कोरोना काल में वो चूक : जिसने देश को मुसीबत में डाल दिया, तीसरी लहर होगी रोंगटे खड़े करने वाली
मेडिकल एक्सपर्ट का कहना है कि कोरोना की पहली लहर के दौरान सरकार से भारी चूक हो गई है। ये सवाल तो उठेगा ही कि एकाएक सब कुछ सामान्य करने की गलती किससे हो गई। क्या सरकार के डॉक्टर, वैज्ञानिक और दूसरे सलाहकार यह नहीं जानते थे कि कोरोना वायरस अभी देश से बाहर नहीं गया है।
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देश में कोरोना संक्रमण को लेकर आरोप प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दल एवं मेडिकल पेशे से जुड़े कई लोग यह बात कहते हैं कि केंद्र सरकार की एक चूक के कारण आज देश मुसीबत में फंस गया है। अभी तक तो दूसरी लहर की संक्रमण चेन नहीं टूट सकी है और तीसरी लहर ऐसी बताई जा रही है, जिसके बारे में सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
मेडिकल एक्सपर्ट का कहना है कि कोरोना की पहली लहर के दौरान सरकार से भारी चूक हो गई है। ये सवाल तो उठेगा ही कि एकाएक सब कुछ सामान्य करने की गलती किससे हो गई। क्या सरकार के डॉक्टर, वैज्ञानिक और दूसरे सलाहकार यह नहीं जानते थे कि कोरोना वायरस अभी देश से बाहर नहीं गया है।
वैक्सीन को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। कोरोबार से लेकर ट्रांसपोर्ट, कार्यालय, शिक्षण संस्थान सब एक साथ खुल गए। कोरोना की पहली लहर के दौरान देश में स्वास्थ्य सेवाओं का जो दायरा था, उसे बढ़ाना भूल गए। सैंकड़ों कोविड केयर सेंटर दोबारा से सामान्य अस्पतालों में तबदील हो गए। वहां सामान्य बीमारियों वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाने लगी। अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन की अग्रिम तैयारी करना याद नहीं रहा।
पहली लहर के बाद तैयारी का समय था : गुलेरिया
एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया यह बात मानते हैं कि पहली लहर के बाद तैयारी का समय था। अब हम ऐसे चक्रव्यूह में फंसे हैं कि भारी दबाव के चलते स्वास्थ्य आधारित संरचना को एकाएक अपडेट नहीं कर सकते। बता दें कि गत वर्ष सेना, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों व दूसरे प्रादेशिक संस्थानों में कोविड केयर सेंटर खोले गए थे।
इनमें से कई सेंटरों पर तो आम लोग भी इलाज करा सकते थे। इसी तरह छोटे शहरों में भी डॉक्टरों को कोविड19 से निपटने के लिए ट्रेनिंग दी गई। इस साल जनवरी में 5536 लोग कोरोना के चलते मारे गए। फरवरी में 2,777 और मार्च 5,417 लोगों की जान चली गई। इसका मतलब कोरोना वायरस देश में मौजूद था।
लगातार ऐसी रिपोर्ट आ रही थी कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर आ सकती है। उस वक्त विशेषज्ञों ने यह संभावना भी जताई थी कि कोरोना की तीसरी लहर भी संभव है। दूसरी लहर का पीक क्या रहेगा, इस तरह की रिपोर्ट भी सरकार के पास रही हैं। अप्रैल में 45 हजार से ज्यादा लोग कोरोना की वजह से मारे गए हैं, जबकि मई के पहले तीन दिनों में यह संख्या 10,629 रही है।
लॉकडाउन के काम नहीं चल सकता : डॉ. राहुल पंडित
महाराष्ट्र टॉस्क फोर्स के सदस्य डॉ. राहुल पंडित कहते हैं कि आज बिना लॉकडाउन के काम नहीं चल सकता। दूसरी लहर के कहर से पहले सरकार के पास तैयारी का पर्याप्त समय था। उस समय सरकार को वर्क फोर्स, बेड, ऑक्सीजन सप्लाई, कोरोना वैक्सीन और मेडिकल उपकरणों व दवा आदि के बारे में सोचना था।
अब तीसरी लहर के बारे में बताया जा रहा है कि उसमें एक साथ कोरोना के कई स्ट्रेन लोगों को अपनी चपेट में ले लेते हैं। उनके संक्रमण की रफ्तार मौजूदा स्ट्रेन से कई गुणा अधिक बताई गई है। वह एयरबोर्न से आगे की स्थिति बताई जा रही है। अगर मौजूदा समय में दूसरी लहर पर नियंत्रण नहीं होता है तो तीसरी लहर के कहर को शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
कोविड संक्रमण की चेन तोड़ना चुनौती
डॉ. रणदीप गुलेरिया के अनुसार, अब चुनौती ये है कि कोविड की संक्रमण चेन कैसे तोड़ी जाए। मेडिकल फोर्स अपनी क्षमता से बहुत आगे जाकर काम कर रही है। डॉक्टर दबाव में हैं। जिस तरह से लोग मारे जा रहे हैं, उससे डॉक्टरों एवं दूसरे मेडिकल कर्मियों को गहरा आघात लगता है। शुरू में कोरोना का स्पाइक कम था, इसे लोगों ने यह समझा कि अब कोरोना के नए केस नहीं आएंगे।
कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए जो विशेष अस्पताल बनाए गए थे, वहां सामान्य ओपीडी शुरू हो गई। कोविड केयर सेंटर पर ध्यान खत्म हो गया। नतीजा, अब दूसरी लहर में हम मुसीबत में फंसते जा रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी के चिकित्सक रहे डॉ. मोहसिन वली बताते हैं, मेडिकल आधारित ढांचे पर जो दबाव है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
जनवरी से लेकर मार्च तक सरकार के पास संभलने का बहुत वक्त था। डॉक्टरों के साथ जूनियरों की एक दूसरी वर्क फोर्स खड़ी की जा सकती थी। ऐसे मेडिकल स्टूडेंट या पेरामेडिकल स्टाफ जो अपने कोर्स या डिग्री के फाइनल वर्ष में हैं, उन्हें ट्रेनिंग देकर तैयार किया जा सकता था। इसके लिए उन्हें इन्सेंटिव दिया जा सकता है। एमडी में दाखिले के लिए कोई छूट दी जा सकती थी।
सरकार के पास संभलने का टाइम था
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में मेडिकल निदेशक के पद पर कार्यरत एक अधिकारी बताते हैं, दिसंबर 2020 से लेकर मार्च 2021 तक सरकार के पास संभलने का टाइम था। कई बलों में कोविड केयर सेंटर शुरू किए गए थे। बाद में उन्हें खत्म कर दिया गया। अब देश के छोटे शहरों और कस्बों में कोरोना महामारी को देखते हुए सरकार ने एम्स की मदद से प्रादेशिक ट्रेनिंग सेंटर खोलने का फैसला लिया है।
डॉक्टर रणदीप गुलेरिया के अनुसार, यहां पर कोविड-19 को लेकर डॉक्टरों को ट्रेनिंग दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिट डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस एल नागेश्वर राव और एस रवींद्र भट्ट भी शामिल थे, उन्होंने रविवार को मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र से कहा है कि दो सप्ताह के भीतर मरीजों को अस्पतालों में भर्ती करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
इस नीति को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा किया जाए। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में यह बात मानी है कि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान मरीज को अस्पताल में बेड दिलाना, लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।