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अमर उजाला विशेष : हर सातवां शिशु हो रहा प्री-मैच्योर, समय से पहले करनी पड़ी डिलीवरी
Wed, 04 Aug 2021 07:06 AM IST
Kuldeep Singh
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Kuldeep Singh
Updated Wed, 04 Aug 2021 07:06 AM IST
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सार
- अगर समय से पहले शिशु का जन्म होता है तो उसका जीवन कई तरह की चुनौतियों से घिरा रहता है
- ग्रीन जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है
- सालाना 33 लाख से ज्यादा बच्चों का समय से पहले जन्म
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विस्तार
कोरोना संक्रमण का एक साइलेंट असर नौनिहालों पर दिखाई दे रहा है। इसका असर यह है कि बीते छह महीने से देश में हर सातवां शिशु प्रीमैच्योर (समय से पहले जन्म लेने वाला) है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि संक्रमण की चपेट में आने के बाद गंभीर अवस्था में पहुंचने वाली गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी करानी पड़ रही हैं।
ग्रीन जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि दिल्ली व मुंबई सहित बड़े अस्पतालों में एक जैसी स्थिति देखने को मिल रही है जो कि दूसरी लहर आने के बाद बढ़ी है। डॉक्टरों के अनुसार अगर समय से पहले शिशु का जन्म होता है तो उसका जीवन कई तरह की चुनौतियों से घिरा रहता है।
इसे लेकर नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने मुंबई के बीवाईएल नायर चैरिटेबल अस्पताल के साथ एक और अध्ययन किया है,जिसमें 1530 गर्भवती महिलाओं की केस हिस्ट्री की समीक्षा की गई।
पता चला है कि दूसरी लहर आने के बाद प्रीमैच्योर डिलीवरी में 35 फीसदी की बढ़ोतरी अकेले एक अस्पताल में देखने को मिली है। डॉ. नीरज महाजन के अनुसार पहली लहर के दौरान यहां कोविड संक्रमित गर्भवती महिलाओं के करीब 93 फीसदी बच्चे प्रीमैच्योर हुए जबकि दूसरी लहर में यह संख्या 128 फीसदी से अधिक थी।
दूसरी लहर में बढ़ गई थी गर्भवती महिलाओं की मृत्युदर
इसी अध्ययन में यह भी निष्कर्ष निकला कि कोरोना की पहली लहर में एक हजार माताओं पर मृत्युदर 10 फीसदी थी लेकिन दूसरी लहर (अप्रैल से मई 2021) के बीच यह 83.3 फीसदी तक पहुंच गई है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को वैक्सीन की दोनों खुराक लेना जरूरी माना जा रहा है।
दरअसल कोविड महामारी में गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को जानने के लिए आईसीएमआर ने प्रेग्कोविड रजिस्ट्री शुरू की है जिसके तहत देश भर के अस्पतालों से अध्ययन और इससे संबंधित आंकड़े सामने आ रहे हैं।
सालाना 33 लाख से ज्यादा बच्चों का समय से पहले जन्म
हेल्दी न्यू बोर्न नेटवर्क के अनुसार भारत में सालाना 3,341,000 बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं। इस वजह पांच साल तक की आयु के 361,600 बच्चों की मौत भी हो रही है। देश में करीब 83% प्रीमैच्योर शिशुओं का जन्म 32 से 37 सप्ताह के दौरान हो रहा है। यह स्थिति कोविड महामारी से पहले थी। डॉक्टरों की मानें तो महामारी के बाद यह स्थिति और भी अधिक गंभीर हुई है।
कई चुनौतियों से घिरी है शिशुओं की जिंदगी
दिल्ली एम्स की डॉ. स्वाति बताती हैं कि प्रीमैच्योर शिशुओं की जिंदगी कई चुनौतियों से घिरी होती है। मानसिक और शारीरिक विकास के अलावा ऐसे बच्चों में दिव्यांग भी देखने को मिलती है। डॉ. स्वाती का कहना है कि महामारी के चलते ऐसे मामलों में उछाल आया है।