Bombay HC: बिना पर्यावरण मंजूरी शुरू कर दिया मॉल का निर्माण, बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिया काम बंद करने का आदेश
महाराष्ट्र में एक पर्यावरण मंजूरी मिले बिना मॉल का निर्माण शुरू कर दिया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे बेहद गंभीर मानते हुए मॉल का काम बंद करने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता कंपनी ग्राउर एंड वील (इंडिया) लिमिटेड ने कानून को अपने हाथ में ले लिया और बिना किसी पर्यावरणीय मंजूरी के मॉल का निर्माण शुरू कर दिया।
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महाराष्ट्र में एक पर्यावरण मंजूरी मिले बिना मॉल का निर्माण शुरू कर दिया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे बेहद गंभीर मानते हुए मॉल का काम बंद करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के प्रतिष्ठान का संचालन पारिस्थितिक मुद्दे की गंभीरता को बढ़ाता है।
न्यायमूर्ति एमएस सोनक और जितेंद्र जैन की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता कंपनी ग्राउर एंड वील (इंडिया) लिमिटेड खुद को कानून से ऊपर मानती है और उसने पर्यावरण संबंधी चिंताओं के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया है। कंपनी ने कानून को अपने हाथ में ले लिया और बिना किसी पर्यावरणीय मंजूरी के मॉल का निर्माण शुरू कर दिया। इसलिए जरूरी है कि मॉल को बंद करने के निर्देश तुरंत लागू किए जाएं।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का तर्क है कि उसने किसी माफी योजना के तहत मंजूरी के लिए आवेदन किया है। लेकिन उसे पर्यावरणीय मंजूरी मिले बिना व्यावसायिक लाभ प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) को मॉल के काम को बंद कराने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई मामला नहीं बनता है। राहत केवल न्याय को बढ़ावा देने के लिए दी जा सकती है, न कि अवैधता को बनाए रखने के लिए। पर्यावरण मंजूरी प्राप्त किए बिना मॉल का संचालन करना बेहद गंभीर है। यह पारिस्थितिकी मुद्दे की गंभीरता को बढ़ाता है।
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मुंबई के कांदिवली इलाके में मॉल कंपनी ग्रेउर एंड वील (इंडिया) लिमिटेड ने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) की ओर से पांच मार्च को जारी किए गए काम बंद करने के निर्देशों को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।याचिका में दावा किया गया था कि आदेश पारित करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया और बंद करने का आदेश पारित करने की कोई गंभीर आवश्यकता नहीं थी। हाईकोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया और कहा कि प्राधिकरण किसी पर्यावरणीय आपदा का इंतजार नहीं कर सकता।
कंपनी के अधिवक्ता आयुष अग्रवाल ने कहा कि भले ही कंपनी ने मॉल बनाने के लिए पर्यावरण मंजूरी नहीं ली हो या मॉल बनाने या चलाने के लिए कोई सहमति न ली हो, फिर भी उसे बंद करने के निर्देश जारी नहीं किए जाने चाहिए थे, क्योंकि उसने 2016 में किसी माफी योजना के तहत मंजूरी के लिए आवेदन किया था। यह आवेदन अभी भी संबंधित प्राधिकरण के समक्ष लंबित है।
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इस पर पीठ ने कहा कि एक बार याचिकाकर्ता कंपनी ने बिना अनिवार्य मंजूरी के मॉल का निर्माण और संचालन करने की बात स्वीकार कर ली है। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अब वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के कथित उल्लंघन के बारे में कैसे शिकायत कर सकती है? कंपनी की ओर से माफी योजना के तहत दायर आवेदन पर भी कोई स्पष्टता नहीं थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी माफी योजना वायु और जल प्रदूषण नियंत्रण कानून के तहत सहमति के बिना स्थापना या संचालन का अधिकार नहीं देती है। कोर्ट ने कहा कि किसी माफी योजना के तहत आवेदन का लंबित रहना पर्यावरण मंजूरी के रूप में नहीं माना जाता है या कानून तोड़ने वाले को अनिश्चित काल तक कानून तोड़ने का अधिकार नहीं दे देता।
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