सीआरपीएफ: जम्मू-कश्मीर के जंगलों में दहशतगर्दों का काल बनेंगे कोबरा कमांडो, पहली बार होगी घाटी में तैनाती
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विस्तार
जम्मू-कश्मीर के जंगलों में 'सीआरपीएफ' के कोबरा कमांडो, अब दहशतगर्दों का काल बनेंगे। सीआरपीएफ की 'कमांडो बटालियन फॉर रेजोल्यूट एक्शन (कोबरा) इकाई के इन जांबाजों को 'जंगल वॉरफेयर' का खासा अनुभव हासिल है। कोबरा यूनिट ने नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों की कमर तोड़ने में बड़ी भूमिका अदा की है। अब इस यूनिट को कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में लगाया जाएगा। कोबरा कमांडो का पहला बैच, जिसने जम्मू-कश्मीर के जंगलों में लड़ने का प्रशिक्षण पूरा कर लिया है, उसे कुपवाड़ा में तैनात किया गया है। सूत्रों का कहना है कि विभिन्न चरणों में कोबरा कमांडो की संख्या बढ़ाई जा सकती है। कोबरा के बारे में कहा जाता है कि ये कमांडो 'यूएस' मेरिन फोर्स को टक्कर देते हैं।
आतंक रोधी अभियानों में खुद को साबित किया है
छह माह पहले कोबरा यूनिट को जम्मू-कश्मीर में भेजा गया था। कमांडो की ट्रेनिंग अब पूरी हो गई है। हालांकि जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से 'सीआरपीएफ' तैनात है। वहां पर आतंकियों के खिलाफ विभिन्न ऑपरेशंस में सेना की राष्ट्रीय राइफल और पुलिस के साथ सीआरपीएफ भी रहती है। इस बल की 'क्यूएटी' ने आतंक रोधी अभियानों में खुद को साबित कर दिखाया है। सीआरपीएफ कमांडो, बहादुरी के कई कारनामों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। कोबरा यूनिट का गठन 'यूएस मेरिन कमांडो फोर्स' की तर्ज पर हुआ था। अब ये कमांडो, बहादुरी के कई कारनामों में यूएस मेरिन कमांडो से आगे निकल चुके हैं।
2015 में पहली बार नजर आए थे कोबरा कमांडो
साल 2015 में गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो राष्ट्र के सामने आए थे। कोबरा यूनिट का गठन करने से पहले यूएस मेरिन कमांडो, उनकी ट्रेनिंग, वर्किंग स्टाइल, सर्जीकल स्ट्राइक और दूसरे कई तरह के ऑपरेशन की जानकारी ली गई। इन सबके बाद ही कोबरा यूनिट स्थापित हुई थी। यह विशिष्ट कमांडो फोर्स जंगल में बिना किसी मदद के 11 दिन तक लड़ सकती है। इसी वजह से कोबरा विश्व में पहले स्थान पर है। नक्सलियों, आतंकियों से लड़ने और दूसरे बड़े ऑपरेशनों के लिए इस विशिष्ट फोर्स को खास तरह की ट्रेनिंग दी गई है। हथियार, वर्दी एवं तकनीकी उपकरणों के मामले में भी 'कोबरा' दूसरे सभी बलों से पूरी तरह अलग है। बिना किसी मदद के लगातार डेढ़ सप्ताह तक जंगलों में लड़ते रहना इस फोर्स की खासियत है।
यूएस मेरिन कमांडो से दो कदम आगे हैं कोबरा कमांडो
वैश्विक आतंकी संगठन, अलकायदा सरगना लादेन को मार गिराने वाले यूएस मेरिन कमांडो बिना किसी मदद के जंगल में लगातार तीन रातों तक लड़ सकते हैं। दूसरी ओर कोबरा के हर जवान के लिए ट्रेनिंग के दौरान सात दिन तक जंगल में लड़ने की परीक्षा पास करना अनिवार्य है। कोबरा ने सारंडा (झारखंड) के घने जंगलों में 11 दिन तक बिना किसी सहायता के एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था। वजन लेकर जंगल में नियमित रूप से लड़ते रहने का रिकॉर्ड ब्रिटेन के विशिष्ट कमांडो दस्ते 'एसएएस' के नाम पर है। यह दस्ता 30 किलो वजन उठाकर दस रातें जंगल में गुजार सकता है, जबकि कोबरा 23 किलो वजन के साथ 11 रातों तक गहन जंगल से गुजरने में समर्थ है।
जंगली सामग्री पर जीवित रहने का प्रशिक्षण
चूंकि कोबरा को बाहर से कोई मदद नहीं मिलती, इसलिए इन्हें खास प्रशिक्षण दिया जाता है। मैगी जैसी कोई खाद्य सामग्री इन्हें प्रदान की जाती है। पानी की बोतल को झरने या तालाब से भरना पड़ता है। खाने का सामान खत्म हो जाता है तो जंगली सामग्री से काम चलाना पड़ेगा। जवानों को ट्रेनिंग में कई जंगली वनस्पतियों की जानकारी दी जाती है। कोबरा कमांडो अपने जूते और वर्दी एक मिनट के लिए भी नहीं उतारते।
ये हैं कोबरा कमांडो की खासियतें
- यूएस मेरिन कमांडो की तर्ज पर कोबरा को मरपट (मेरिन पैटर्न) वर्दी मिलती है
- इसमें सभी तकनीकी उपकरण लगे होते हैं
- कोबरा कमांडो को यूएस आर्मी जैसा पैसजट (पर्सनल आर्मर सिस्टम-ग्राउंड टू्रप्स) हेलमेट
- यूएस के एम-1 हेलमेट के अलावा जर्मन आर्मी का ‘स्टेहेलम’ हेलमेट भी कोबरा की शान
- इस्राइल निर्मित एमटीएआर व एक्स-95 राइफल
- खुखरी की तर्ज पर कोबरा कमांडो ‘मैशे’ चाकू से लैस हैं
- जीपीएस के अलावा रात को दिखने में मदद करने वाला चश्मा