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जानवरों से भी फैलती हैं बीमारियां, प्लेग से गई थी एक करोड़ लोगों की जान

Wed, 25 Mar 2020 05:07 PM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Wed, 25 Mar 2020 05:07 PM IST
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coronavirus Pandemic : Disease can be spread from animal also, 10 million people died plague
जानलेवा है प्लेग - फोटो : PTI

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। भारत में संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस बीच गुजरात में घोड़ों में होने वाली ग्लेंडर बीमारी की खबर है। ऐसे में जानवरों में होने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। भारतीय इतिहास में चूहों के जरिए फैल चुकी प्लेग नामक बीमारी ने तो करीब 1 करोड़ लोगों की जान ले ली थी। जानवरों में होने वाली बीमारियां कौन-कौन सी हैं आइए जानते हैं इनके बारे में...


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वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। भारत में संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस बीच गुजरात में घोड़ों में होने वाली ग्लेंडर बीमारी की खबर है। ऐसे में जानवरों में होने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। भारतीय इतिहास में चूहों के जरिए फैल चुकी प्लेग नामक बीमारी ने तो करीब 1 करोड़ लोगों की जान ले ली थी। जानवरों में होने वाली बीमारियां कौन-कौन सी हैं आइए जानते हैं इनके बारे में...

ग्लेंडर: घोड़ों में होती है, इसका कोई वैक्सीन नहीं

ग्लेंडर बीमारी घोड़ों में होती है, विशेषज्ञों के मुताबिक इसका कोई वैक्सीन भी नहीं है। इसका वायरस हवा से फैलता है। इसमें शरीर की गांठों में संक्रमण के कारण घोड़े की मृत्यु हो जाती है। गांठों-ग्रंथियों को प्रभावित करने के कारण इसे ग्लेंडर बरखेलडेरिया मैलाई कहा जाता है।

गंभीरता बढ़ने पर इंसानों को इसके संक्रमण से बचाने के लिए घोड़ों को जहरीला इंजेक्शन देकर मारकर रिहाइशी इलाके से दूर दफना दिया जाता है। यही वजह है कि यह इंसानों के लिए भी जानलेवा है।

रिंडरपेस्ट: भैंस-बकरियों से फैलती है ये बीमारी

यह बीमारी खुर (क्लोवन-फुटेड) वाले जानवरों जैसे भैंस, भेड़, बकरियों, सूअर और जंगली जनवरों में ज्यादा पाई जाती है। इसका वायरस इन जानवरों की लार में मौजूद होता है। इसके अलावा इन जानवरों की आंखों, नथुनों से होने वाले स्त्राव (डिस्चार्ज) और मूत्र में भी यह वायरस पाया जा सकता है। इससे जानवरों के लिवर, तिल्ली संक्रमित हो जाती है।

जानवरों को दूषित पानी और चारा खिलाने से उनमें यह रोग पनपता है। इसके बाद उनसे इंसानों में फैलता है। इस संक्रमण से दुनियाभर में लाखों पशुओं की मौत होती है। यह संक्रमण 104 से 107 डिग्री फेरनहाइट के तापमान पर ज्यादा फैलता है। रोग निरोधक टीकों से इसका उपचार होता है।

रेबीज : मौत का कारण बनती है यह बीमारी

लोगों का आमतौर पर मानना होता है कि रेबीज केवल कुत्तों के काटने पर होता है। परंतु ऐसा नहीं है। यह बीमारी कुत्तों, बिल्ली, बंदरों, भेड़ियों आदि के काटने या अन्य किसी तरह के संपर्क में आने जैसे उनके नाखुन की खरोंच, लार आदि से हो सकती है।

पालतू जानवर के चाटने या खून के जानवर के लार से सीधे संपर्क से भी यह रोग फैलता है। इस वायरस के संपर्क में आने वाले इंसान में रेबीज के लक्षण एक सप्ताह या कई सालों बाद भी उभर सकते है। यह एक तरह का वायरल इंफेक्शन है।

समय रहते इसका इलाज ना होने पर यह जानलेवा साबित होता है। रेबीज का वायरस व्यक्ति के नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है। ये दिमाग में सूजन पैदा कर देते हैं, जिससे जल्द ही व्यक्ति कोमा में चला जाता है या उसकी मौत हो जाती है। 

आखिर इससे बचने का उपाय क्या है?
  • जानवरों के काटने पर काटे गए स्थान को तुरंत पानी व साबुन से अच्छी तरह धोएं फिर टिंचर या पोवोडीन आयोडिन लगाना चाहिए। 
  • इससे कुत्ते या अन्य जानवरों की लार में पाए जाने वाले कीटाणु सिरोटाइपवन लायसावायरस की ग्यालकोप्रोटिन की परतें धुल जाती हैं। 
  • जानवर के काटने के तुरंत बाद रोगी को टिटेनस का इन्जेक्शन जरूर लगवाना चाहिए। वैसे पहले रेबीज के 14 इंजेक्शन पेट में लगाए जाते थे, लेकिन अब संक्रमित व्यक्ति की बांह पर सिर्फ तीन इंजेक्शन लगाए जाते हैं।
  • यही वजह है कि पशु चिकित्सक लोगों को पहले से ही पालतू जानवरों को रेबीज के इंजेक्शन लगवाने की सलाह देते हैं।

निपाह: संक्रमित फलों को खाने से इंसानों में फैलता है ये वायरस

निपाह वायरस भी जानवरों से इंसान में फैलता है। हालांकि, ज्यादातर मामलों में यह फ्रूट बाइट यानि संक्रमित फल खाने से फैलता है। मान लीजिए किसी संक्रमित चमगादड़ या अन्य किसी संक्रमित पक्षी ने कोई फल खाया है और उसमें अपनी लार छोड़ दी है। ऐसे में उसने फल को भी संक्रमित कर दिया है। अब यही संक्रमित फल यदि कोई इंसान खा ले तो उसके संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे दिमागी बुखार का संक्रमण तेजी से फैलता है।

यह सावधानी रखें 
  • पेड़ों से गिरे फल खाने से बचना चाहिए।
  • स्वच्छता रखें। फलों को अच्छी तरह धोएं।
  • जंगल या जहां अधिक पेड़ हों ऐसी जगह से लौटने पर हाथों को अच्छी तरह धोएं।
  • संक्रमित लोगों से दूरी बनाकर रखें।

एंथ्रेक्स : जानवरों को बनाता है शिकार

एंथ्रेक्स प्राय: गायों, भेड़ों में होने वाला रोग है। बैक्टीरिया बैसिलस एन्थरैक्सिस से ये रोग होता है। यह मिट्टी में मौजूद रहता है और घरेलू या जंगली जानवरों को पहले अपना शिकार बनाता है। इस रोग में प्लीहा की वृद्धि हो जाती है और प्राय: 12 से 48 घंटे में रोगी की मृत्यु होने की बात कही जाती है। 

घरेलू या जंगली जानवर या मनुष्य संक्रमित धूल-मिट्टी के संपर्क में आते हैं, तो इस तरह यह रोग फैलता है। इसके उपचार के लिए टीका लगाया जाता है। बता दें कि 2001 में एंथ्रेक्स के खतरनाक बैक्टीरिया का प्रयोग कुछ लोगों द्वारा जैव-आतंकवाद (बायो टेररिज्म) के लिए किया गया था। कुछ अमेरिकी लोगों को ऐसे पत्र प्राप्त प्राप्त हुए थे जिनमें ये बैक्टीरिया मौजूद थे, इस कारण कई अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु हो गई थी।

प्लेग : बेहद घातक है इसका जीवाणु

प्लेग का जीवाणु चूहों/गिलहरियों या पिस्सुओं के जरिए इंसानों में फैलता है। यह येरसिनिया पेस्टिस/बेसीलुस पेस्टिस (पूर्व नाम-पेस्टूरेला पेस्टिस) नामक जीवाणु का संंक्रमण होता है। ब्यूबोनिक प्लेग इसका एक प्रचलित प्रकार है। वैसिलस पेस्टिस (पास्चुरेला पेस्टिस) की खोज 1894 में हॉन्गकॉन्ग के किटा साटो और यर्सिन ने की थी।

यह जीवाणु सीलन वाले स्थानों, कूड़ा-करकट तथा सड़ी-गली चीजों में जहांं गंदी बदबू तथा भाप निकलती है ऐसी जगहों पर पनपता है। चूहों/गिलहरियों के पिस्सुओं पर ये जीवाणु हमला करता है। पिस्सुओं के दंश यानि काटने से चूहों/गिलहरियों में होता है। फिर यह बीमारी चूहों/गिलहरियों से मनुष्यों तक पहुंचती है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वालों को यह जल्दी प्रभावित करता है।

यदि कोई पिस्सू सीधे किसी इंसान को काटता है तो उससे भी यह रोग हो सकता है। जब आदमी को पिस्सू काटते हैं, तो दंश में अपने अंदर भरा संक्रामक द्रव्य रक्त में उगल देते हैं। यदि आपके आसपास के इलाके में बड़ी संख्या में चूहे मर रहे हैं तो यह गंभीर बात हो सकती है। चूहों का मरना आरंभ होने के दो तीन सप्ताह बाद मनुष्यों में प्लेग फैलता है।

एक वक्त में चूहों का खात्मा ही था प्लेग का उपचार

बताया जाता है कि भारत में 19वीं शताब्दी में प्लेग फैला था। वर्ष 1815 में तीन वर्ष के अकाल के बाद गुजरात, कच्छ और काठियावाड़ में फिर, अगले वर्ष हैदराबाद (सिंध) और अहमदाबाद, साल 1836 में पाली (मारवाड़) से मेवाड़ तक प्लेग ने अपना प्रकोप दिखाया था।

इसके अलावा 1823 में केदारनाथ (गढ़वाल) में, 1834 से 1836 तक उत्तरी भारत के अन्य स्थलों पर और 1849 में दक्षिण भारत में प्लेग के मामले सामने आए। आंकड़ों के अनुसार 1898 से 1918 तक भारत में प्लेग की वजह से करीब एक करोड़ लोगों की जान गई। नई दवाओं के आने से पहले प्लेग का उपचार था, चूहों का खात्मा लेकिन आज रोकथाम के लिए प्लेग का टीका सक्षम है।
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