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कोरोना का असर: 32 साल बाद देश में सुस्त पड़ी पोलियो टीकाकरण की रफ्तार, पाकिस्तान, बांग्लादेश से भी पिछड़ा भारत

Tue, 25 Jan 2022 03:31 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Tue, 25 Jan 2022 03:31 PM IST
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सार
यूनिसेफ के आंकड़ों बताते हैं कि 2019 की तुलना में 2020 में 12 से 23 महीने के बच्चों को दी जाने वाली पोलियो टीके की तीसरी खुराक में पांच फीसदी की कमी आई है। यह 1991 के बाद से खुराक में सबसे अधिक कमी है। करीब 85 फीसदी के कुल कवरेज के लिहाज से देश का पोलियो टीकाकरण 2014 के स्तर पर चला गया...
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Coronavirus impact: After 32 years polio vaccination slows down in country, Pakistan, Bangladesh ahead from India
पोलियो वैक्सीन - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नरेंद्र मोदी सरकार ने कोविड-19 से बचाव के लिए 15-18 साल के किशोरों को कोवॉक्सिन के टीके देने की पेशकश की है। लेकिन कोरोना महामारी के चलते देश में गैर-कोविड टीकाकरण अभियान की रफ्तार थम सी गई है। यूनिसेफ द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2020 में देश में टीकाकरण अभियान बुरी तरह प्रभावित हुआ क्योंकि सभी प्रमुख टीकाकरण अभियान का कवरेज काफी कम रहा। देश में टीकाकरण कार्यक्रम के प्रभावित होने की प्रमुख वजहों में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। वही भारत गैर कोविड टीके लगाने के मामले में पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पिछड़ा हुआ नजर आ रहा है।



भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी। इस कार्यक्रम के तहत देश में नवजात शिशुओं और बच्चों को सात बीमारियों, डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, पोलियो, खसरा, बच्चों को होने वाले तपेदिक का गंभीर रूप, हेपेटाइटिस बी, हेमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी (एचआईबी) और डायरिया से बचाने के लिए टीके लगाए जाते हैं।

1991 के बाद पहली बार पोलियो के टीके में आई कमी

यूनिसेफ के आंकड़ों बताते हैं कि 2019 की तुलना में 2020 में 12 से 23 महीने के बच्चों को दी जाने वाली पोलियो टीके की तीसरी खुराक में पांच फीसदी की कमी आई है। यह 1991 के बाद से खुराक में सबसे अधिक कमी है। करीब 85 फीसदी के कुल कवरेज के लिहाज से देश का पोलियो टीकाकरण 2014 के स्तर पर चला गया। इसी तरह डीपीटी (डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस) के मामले में 12-23 महीने के बच्चों को दी जाने वाली पहली खुराक में सात फीसदी की कमी आई है। यह भी 1991 के बाद से सबसे अधिक गिरावट है। आखिरी बार डीपीटी टीके में कमी (एक फीसदी की) 2006 में दर्ज की गई थी। पिछले साल की तुलना में तपेदिक (टीबी) के टीके भी सात फीसदी कम ही लगे। आखिरी दफा 2007 में यह टीका कम लगा था।

कोरोना महामारी के कारण कम हुई रफ्तार

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में बच्चों में केवल रोटावायरस टीके और नए न्यूमोकोकल टीके के कवरेज में तेजी देखी गई। करीब 12-23 महीने के बच्चों के लिए रोटावायरस टीके के कवरेज में 29 फीसदी की तेजी आई और यह 53 फीसदी से बढ़कर 82 फीसदी हो गया, जबकि न्यूमोकोकल टीके में बढ़ोतरी 2019 और 2020 के बीच 15 फीसदी से 21 फीसदी रही। देश के टीकाकरण कार्यक्रम के तहत सभी जिलों को 1989-90 तक कवर करना था। देश सभी टीकाकरण मानकों पर प्रगति कर रहा था, लेकिन महामारी की वजह से इसकी रफ्तार में कमी आई।

बांग्लादेश और पाकिस्तान के मुकाबले भी भारत का प्रदर्शन खराब

भारत की अन्य देशों से तुलना में यह सामने आया है कि भारत का प्रदर्शन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच खराब है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के बीच टीबी के टीके में गिरावट के लिहाज से भारत मैक्सिको, ब्राजील और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से पीछे है। जबकि कोरोना महामारी वर्ष के दौरान टीकाकरण कवरेज बढ़ाने के लिहाज से भी दक्षिण एशिया के देशों यहां तक कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तुलना में भी भारत का प्रदर्शन ठीक नहीं है। वर्ष 2020 में कोरोना महामारी की चुनौतियों के बीच लॉकडाउन और लोगों तक पहुंचने की बाधाओं के बावजूद टीबी का टीका लगाने में बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश अव्वल रहे हैं।


हेपेटाइटिस-बी टीके की बात करें तो भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया से पीछे है। दक्षिण एशिया क्षेत्र में डीपीटी टीकाकरण में भारत के बाद सबसे खराब प्रदर्शन केवल पाकिस्तान और नेपाल का ही रहा। खसरा और रूबेला टीके के लिहाज से ब्राजील और इंडोनेशिया का प्रदर्शन खराब रहा। टीकाकरण कार्यक्रम के प्रभावित होने की प्रमुख वजहों में से एक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर असर पड़ता है, जिसमें सरकारी टीकाकरण अभियान भी शामिल है।

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