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कोरोना महामारी: डायरिया-सेप्सिस से बढ़ीं मौतें, 60 फीसदी से कम पहुंचे अस्पताल

Fri, 13 Aug 2021 06:35 AM IST
देव कश्यप परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Fri, 13 Aug 2021 06:35 AM IST
सार

  • महामारी के चलते 65 फीसदी निमोनिया, 62 फीसदी अस्थमा और 44 फीसदी सेप्सिस के रोगी अस्पताल ही नहीं पहुंच सके
  • अस्पतालों में दर्ज गंभीर कुपोषण के मामलों में इस साल 53 फीसदी की कमी हुई 

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Corona Pandemic deaths due to diarrhea and sepsis increased less than 60 percent reached the hospital
सिविल अस्पताल में भर्ती बच्चे (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आजादी के बाद से ही भारत बच्चों की गंभीर बीमारियों से लड़ रहा है लेकिन कोरोना महामारी और इसके चलते स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभावित होने से चुनौतियों को और अधिक गंभीर कर दिया है।  हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे मलेरिया, निमोनिया, दस्त, एचआईवी और तपेदिक जैसे संक्रामक रोगों की चपेट में आते हैं। जबकि इनसे बड़ी आयु के बच्चे गैर-संचारी रोग और चोट इत्यादि की वजह से अस्पतालों में भर्ती होते हैं। यूनिसेफ के ही अनुसार साल 2018 में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में लगभग 29 फीसदी वैश्विक मौतों के लिए निमोनिया, डायरिया और मलेरिया जिम्मेदार थे। इन बच्चों का समय पर इलाज जरूरी है लेकिन कोविड-19 महामारी के चलते देश में लड़खड़ाई स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते अस्पतालों में भर्ती होने वाले बच्चों में भारी गिरावट आई है। 

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के ही अनुसार साल 2020 और 2021 (कोविड काल) की तुलना में डायरिया और सेप्सिस से बच्चों की मौतें बढ़ी हैं। इतना ही नहीं हर साल देश में लाखों की संख्या में बच्चे निमोनिया सहित अन्य बीमारियों के चलते अस्पतालों में दाखिल होते हैं लेकिन कोरोना महामारी के चलते 65 फीसदी निमोनिया, 62 फीसदी अस्थमा और 44 फीसदी सेप्सिस के मामले कम हुए हैं। इनके अलावा अस्पतालों में दर्ज गंभीर कुपोषण के मामलों में इस साल 53 फीसदी की कमी आई है। जबकि इससे होने वाली मौतें शहरी अस्पतालों में पांच फीसदी ज्यादा दर्ज की गई हैं और ग्रामीण अस्पतालों में 59 फीसदी कम मौतें दर्ज की गई हैं।  
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इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि जनवरी 2020 से मई 2021 के बीच 0 से पांच और 10 वर्ष तक की आयु के बच्चों की स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर रुप से प्रभावित हुई हैं। देश के दो लाख से भी अधिक सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों से एकत्रित इन आंकड़ों के मुताबिक साल 2020 और 2021 के बीच गंभीर श्वास रोगों से ग्रस्त बच्चों के पंजीयन में 59 फीसदी तक की गिरावट आई है। वहीं अन्य वर्षों की तुलना में मलेरिया के 51 फीसदी से भी अधिक मामले कम दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इन गंभीर बीमारियों को लेकर अगर 50 फीसदी तक केस कम दर्ज किए जाते हैं तो इससे मौत की आशंका कई गुना अधिक बढ़ जाती है क्योंकि इन बीमारियों की मृत्युदर कोरोना से भी काफी अधिक है। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान डायरिया से होने वाली मौतें 12 फीसदी तक बढ़ी हैं। अस्पतालों में दर्ज इन मामलों में 0 से पांच साल तक की आयु के बच्चे शामिल हैं।  
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डेढ़ साल से घटते जा रहे मरीज
एनएचएम के अनुसार जनवरी 2020 में देश भर के अस्पतालों में 56497 बच्चे निमोनिया की शिकायत के चलते भर्ती हुए लेकिन इसके बाद यह आंकड़ा मार्च में 39949 और अप्रैल में 11349 रह गया। इस दौरान कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन लगा था और सिंतबर 2020 में 12533 बच्चे भर्ती हुए। इसके बाद फरवरी 2021 में यह संख्या बढ़कर 20679 पहुंची लेकिन इसके बाद दूसरी लहर आने के चलते मई माह में औसतन 10844 बच्चों को ही निमोनिया की वजह से भर्ती किया गया। यह स्थिति तब है जब देश में निमोनिया के चलते सालाना 50 हजार से अधिक बच्चों की मौतें हो रही हैं। इसी तरह डायरिया की बात करें तो जनवरी 2020 में 2600 से ज्यादा मामले दर्ज हुए थे लेकिन मई 2021 में यह 1500 से भी कम दर्ज किए गए।

टीका निवारक रोगों की हालत भी गंभीर
अगर टीका निवारक रोगों की बात करें तो यह भी बच्चों में काफी गंभीर हुए हैं। डिप्थीरिया के 36, काली खांसी के 62 और बच्चों में टीबी के 30 फीसदी मामलों में कमी आई है। शहरी क्षेत्रों में डिप्थीरिया के 10 फीसदी मामले बढ़े हैं। जबकि ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों में 51 फीसदी की कमी आई है। इसी तरह टीबी की बात करें तो शहरी क्षेत्रों में 60 फीसदी मामले बढ़े हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में 43 फीसदी मामले घटे हैं। 

खसरा से 267 फीसदी बढ़ीं मौतें
अस्पतालों में खसरा 59 फीसदी मामले कम दर्ज हुए हैं लेकिन एक से पांच वर्ष की आयु वाले बच्चों में खसरा की वजह से मौतें शहरी क्षेत्रों में 267 फीसदी ज्यादा रिपोर्ट हुई हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 48 फीसदी मौतें कम दर्ज की गई हैं। इन मरीजों का उपचार घरों में चल रहा था या फिर वर्तमान स्थिति क्या है? इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसी तरह डायरिया से शहरी क्षेत्रों में एक साल से कम आयु में 42 फीसदी और एक से पांच साल के बच्चों में 121 फीसदी मौतें बढ़ी हैं। वहीं अस्पतालों में 57 फीसदी मामले कम मिले। 


आंकड़े और रुझान के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति के बारे में पता लगाया जा सकता है। इसे सकारात्मक रुप से लेते हुए सरकार को काम करना चाहिए क्योंकि सालों से देश बच्चों की इन गंभीर बीमारियों का सामना कर रहा है। हमारे बच्चों का भविष्य हमारी जिम्मेदारियों पर निर्भर करता है और इनके लिए स्वास्थ्य सेवाओं को विस्तार देना जरूरी है। - डॉ. गगनदीप कंग, सीएमसी वैल्लोर

 

यह अब तक की सबसे भयावह तस्वीर है। सरकारें स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर तरीके से चलाने का दावा कर रही हैं जबकि अस्पतालों में मरीजों की आधी संख्या कम हो चुकी है। बच्चों में गंभीर बीमारियों की अंडर रिपोर्टिंग होना बेहद घातक है। - डॉ. मनीष शर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ, दिल्ली एम्स

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