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CRPF Ops: 'नेटवर्क के लिए पेड़ पर मोबाइल, फिर मिलता था मैसेज'; पूर्व आईजी ने बताईं नक्सली इलाकों की चुनौतियां

Wed, 01 Apr 2026 10:59 AM IST
Jitendra Bhardwaj Jitendra Bhardwaj
Updated Wed, 01 Apr 2026 10:59 AM IST
सार

Naxal Operations: जंगल में ऊंचे पेड़ पर बाल्टी और रस्सी के सहारे मोबाइल पहुंचाए जाते थे। ऊपर पहुंचाए जाने पर फोन में नेटवर्क आता था। केवल संपर्क जुड़ने पर ही मैसेज पढ़ पाते थे। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं सुरक्षाबलों के सामने आने वाली चुनौतियों का बयान है। सीआरपीएफ के शीर्ष अफसर रहे पूर्व आईजी ने नक्सली इलाकों में रियल लाइफ ऑपरेशन के दौरान सामने आने वाले हालात बताए हैं।

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CRPF Ops Mobile phones on trees for network Former IG recounts challenges faced in Naxal-affected areas
केके शर्मा के बयान का अंश - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

देश के विभिन्न हिस्सों से 'नक्सलवाद' की समाप्ति हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में यह घोषणा कर दी है। कई दशकों से जारी नक्सलवाद के खात्मे में सुरक्षा बलों को कौन सी चुनौतियां का सामना करना पड़ा है, जंगल और पहाड़ों पर संचार की क्या स्थिति रही, एफओबी किस तरह कारगर साबित हुए और अब केंद्रीय सुरक्षा बलों को पूर्व के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कब तक तैनात रहना चाहिए, आदि सवालों के जवाब के लिए अमर उजाला डॉट कॉम ने कोबरा 'सीआरपीएफ' के पूर्व आईजी केके शर्मा से खास बातचीत की है। 

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सवाल: देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कब भेजा गया  
जवाब: सीआरपीएफ जवानों को 2003 में स्थायी तौर पर वहां भेजा गया। उससे पहले चुनाव में जाते थे। ये भी एक रोचक किस्सा है। पहले एक महीने के लिए दो बटालियन भेजने की बात हुई। जब गाड़ियों में सामान लदने लगा तो कहा तीन महीने ठहरेंगे। ऐसे ही तीन साल हो गए। फिर तैनाती का सिलसिला ऐसा चला कि वह अभी तक जारी है। अब वहां अस्सी बटालियन हैं। जंगल में हर तरह की समस्या थी।
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सवाल: नक्सल में खुफिया जानकारी जुटाना कितना बड़ा टॉस्क रहा। लोकल भाषा से अनजान थे जवान 
जवाब:
जब 2003 में वहां गए तो डीजी साहब से मिले। वे बोले, आपकी दो बटालियन हैं। बस्तर का इलाका 900 किलोमीटर का है। आप तीस किलोमीटर रोज चलें। इससे आपको सब पता चल जाएगा। मैने कहा, सर ये कैसे संभव होगा। खुफिया अलर्ट कैसे मिलेंगे। मुझे एडीजी के पास भेजा। उन्होंने कहा, शर्मा जी हमारे पास कोई 'इंटेलिजेंस' नहीं है। आप खुद एकत्रित करें और हमें भी दें। लोकल भाषा सीखने के लिए किताबें खरीदी। लोगों की मदद ली गई। 
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सवाल: घने जंगलों में 'संचार' की सुविधा कैसी थी, तब मोबाइल टावर भी नहीं थे, ये कितनी बड़ी चुनौती रही  
जवाब:
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति एक जैसी स्थिति नहीं थी। कहीं पहाड़, कहीं जंगल तो कहीं नदी नाले हैं। संचार की विकट स्थिति में मैसेज प्राप्त करना बड़ी चुनौती रही। मोबाइल में सिग्नल तो आता ही नहीं था। जंगल में ऊंचाई वाले पेड़ पर रस्सी बांधकर एक बाल्टी लटका दी जाती थी। उसमें मोबाइल फोन रखते और रस्सी खींच लेते। फोन ऊपर पहुंचता तो रेंज मिल जाती थी। कुछ देर बाद बाल्टी को नीचे लाते तो फोन में मैसेज मिलते थे। बस, संचार का यही तरीका था।  

सवाल: घने जंगल और पहाड़ पर 'आईईडी' ब्लास्ट, सुरक्षा बलों के लिए कितना बड़ा जोखिम रहा  
जवाब:
ये वाकई सबसे बड़ी चुनौती थी। आमने-सामने की फायरिंग में तो माकूल जवाब देते थे, लेकिन आईईडी तो कहीं भी लगाई जा सकती है। माइनिंग साइट से बारूद लूट लेते थे। इसे बनाना भी आसान था। नक्सली, इसे जंगल में उस रास्ते पर लगाते थे, जहां से सुरक्षा बलों की आवाजाही होती थी। कई अधिकारी और जवान, आईईडी ब्लास्ट में शहीद हो गए। 

सवाल: हमलों के बीच फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस 'एफओबी' स्थापित करना, कितना बड़ा टास्क रहा 
जवाब:
नक्सलियों का खात्मा करने में एफओबी बहुत कारगर साबित हुए हैं। एफओबी पर नक्सली, बीजीएल से हमला करते थे। इससे बचना पड़ता था। कई बार जेसीबी को ही जला देते थे। फिर भी सुरक्षा बल अपने दम पर एफओबी तैयार करते थे। टैंटों में ही रहना पड़ता था। सांपों का आना तो सामान्य था। कई महीने तक चलने वाले मलेरिया ने अनेक जवानों को अपनी जकड़ में ले लिया। एफओबी से जब सुरक्षा बलों के ऑपरेशन होने लगे तो आम जनता में विश्वास जगा। आसपास बसावट होने लगी। नक्सलियों को अपने ठिकाने छोड़कर भागना पड़ा।   

सवाल: एफओबी स्थापित होने के बाद कौन सी चुनौतियां सामने आई, जवानों ने इसे किस तरह लिया   
जवाब:
चुनौतियां इतनी थी कि उन्हें गिना नहीं जा सकता। सड़कों का तो नाम ही नहीं था। बरसात में दलदली रास्ता। सुरक्षा कैंप के आसपास पानी ही पानी। कच्चे रास्तों पर आईईडी और लोहे की कीलें दबी रहती थी। एंबुश का जोखिम तो हमेशा ही बना रहता था। राशन की गाड़ी दलदल में फंसती तो उसे जवान ही कैंप तक लाते थे। किसी जवान को छुट्टी जाना होता तो उसे  रेलवे स्टेशन तक पहुंचने में कई दिन लगते थे। 
 
सवाल: लोकल प्रशासन का सहयोग कितना मिलता था, सुरक्षा बलों को लेकर ग्रामीणों का नजरिया क्या रहा 
जवाब:
देखिये, लोकल प्रशासन की क्या बात करें। वहां तो सरकार और प्रशासन, सब नक्सलियों का था। लोकल पुलिस, नक्सलियों से लड़ने में सक्षम नहीं थी। यहां तक कि नक्सली, गांवों में अपनी अदालत लगाते थे। सीआरपीएफ ने जब वहां ऑपरेशन शुरु किया तो सरकारी विभागों ने वहां पहुंचने की हिम्मत दिखाई। शुरु में लोगों का सहयोग कम मिला, लेकिन बाद में सिविक एक्शन कार्यक्रमों के जरिए लोग, सुरक्षा बलों के साथ आने लगे। हमारे अफसरों और जवानों का यह हौसला कि राष्ट्र को नक्सल से मुक्त कराना है, उन्हें सभी बाधाओं के पार ले गया। 

सवाल: मुठभेड़ में मारे जाने वाले नक्सलियों का शव घटना स्थल पर नहीं छोड़ा जाता था, ऐसा क्यों  
जवाब:
प्रारंभ में नक्सली जब हमला करते थे तो वे अपने साथ दो तीन सौ गांव वालों को साथ लाते थे। अगर मुठभेड़ में कोई ग्रामीण मारा जाता तो नक्सली, दूसरे गांवों में भी यह मैसेज भेजते थे कि सुरक्षा बलों ने निर्दोष लोगों को मार दिया। लोगों की सहानुभूति लेने के लिए वहां पर एक स्मारक भी बनाया जाता था। जब एफओबी स्थापित हुए तो नक्सलियों के साथ लोगों का आना कम हो गया। ऐसे में डेड बॉडी उठाने वाले भी नहीं बचे। 
 
सवाल: एयर एंबुलेंस के बिना घायल जवानों को अस्पताल तक पहुंचाना, ये कितनी बड़ी चुनौती रही है    
जवाब:
ये बहुत चुनौतीपूर्ण काम था। चौपर में भी पूरी सुविधाएं नहीं थी। एयर एंबुलेंस तो कुछ समय पहले ही शुरु हुई है। कई बार घायल जवानों को घंटों तक जंगल में ही रखना पड़ता था। रास्ते में एंबुश का खतरा होता। इसके बावजूद रोड ओपनिंग पार्टी, तय रास्ते पर लगती और जोखिम का सामना करते हुए घायल को अस्पताल तक पहुंचाया जाता था। कई बार बीस-तीस किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।  


सवाल: नक्सलियों की समाप्ति के बाद कितने समय तक केंद्रीय बल वहां पर तैनात रहें, फोकस किस पर रहे  
जवाब:
अभी वहां सर्च ऑपरेशन चलेगा। आईईडी तलाशनी होंगी। ये वहां के ग्रामीणों और पशुओं के लिए सबसे बड़ा खतरा है। कम से कम एक साल तक केंद्रीय बलों को वहां से न बुलाया जाए। फोर्स के साथ जो सुविधाएं, वहां पहुंची हैं, वे जारी रहें। लोगों को पढ़ाई, दवाई और कमाई से जोड़ा जाए। अगर इन पर सरकार का फोकस रहता है तो समझो 'माओवाद', इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

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