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कोरोना वायरस: डेल्टा, गामा ने एंटीबॉडी घटाईं, पर टीका पूरी तरह बेअसर नहीं
Mon, 14 Jun 2021 06:23 AM IST
Kuldeep Singh
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Kuldeep Singh
Updated Mon, 14 Jun 2021 06:23 AM IST
सार
- पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) के वैज्ञानिकों का कहना है कि नए वैरिएंट डेल्टा और गामा का असर समझने के लिए उन्होंने 20 ऐसे व्यक्तियों के सैंपल लिए जिन्हें हाल ही में कोरोना हुआ था और उनमें नया वैरिएंट पाया गया। वैज्ञानिकों ने कहा, मार्च से मई महीने के बीच दूसरी लहर में दोबारा संक्रमण के मामले आए लेकिन हालत गंभीर नहीं हुई।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
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विस्तार
कोरोना वायरस के डेल्टा और गामा वैरिएंट ने भारत सहित दुनिया के कई देशों में तबाही मचाई है। दूसरी लहर के दौरान जहां भारत में ज्यादातर मामले डेल्टा वैरिएंट से जुड़े पाए गए। वहीं यूके में इस वैरिएंट के चलते हालात सामान्य से असामान्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
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वैज्ञानिकों ने कहा, मार्च से मई महीने के बीच दूसरी लहर में दोबारा संक्रमण के मामले आए लेकिन गंभीर नहीं हुई हालत
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इन वैरिएंट ने एंटीबॉडी के स्तर को कम किया है जिसकी वजह से मरीज दो-दो बार भी सब कोरोना संक्रमित हुए हैं। इससे पता चलता है कि वैक्सीन कि एंटीबॉडी को भी नए वैरिएंट ने काम किया है लेकिन अध्ययन में पता चला है कि इन नए वैरिएंट के आक्रामक होने के बाद भी भारतीय वैक्सीन असरदार हैं।
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पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) के वैज्ञानिकों का कहना है कि नए वैरिएंट का असर समझने के लिए उन्होंने 20 ऐसे व्यक्तियों के सैंपल लिए जिन्हें हाल ही में कोरोना हुआ था और उनमें नया वैरिएंट पाया गया।
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इसी तरह 17 लोगों के सैंपल लिए गए जिन्हें 28 दिन के अंतराल में कोवाक्सीन की दोनों खुराक दी गई थीं। इन सैंपल की जांच में पता चला कि इनमें एंटीबॉडी 3 महीने भी नहीं टिक सकीं।
ब्रेक थ्रू के मामले काफी बढ़े
अध्ययन में यह पता चला है कि एंटीबॉडी घटने के बाद भी कोवाक्सीन विषाणुओं से लड़ता रहा और उसने मरीज को गंभीर स्थिति में जाने नहीं दिया। एनआईवी की डॉ. प्रज्ञा यादव ने बताया कि अध्ययन के दौरान यह स्पष्ट है कि नए वैरिएंट एंटीबॉडी को कम कर रहे हैं।
इसका नुकसान यह है कि री इन्फेक्शन और ब्रेक थ्रू (टीकाकरण के बाद संक्रमण) के मामले काफी बढ़े हैं। लेकिन वैक्सीन लेने वालों में यह अधिक गंभीर नहीं हुआ है जिससे पता चलता है कि नए वैरिएंट पर भी वैक्सीन असरदार है।
नए वैरिएंट का असर पड़ा
यूके पब्लिक हेल्थ ने भी बताया था कि डेल्टा वैरिएंट पर एस्ट्राजेनेका कंपनी की वैक्सीन (कोविशील्ड) 60 से 63 फीसदी ही काम कर पा रही हैं। जबकि फाइजर, मॉडर्ना, बायोकॉन इत्यादि कंपनी की वैक्सीन पर भी नए वैरिएंट का असर पड़ा है। इसके बाद यूके सरकार ने भी कोविशील्ड की दो खुराक के बीच 90 दिन के अंतराल को घटाकर छह से आठ सप्ताह रखा है। जबकि भारत ने 1 महीने पहले ही इस अवधि को बढ़ाकर 16 सप्ताह तक किया है।
पांच गुना तक एंटीबॉडी कम हुई
अध्ययन में पता चला है कि जिन लोगों को पहली लहर में कोरोना और उनके शरीर में एंटीबॉडी विकसित हुई थी। उन लोगों में दूसरी लहर के दौरान जब नए वैरिएंट की वजह से संक्रमण हुआ तो एंटीबॉडी का स्तर पर पांच गुना तक कम देखने को मिला। ठीक इसी तरह जिन्होंने कोवाक्सिन की दोनों खुराक ली थीं उनमें 3 गुना तक एंटीबॉडी कम पाए गए। इसके बाद भी उन लोगों की स्थिति गंभीर नहीं हुई।