ गए थे। साहब बोले, छोड़ो यार, कोई भी कोरोना की बात नहीं करेगा। पता नहीं, ये किसको ले बैठेगा। खतरनाक बीमारी है।
चूंकि उस वक्त कैंप में हम सब मौजूद थे तो हमने कहा, साहब जी, आप चिंता न करें। हम साथ हैं। हमने साहब को ही तसल्ली देनी शुरू कर दी। कुछ देर बाद इकराम साहब हंसे और बोले, मुझे डरा रहे हो। मैं तुम्हें चेक कर रहा था। ये मजाक था, जाओ ड्यूटी संभालो।
इकराम साहब ने बताया था कि मेरे दो लड़के हैं। एक असम पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहा है। मैं सोचता हूं कि दूसरा भी जॉब में हो जाए तो उनकी शादी कर दूंगा।
खजूरीखास और सीलमपुर जैसे इलाकों में नाके पर तैनात थे इकराम
अरशद इकबाल बताते हैं कि हम ढाई माह से खजूरीखास और सीलमपुर जैसे इलाकों में तैनात रहे हैं। मंडोली जेल के अलावा दिल्ली दंगों के दौरान भी हम साहब के साथ रहे थे। हमारे साहब, मन से ड्यूटी देने वाले व्यक्ति थे। क्या धर्म और क्या जाति, ये सब बातें तो उनसे कोसों दूर थी।
हमारे साथ जितने भी हवलदार सिपाही रहे, वे सभी चाहते थे कि उनकी ड्यूटी इकराम साहब की कमान में लगे। अगर कोई ड्यूटी से इधर उधर हुआ या देर हो गई तो वे अफसर वाला रौब नहीं झाड़ते थे। पहले बैठाकर समझाते थे।
अगर किसी को सजा देनी होती तो बहुत मामूली सी, जिसका सामने वाले को पता भी नहीं चलता, मगर उसे गलती का अहसास जरूर हो जाता था। सबकी जरूरतों का ख्याल रखते थे। किसी को पांच-छह घंटे भी कहीं जाना होता, तो वे अपनी जिम्मेदारी पर उसे जाने देते थे। इकराम साहब...यकीन नहीं होता कि आज वे हमारे बीच में नहीं हैं।