कोरोना वैक्सीन भी नजदीकी समय में महामारी रोकने में नहीं होगी कारगर, बचाव ही ब्रह्मास्त्र: एमसी मिश्रा
- विशेषज्ञ के मुताबिक, आरएनए आधारित वायरस के बदलते स्वरूप के कारण सटीक वैक्सीन विकसित करना बेहद कठिन, वैक्सीन विकसित होने के बाद भी इसकी सटीकता सामने आने में लगेगा समय
- दिल्ली के सीरों सर्वे का परिणाम- दिल्ली में हुआ सामुदायिक प्रसार
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विस्तार
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिश्रा ने कहा है कि कोरोना महामारी को रोकने में वैक्सीन भी जल्द समय में कारगर नहीं रहेगी। वैक्सीन के आने में अभी भी छह महीने तक का समय लग सकता है, तब तक कोरोना संक्रमण अपने पूरे वेग में जारी रहेगा।
वैक्सीन आने के बाद भी इसकी सटीकता आने में समय लग सकता है, इसलिए तब तक कोरोना से बचने में केवल 'बचाव' को ही अंतिम उपाय मानकर चलना चाहिए और शारीरिक दूरी बनाए रखने और मास्क पहनने के नियमों का पूरा-पूरा पालन करना चाहिए।
डॉ. एमसी मिश्रा ने कहा कि आरएनए आधारित वायरस की वैक्सीन बनाना बहुत मुश्किल काम होता है। ये वायरस अक्सर अपना स्वरूप बदलते रहते हैं और इस कारण इस बात की संभावना हमेशा बनी रहती है कि वैक्सीन विकसित होने के बाद भी वह संक्रमण रोकने में अपेक्षा के मुताबिक़ सफल न रहे।
वैक्सीन लगाने के बाद किसी व्यक्ति में किस मात्रा में एंटीबॉडी बनते हैं और वे शरीर के अंदर कब तक टिकते हैं, कोरोना संक्रमण पर रोक इन चीजों पर भी निर्भर करती है। इसलिए इन मानकों पर खरा उतरने के पहले वैक्सीन को अंतिम नहीं माना जा सकता। इन मानकों पर खरा उतरने के लिए वैक्सीन को परीक्षणों के कई दौर से गुजरना पड़ेगा।
थर्ड स्टेज में पहुंचा कोरोना
दिल्ली के सीरो सर्वे में यह बात सामने आई है कि यहां की लगभग एक चौथाई आबादी कोरोना संक्रमित हो चुकी है। यह न्यूनतम 40 लाख आबादी के बराबर होता है। डॉ. एमसी मिश्रा ने कहा कि इतने लोगों का अनजाने में ही कोरोना संक्रमित होना इस बात का प्रमाण है कि यहां संक्रमण अपने थर्ड स्टेज या कम्युनिटी ट्रांसमिशन स्टेज में पहुंच चुका है। हालांकि, सर्वे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सर्वे सैंपल किस तरह की एरिया से लिए गये हैं। दिल्ली और मुंबई का अनुभव बताता है कि कोरोना झुग्गी क्लस्टर एरिया में ज्यादा आक्रामक रहा है जबकि पॉश एरिया में इसका असर कम रहा है।
अभी कोरोना के सर्वोच्च के बारे में नहीं कह सकते
दिल्ली में जून महीने में कोरोना काफी भयावह रूप धारण कर चुका था। रोज लगभग पांच हजार केस सामने आ रहे थे और लगभग सौ लोगों की रोज मौत हो रही थी। लेकिन कई दिनों से दिल्ली में कोरोना संक्रमण के कम पॉजिटिव मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में क्या यह माना जा सकता है कि दिल्ली में कोरोना का सर्वोच्च समय निकल चुका है?
डॉ. एमसी मिश्रा का कहना है कि अभी इस बात को सौ फीसदी नहीं कहा जा सकता कि कोरोना का सर्वोच्च काल निकल चुका है। इस समय कोरोना की टेस्टिंग कम कर दी गई है, यह इस कारण से भी हो सकता है। लेकिन अगर अगले 15 दिनों तक कोरोना संक्रमण के मामले इसी रफ्तार से सामने आते हैं तब यह कहा जा सकेगा कि कोरोना का सर्वोच्च बिंदु निकल चुका है।
सबका अलग-अलग होगा पीक प्वाइंट
देश के सभी राज्यों में कोरोना अलग-अलग गति से आगे बढ़ रहा है। सभी जगहों पर टेस्टिंग की क्षमता भी अलग है और उसी रफ्तार से टेस्टिंग भी हो रही है। इसलिए अलग-अलग राज्यों में कोरोना संक्रमण की स्थिति भी अलग-अलग तरीके से सामने आ रहा है, इसलिए कोरोना का सर्वोच्च बिंदु भी अलग-अलग सामने आएगा।
जैसे दिल्ली और मुंबई में कोरोना के मामले सबसे पहले तेजी के साथ बढ़े, लेकिन अब इन जगहों पर धीरे-धीरे कमी आ रही है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में कोरोना के मामले अब ज्यादा सामने आ रहे हैं। सभी राज्यों की स्थिति सामने आने में अभी भी तीन महीने तक का समय लग सकता है।
डरने की आवश्यकता नहीं
दिल्ली के सीरो सर्वे में उन लोगों से सैंपल लिए गये थे जो बिलकुल स्वस्थ थे। लेकिन उनके शरीर में कोरोना के एंटीबॉडी पाए गये थे। इससे स्पष्ट होता है कि ये लोग अनजाने में ही कोरोना की चपेट में आ गये और इसके बाद अपनी इम्युनिटी पॉवर से ठीक भी हो गये।
अनुमानत: यह आंकड़ा 40 लाख लोगों का भी हो सकता है। इससे यह सकारात्मक नतीजे निकाले जा सकते हैं कि कोरोना से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन इसके संक्रमण की चपेट में आने से बचने के लिए मास्क लगाना और शारीरिक दूरी बनाए रखना आवश्यक है।
सीरो सर्वे में आये ये परिणाम
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज एंड कण्ट्रोल ने दिल्ली सरकार के सहयोग से राजधानी में 27 जून से 10 जुलाई के बीच सर्वे किया। इसके लिए राजधानी के सभी 11 जिलों से 21387 लोगों के रक्त के नमूने लिए गए। एलिसा टेस्टिंग के जरिए IgG एंटीबाडी की जांच की गई। यह इस तरह का देश का पहला सर्वे था।
सर्वे के परिणाम बताते हैं कि 23.48 फीसदी लोगों में IgG एंटीबाडीज पाए गए यानी ये लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके थे। इनमें से ज्यादातर लोग कोरोना के लक्षण से रहित थे यानी उनमें बाहर से दिखने वाले कोरोना के गंभीर लक्षण नहीं दिखे। दिल्ली जैसे काफी सघन आबादी में कोरोना काल के छ: महीने के बाद भी केवल 23.48 फीसदी लोगों के संक्रमित होने को सरकार लॉक डाउन, कनटेमेंट जोन बनाने और अन्य क़दमों के सकारात्मक परिणाम मान रही है।
हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने माना है कि अभी भी काफी बड़ी आबादी कोरोना संक्रमण के लिए ज्यादा संवेदनशील है और इसकी वजह से कंटेनमेंट जोन बनाने, मास्क लगाने और शारीरिक दूरी बनाए रखें जैसे नियमों का पालन आवश्यक माना गया है।