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तनाव से मस्तिष्क को करना पड़ता है संघर्ष, निराशा को खुद पर हावी न होने दें

Sat, 06 Jun 2020 02:27 PM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Sat, 06 Jun 2020 02:27 PM IST
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Coronavirus impact: Stress causes the brain to struggle, do not let despair dominate itself
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कोरोना वायरस महामारी के कारण मस्तिष्क को अत्यधिक तनाव के बीच काम करना पड़ रहा है। कई तरह की आशंकाओं और मानसिक आपाधापी से तनाव का स्तर बढ़ा है। मनुष्य और चूहों पर हुए अध्ययन में पता चला है कि तनाव के कारण मस्तिष्क की कोशिकाएं सिकुड़ जाती हैं। इससे दिमाग की कार्य क्षमता प्रभावित होती है। सिकुड़न का असर दिमाग की कोशिकाओं पर भी पड़ता है। सोचने की क्षमता भी प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि महामारी के बीच मस्तिष्क पर दबाव न दें। निराशा को हावी न होने दें।

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मस्तिष्क के तारों के गुच्छे पर दबाव न दें

अमेरिका के येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर डॉक्टर एमी कहती हैं, मनुष्य का मस्तिष्क उथल-पुथल के समय कठिन सोचने, योजना बनाने और याद रखने की भूमिका में कमजोर हो जाता है। इस स्थिति में कोई व्यक्ति हैरान परेशान है तो यह कोई अजूबा नहीं है एक जैविक क्रिया है मस्तिष्क तारों का गुच्छा है। जब उस पर अधिक भार पड़ेगा तो ऐसी चीजें होनी तय हैं। कई अध्ययनों में यह स्पष्ट हो चुका है कि तनाव बढ़ने से दिमाग के काम करने की क्षमता प्रभावित होती है। महामारी के बीच हमने देखा है कि लोग भविष्य की तैयारी कर रहे हैं। इस कारण दिमाग की कोशिकाओं में बदलाव दिख रहा है और पता चल रहा है कि वह कैसे काम कर रही है।
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तनाव से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजिस्ट और न्यूरोसाइंटिस्ट एलिजाबेथ फेल्पस बताती हैं कि हल्का तनाव प्रीफ्रंटल कार्टेक्स को बुरी तरह प्रभावित करता है। मानव मस्तिष्क कोशिकाओं का भंडार है जिसके बीच प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स रहता है। इसका काम सोचना, योजना बनाना, एकाग्रता कायम करना और सही काम का चुनाव करना होता है। यह हिस्सा धैर्य बनाने में मदद करता है लेकिन तनाव बढ़ने से हिस्सा बुरी तरह प्रभावित होता है। इसकी पुष्टि मनुष्य और जानवरों के मस्तिष्क पर हुए अध्ययन में हो चुकी है।
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मानसिक तनाव अच्छी योजना बनाने से रोकता है

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कॉगनिटिव न्यूरोसाइंटिस्ट डॉक्टर एंथनी वॉगनर बताते हैं कि उन्होंने 38 लोगों पर अध्ययन किया। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें एक स्थान पर पहुंचने को कहा गया। कुछ को बताया गया कि उन्हें रास्ते में शॉक भी लग सकता है जिन्हें शॉक की जानकारी नहीं थी वह शॉर्टकट से जल्दी स्थान पर पहुंच गए जबकि अन्य लोग गंतव्य तक देर में पहुंचे। इससे यह पता चला कि उनके मन में बिजली का झटका लगने का डर था। जिस कारण वह उस स्थान तक पहुंचने में शॉर्टकट के लिए योजना नहीं बना सके क्योंकि उनका मन तनाव में था।

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